नई दिल्ली |

दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 'इंडिया' (INDIA) ब्लॉक की विशाल रैली के तुरंत बाद विपक्षी खेमे से एक बड़ी राजनीतिक हलचल सामने आई है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की मुलाकात ने विपक्षी गलियारों में सुगबुगाहट तेज कर दी है। इस उच्चस्तरीय बैठक को आगामी चुनावों के मद्देनजर विपक्षी एकजुटता और एक बड़ी राष्ट्रीय रणनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और कथित 'वोट चोरी' के गंभीर मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर लगातार हमलावर है।

रामलीला मैदान से गूंजा मुद्दा: बिहार को बताया 'वोट चोरी का पहला शिकार'

दिल्ली की रैली को संबोधित करते हुए राजद नेता तेजस्वी यादव ने चुनावी पारदर्शिता पर बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में 'वोट चोरी' की शुरुआत सबसे पहले बिहार से हुई थी। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा तंज कसते हुए उन्होंने इसे 'दो नंबरी सरकार' करार दिया।

महाभारत के प्रसंगों का हवाला देते हुए तेजस्वी ने कहा कि रामलीला मैदान में इस बार "वोट चोरों के खिलाफ महाभारत" का शंखनाद किया गया है। उन्होंने इस लड़ाई को देश के वास्तविक मतदाताओं और चुनावी प्रक्रिया में सेंध लगाने वालों के बीच की सीधी जंग बताया।

यूपी चुनाव पर विशेष फोकस: राष्ट्रीय अभियान बनाने की कोशिश

तेजस्वी यादव ने अपने संबोधन में न सिर्फ बिहार तक अपनी बात सीमित रखी, बल्कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों का भी पुरजोर जिक्र किया। उन्होंने यूपी और देश के अन्य हिस्सों में विपक्षी दलों से एकजुट होकर भाजपा को मात देने का आह्वान किया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजद इस तकनीक और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे को केवल प्रांतीय स्तर तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का एक साझा जन-आंदोलन बनाने की जुगत में है।

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कांग्रेस और राजद की नजदीकी क्यों है बेहद अहम?

बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस और राजद का यह मजबूत गठबंधन 'इंडिया' ब्लॉक की रीढ़ माना जाता है।

  • जमीनी ताकत बनाम राष्ट्रीय नेटवर्क: राजद के पास राज्य में मजबूत सामाजिक आधार और केडर-बेस्ड संगठन है, जबकि कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क और समन्वय स्थापित करने की क्षमता है।
  • भविष्य की रणनीति: दोनों दलों के बीच आपसी तालमेल से विपक्षी दलों को साझा मुद्दों पर मुखर होने और केडर को एकजुट रखने में मदद मिलती है। सोनिया गांधी के साथ लालू-तेजस्वी की इस बैठक को बिहार में आपसी रिश्तों और सीट-बंटवारे के समीकरणों को और अधिक प्रगाढ़ करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

क्या उत्तर प्रदेश के रण में मिलेगा इसका फायदा?

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस लिहाज से राज्य में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच का तालमेल बेहद निर्णायक रहने वाला है। हालांकि, सीटों के बंटवारे और संगठनात्मक हितों को लेकर बीच-बीच में मतभेद और खींचतान की खबरें भी सामने आती रही हैं।

ऐसे में, राजद और कांग्रेस के बीच का यह मजबूत रिश्ता यूपी की राजनीति में एक 'पुल' (Bridge) का काम कर सकता है। कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के साथ बातचीत और समन्वय स्थापित करने में इसका मनोवैज्ञानिक लाभ मिल सकता है। तेजस्वी यादव का यूपी में भाजपा को हराने का आह्वान भी इसी सोची-समझी व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

रामलीला मैदान की इस हुंकार और शीर्ष नेताओं की इस मुलाकात के बाद अब बड़ा सवाल यह है कि विपक्षी एकता का यह संदेश जमीन पर चुनावी तालमेल और वोट ट्रांसफर में कितना कारगर साबित हो पाएगा।

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