प्रो. (डॉ) संजय जायसवाल
हाल ही में ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ का आह्वान करने वाले हिंदी के प्रसिद्ध लेखक महापंडित राहुल सांकृत्यायन और ‘संसद से सड़क तक’ की बात करने वाले कवि धूमिल की मूर्तियाँ तोड़ दी गईं। यह पहली बार नहीं है कि लेखकों और कलाकारों का अनादर हुआ हो। पर सच यह है कि ज्ञान पर ऐसा हमला पहले इतना तीव्र नहीं था। पहले असहमतियों के लिए भी पर्याप्त जगहें थीं। लेखकों की मूर्ति तोड़ने का ऐसा क्रूरतम और असंवेदनशील वाक़या इस देश में पहले बहुत कम देखने को मिलता था।
बंगाल में राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति का तोड़ा जाना हमें चकित करता है। दरअसल बंगाल आरंभ से ही नवजागरण का एक बड़ा केंद्र रहा है। हिंदी प्रदेशों की तुलना में यहाँ का जनमानस अपने सांस्कृतिक मनीषियों को अपार स्नेह और मान देता रहा है। बंगाल की पहचान राजा राममोहन राय, विद्यासागर, रवींद्रनाथ, बंकिमचंद्र, शरतचंद्र जैसे सुधारकों और लेखकों से बनी है। पूरे देश में इस क्षेत्र को एक सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर देखा जाता है। बंगाल के रानीगंज में स्थापित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति तोड़ा जाना दरअसल बंगाल के लगभग 150 वर्षों की विद्वता और सांस्कृतिक पहचान पर हमला है।
राहुल सांकृत्यायन भारतीयता के लेखक हैं।प्रगतिशील विचारों से भरे राहुल सांकृत्यायन ने जिस आलोचनात्मक और विवेकपूर्ण दृष्टि से भारतीय समाज, संस्कृति, इतिहास और दर्शन का मूल्यांकन किया है, वह स्वागत योग्य है। वे एक ऐसे तटस्थ लेखक हैं, जो किसी विचारधारा के फ्रेम में नहीं बैठते हैं।उनका पूरा साहित्य भारतीयता की विरासत का आख्यान है।
ऐसे समय में यह घटना हमें ज्यादा उद्वेलित करती है। इन दिनों पूरे देश के अकादमिक जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा की लहर चल रही है। ऐसे समय में भारतीय ज्ञान परंपरा की की शाखाओं के जानकार राहुल सांकृत्यायन का ऐसा अनादर हमारे भीतर यह प्रश्न पैदा करता है कि क्या हम सच में भारतीय ज्ञान परंपरा को आदर दे रहे हैं? या सिर्फ ढोंग कर रहे है? इस घटना को इस रूप में भी देखा जा सकता है क्या हिंदी प्रदेशों की तरह बंगाल में फासीवादी शक्तियां के उभार के कारण राहुल के साथ ऐसा घटित हुआ?
बहुत संभव है कि आज धार्मिक श्रेष्ठताबोध और कट्टरता के इस दौर में राहुल सांकृत्यायन की बातें फासिस्ट शक्तियों के मन में डर पैदा कर रही हो । जब वे कहते हैं- “तुम्हारे धर्म की क्षय, तुम्हारे भगवान की क्षय, तुम्हारे सदाचार की क्षय, तुम्हारे जात-पांत की क्षय, तुम्हारे जोकों की क्षय हो।” निश्चित तौर पर वे ऐसे हर धार्मिक-अंधत्व का विरोध करते हैं जो लोगों के बीच शत्रुता और नफरत पैदा करती है।
आज जब पूरा तंत्र नफरत, हिंसा और विभाजन को प्रोमोट करने में लगा है।तब धर्म, ईश्वर, वर्ण-व्यवस्था, लूट और भ्रष्टाचार का विरोध की बात करने वाले राहुल पर प्रहार स्वाभाविक है।
राहुल के प्रति नफरत की एक वजह यह भी हो सकती है कि कुछ लोगों द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा को सिर्फ पुरानी पोथियों में खोज जा रहा है जबकि सच यह है कि राहुल पुरानी पोथियों को संदेह की नजर से देखते हैं।उनका मानना है कि- “हमारी 75% पुरानी पोथियों में बेवक़ूफ़ियाँ हैं।” उस दौर में नेहरू भी राहुल सांकृत्यायन की विद्वता के कायल थे ।आज नेहरू फासीवादियों की नजर में विलेन हैं।बहुत संभव है कि इसलिए भी उनपर आक्रमण हुआ हो ?
ऐसे में प्रतिक्रियावादी ताकतों को यह समझना चाहिए कि राहुल सांकृत्यायन और धूमिल की मूर्तियां तोड़ देने से वे उनकी सांस्कृतिक चेतना और प्रतिरोध को नहीं रोक सकते।यह समय अनपढ़ता और सूचनाओं का है। अंधभक्ति का उभार स्वाभाविक है। अंधभक्त ज्ञान को अपना शत्रु मानते हैं। ज्ञान को शत्रु मानने वाले भला कैसे राहुल सांकृत्यायन और धूमिल जैसे लेखेकों को बर्दाश्त कर सकते हैं? दोनों लेखक धर्मांधता एवं जातीय संस्कृति की नकारात्मक विरासत के विरोधी थे। हालांकि इन दिनों धर्म को सत्ता वर्चस्व के एक बड़े टूल्स के रूप में देखा जा रहा है। उस टूल्स के बाय प्रोडक्ट के तौर पर जाति, भाषा, संस्कृति, प्रांत और संप्रदाय आदि का इस्तेमाल किया जा रहा है। देश को राष्ट्र बनाने की राष्ट्रवादियों की कोशिश ने भारत की बहुलतावादी पहचान को संकट में डाल दिया है। धर्म और राष्ट्र के पुनरुत्थान के बहाने एक ओर ‘ राष्ट्र गौरव’ की वापसी का नैरटिव बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर हम देख सकते हैं कि कैसे यही पुनरुत्थानवादी मानसिकता धर्मांधता को जन्म दे रहा है।
राहुल सांकृत्यायन ने हमेशा धर्म के ऐसे रूप की आलोचना की है- “धर्म आज भी वैसा ही हजारों मूढ़ विश्वास का पोषक और मनुष्य की मानसिक दासता का समर्थक है।” आज हम अपने आसपास ऐसे बौद्धिक दासों को देख सकते हैं। जो कहने के लिए पढ़े-लिखे लोग हैं, पर उनका बौद्धिक उपनिवेशन हो चुका है। धर्म, जाति, संप्रदाय, प्रांतीयता, भाषा के नाम पर लोगों को विभाजित किया जा रहा है। ताकि बंटे लोगों का बौद्धिक बंध्याकरण किया जा सके। इस बंध्याकरण की प्रक्रिया में सबसे बड़ी भूमिका बिकी हुई मीडिया, आईटी सेल और सांस्कृतिक रूप से विपन्न लोगों की भीड़ है। ऐसे लोग इतिहास को विकृत करने में लगे हैं। इतिहास बोध से कटे लोग अपनी परंपरा और समावेशी विरासत को समझने की जगह शत्रुता के पर्याय बनते जा रहे हैं। ऐसे में दो दर्जनों से ज्यादा भाषाओं के जानकार, दुर्लभ बौद्ध ग्रंथों का उद्धार करने वाले, संस्कृत कवियों, इतिहासकारों, दार्शनिक, ऐतिहासिक चरित्रों को मान देने वाले तथा किसानों की पक्षधरता करने वाले राहुल सांकृत्यायन और भारत के लोकतंत्र के विसंगतियों को ‘डिकोड’ करने वाले धूमिल पर हमला अस्वाभाविक नहीं है बल्कि एक सुनियोजित हमला है।
यह समय ‘हमारा’ और ‘उनका’ के द्वैत में फंसता जा रहा है। जो हमारे पक्ष में नहीं हैं, वे हमारे शत्रु हैं। शायद यही वजह है कि प्रगतिशीलता की बात करने वाले राहुल और धूमिल फासीवादियों को शत्रु की तरह दिखते हैं। अब प्रगतिशील लोग व्यवस्था को खटकने लगे हैं।धर्मांधता की आलोचना करने वाले ये लोग उनको धर्म विरोधी लगते हैं। राष्ट्र की जगह देश की आत्मा की बात करने वाले और सत्ता से प्रश्न पूछने वाले देशद्रोही होते हैं। न्याय, अधिकार और रोजगार की बात करने वाले कानून तोड़ने वाले लगते हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि द्वैत और बनाम का यह खेल अब बंद होना चाहिए। यह समय भारत की समृद्ध परंपरा और बहुलतावादी संस्कृति के बीच एक समावेशी पुल बनाने की है। तभी हम राहुल सांकृत्यायन और धूमिल जैसे साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों का विस्थापन और अतिक्रमण रोक पाएंगे।





