संजय कुमार धीरज,साहिबगंज। झारखंड के संताल परगना प्रमंडल में राजमहल लोकसभा का चुनाव आगामी एक जुन को होना है। लोकसभा की यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है, जिसमें 6 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं, जो चार जिलों के 19 प्रखंडों को कवर करता है। यहां लगभग 16 लाख मतदाता हैं, जो लोकसभा के कुल 2020 मतदान केंद्रों पर अपना वोट डालने जाएंगें।





मंगलवार को सीपीआई (एम) नेत्री वृंदा करात ने अपने प्रत्याशी के समर्थन में प्रेस वार्ता कर कहा कि इस संसदीय क्षेत्र में ही बरहेट के भोगनाडीह में सिद्धो कान्हो, चांद भैरव और फूलो झानो के नायकत्व में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) से पहले ही सन 1855 - 56 में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ यहां रहने वाले सभी शोषित समुदायों के लोगों ने किसान विद्रोह, (संताल हूल) का बिगुल फूंका था। इस संताल हूल ने इतिहास में आजादी की लड़ाई की भूमिका तय कर दी थी, लेकिन हूल के इतने दिनों के बाद भी जब बरहेट, लिटटीपाडा, आमरापाड़ा, बोरियो, बोआरीजोर, सुंदर पहाड़ी , गोपीकांदर, पतना पाकुड़िया और साहिबगंज शहर समेत एक बड़े इलाके में पीने के साफ पानी के लिए लोग भटकते रहते हैं। तब आश्चर्य होता है कि एक ओर आजादी के इतने सालों के बाद भी यहां के लोग पीने के साफ पानी के लिए तरस रहें हैं और दूसरी ओर यहां के जनप्रतिनिधियों के सेवकों के यहां से करोड़ों रुपये बरामद हो रहें हैं। इस पूरे क्षेत्र में बिजली की आंख मिचौली और पेयजल के भारी संकट की स्थिति को देखकर लगता है कि यहां के आम लोग कितनी मुश्किल और परेशानी में जीते हैं। यहां आदिम जनजाति, यानि पहाड़िया लोगों की भी खासी तादाद है, लेकिन पहाड़ पर बसा यह समुदाय बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। इस क्षेत्र में जमीन का सवाल एक प्रमुख सवाल है। क्योंकि देशी विदेशी कंपनियों और कार्पोरेट घरानों की नजर यहां की खनिज संपदा पर है। हाल ही में यहां निजी कंपनियों को कोयला खनन के लिए कोल ब्लाक आवंटित किए गए हैं। ये निजी कोल कंपनियां यहां के आदिवासियों और अन्य गरीबों की जमीन की रक्षा के लिए बने संताल परगना काश्तकारी कानून की धज्जियां उड़ाते हुए स्थानीय दलालों के माध्यम से रैयतों के जमीन की लूट जारी रखे हुए हैं। अमरापाड़ा के पचुआडा कोल ब्लाक के समीप बसे गांवों में इन दलालों का इतना आतंक है कि आम आदिवासी रैयत कंपनी के खिलाफ मुंह तक नहीं खोलते हैं। वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र के उधम कोल इंडिया की कंपनी ईसीएल ने भी कोयला खनन का काम कुख्यात आउटसोर्सिंग कंपनियों के हवाले कर दिया है, जिन्हें न तो कामगारों के हितों की परवाह है और न ही रैयतों के अधिकारों की। इस मुद्दे पर यहां के सांसद और विधायक भी अघोषित रुप से निजी कंपनियों के पक्ष में ही खड़े रहते हैं। मोदी सरकार द्वारा कोयला उधोग का निजीकरण किए जाने की दिशा में कदम उठाते हुए कार्पोरेट घरानों को कोल ब्लाकों की नीलामी के माध्यम से कोयला खनन के लिए यहां कोल ब्लाक आवंटित किए गए।इसलिए निजी कंपनियों द्वारा जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। सरकारी क्षेत्र की कोयला कंपनी ईसीएल ने भी किसानों की अधिग्रहण की गई जमीन का मुआवजा, पुनर्वास और नौकरी दिए जाने का सैकड़ों मामला लंबित रखा है। ईसीएल प्रबंधन की इस मनमानी से यहां रैयतों और प्रबंधन के बीच टकराव होता रहता है।





वृंदा करात ने कहा कि झारखंड के साहिबगंज जिले से गंगा नदी गुजरती है, गंगा की सफाई के नाम पर केंद्र सरकार की नमामी गंगे परियोजना के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद यह शहर के समीप गंगा नाले में तब्दील हो गई है। इस अपराध के जिम्मेवार यहां के सांसद, विधायक और निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं। एक ओर नमामी गंगे परियोजना की विफलता और दूसरी ओर अडानी के गोड्डा स्थित पावर प्लांट के लिए सकरीगली में निर्मित बंदरगाह के पास से 36 एमसीएम प्रतिवर्ष यानि 9.86 करोड़ लीटर प्रति दिन गंगाजल का दोहन किया जा रहा है, जो इस इलाके के लोगों के लिए खतरे की घंटी है। क्योंकि जहां साहिबगंज शहर में मात्र 40 फीट नीचे बोरिंग करने से जलस्त्रोत मिल जाता था, वहीं अब एक सौ फीट बोरिंग करने पर जल स्त्रोत मिलता है। जैसे- जैसे गंगाजल का दोहन बढेगा, इस इलाके में जलस्तर नीचे होता जाएगा जिसका दुष्परिणाम यहां के लोगों को झेलना पड़ेगा।





वृंदा करात ने कहा कि जिले के बगल में अवस्थित गोड्डा जिले में गौतम अडानी का पावर प्लांट है, जहां से उत्पादित बिजली बांग्लादेश को भेजी जाती है, लेकिन यहां के लोग बिजली की अनियमित आपूर्ति को झेलते रहते हैं। एक बड़ी समस्या यहां निजी कोयला कंपनियों द्वारा कोयले का खनन करने के बाद उसके परिवहन सेे आ रही है। आमरापाड़ा के ओपेन कोयला खानों से कोयला निकाल कर निजी कंपनियों द्वारा बड़े - बड़े हाइवा वाहनों से कोयला दुमका के डम्पिंग यार्ड तक संडक मार्ग से भेजा जाता है। कोयला के परिवहन में सैकड़ों वाहन कोयले की धूल उड़ाते हुए राजमार्ग से गुजरते हैं, जिसके चलते भारी प्रदूषण हो रहा है और कभी हरा–भरा दिखने वाला यह इलाका कोयले के काले डस्ट से रोड के किनारे बसे गांवों को अपने आगोश में ले लिया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा कोयले को ढंक कर ले जाने और रास्ते में पानी का छिड़काव करने का दिशा निर्देश केवल कागजों तक सीमित रह गया है। इस प्रदूषण के कारण यहां का पर्यावरण संतुलन भी नष्ट होता जा रहा है। वातावरण में कोयले के महीन कणों की मौजूदगी लोगों को सांस की बीमारी का आमंत्रण दे रहे है। भौगोलिक रूप से यह संसदीय क्षेत्र ऐतिहासिक राजमहल पहाड़ी के उत्तर - पूर्वी भाग में बिहार और पं. बंगाल की सीमा पर अवस्थित है और आजीविका के लिए दोनों राज्यों के लोग आपस में साझा संपर्क रखते हैं। यहां आदिवासी, मुस्लिम अल्पसंख्यक और सामाजिक - आर्थिक रूप से पिछड़े समुदाय के लोगों की बहुलता है, लेकिन इस सामाजिक आधार के अधिकांश परिवारों के बीच भारी गरीबी बयाप्त है। गंगा नदी से सटे साहिबगंज, उधवा और राजमहल में दियारा का एक बड़ा इलाका है, जहां बड़ी संख्या में लोग खेती और पशुपालन के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं, लेकिन यहां की जमीन का सर्वे नहीं होने से रैयतों के समक्ष अपनी पहचान का संकट और जमीन के मालिकाना हक के सामने प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। यहां के किसान मेहनती हैं और दियारा के जीवट स्थिति का सामना करते हुए बिना सरकारी सहायता के यहां खेती कर अपना जीवन यापन करते हैं।राजमहल लोकसभा के पाकुड़ और साहिबगंज जिले में पत्थर और बीड़ी उद्योग जैसे असंगठित में काफी संख्या में कामगार करते थे, लेकिन पत्थर उधोग अभी संकटग्रस्त है। बीड़ी उद्योग में महिला कामगारों की ही बड़ी संख्या है, लेकिन दोनों उद्योगों में श्रम विभाग की उदासीनता के चलते कामगारों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती है। अभी पत्थर उधोग के बंद होने से यहां के युवा मजदूरों का भारी संख्या में पलायन हुआ है। वैसे भी इस इलाके में रोजगार की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं होने से यहां के नौजवान बड़ी तादाद में दक्षिण के राज्यों में काम की तलाश में निकल गए हैं। ग्रामीण इलाकों में मनरेगा भ्रस्टाचार के दलदल में फंस कर कागजी नुमाइश बन गया है।





वृंदा करात ने कहा कि राजमहल संसदीय क्षेत्र के पाकुड़ और राजमहल विधानसभा क्षेत्र में शेरशाहवादी मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी है, लेकिन अभी इस समुदाय के नौजवानों के सामने एक बड़ी समस्या है कि उन्हें शेरशाहवादी का प्रमाण - पत्र निर्गत नहीं हो रहा है।जिसके चलते वे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। इस इलाके में सांप्रदायिक धुव्रीकरण के लिए बहुत पहले से एक सुनियोजित नरेटिव चल रहा है कि यहां की डेमो ग्राफी बदल रही है और बड़ी संख्या में यहां बांग्लादेशी घुसपैठियों ने अड्डा जमा लिया है। यहां जब भाजपा के गृहमंत्री या महामहिम आते हैं तब वो भी यही राग अलापते है, लेकिन एक भी घुसपैठी पकड़ा नहीं आता है।





उल्लेखनीय है कि सीपीआई (एम) को छोड़कर कोई भी राजनीतिक पार्टी और वर्तमान सांसद ने इस मुद्दे पर कभी भी एक शब्द नहीं कहा है। वे जानते हैं कि इस इलाके के बांग्लाभाषी मुस्लिम अल्पसंख्यक उन्हें वोट देने के लिए मजबूर हैं। इस संसदीय क्षेत्र में काफी दिनों से इतनी चिन्हित और विकट समस्याओं के प्रति यहां के सांसद और विधायक की चुप्पी इस संसदीय क्षेत्र के वोटरों के लिए एक रहस्य है। यदि यहां के जनप्रतिनिधियों के इमानदारी और उनके आचरण की चर्चा की जाए तो हाल में ही इस इलाके के एक प्रभावी मंत्री के सहयोगियों के यहां से करोड़ों रुपये बरामद हुए हैं और वह मंत्री जेल में हैं।