नई दिल्ली

प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा अल नीनो भारत के किसानों, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। विश्व मौसम संगठन (WMO) के ताजा आकलन के अनुसार, फरवरी 2027 तक अल नीनो के बने रहने की संभावना करीब 100% है। इसके परिणामस्वरूप देश में तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, बारिश के पैटर्न में अनिश्चितता और भीषण जल संकट का खतरा पैदा हो सकता है।

सूखा और लू: दायरा साढ़े तीन गुना बढ़ा

Natural Hazards and Earth System Sciences में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, 1951 से 2016 के बीच भारत में सूखे और लू की एक साथ (संयुक्त) आने वाली मौसमी आपदाओं से प्रभावित क्षेत्र 10% से बढ़कर 35% हो गया है।

65 से अधिक वर्षों में यह दायरा साढ़े तीन गुना बढ़ चुका है। चिंताजनक बात यह है कि यह संकट अब केवल पारंपरिक रूप से सूखे रहने वाले उत्तर-पश्चिमी भारत (जैसे राजस्थान, गुजरात) तक सीमित नहीं है, बल्कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम जैसे अधिक नमी और बारिश वाले राज्यों तक भी फैल चुका है।

खेती और ग्रामीण आजीविका पर सीधा असर

सूखे और भीषण गर्मी का एक साथ पड़ना कृषि क्षेत्र के लिए दोहरा झटका है:

  • चावल की पैदावार: शोध के अनुसार, गंभीर सूखा और लू वाले वर्षों में देश में धान/चावल की पैदावार में 12.1% तक की गिरावट दर्ज की गई है।
  • गेहूं की फसल: गेहूं में दाना भरने के दौरान यदि तापमान में 1°C की बढ़ोतरी होती है, तो उत्पादन में 3-4% तक की कमी आ सकती है।
  • पशुपालन और रोजगार: बारिश की कमी और भीषण गर्मी से खेतिहर मजदूरों की कमाई, पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता और गांवों में पानी का संकट गहरा सकता है।

अल नीनो क्यों बढ़ा रहा है दोहरा खतरा?

अल नीनो के दौरान मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है, जिससे वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है। भारत में इसके कारण मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं।

दुष्चक्र (Vicious Cycle): जब मिट्टी में नमी कम होती है, तो वाष्पीकरण घट जाता है और जमीन के आसपास की हवा तेजी से गर्म होने लगती है। दूसरी ओर, बढ़ता तापमान हवा में नमी की मांग बढ़ाता है, जिससे मिट्टी और तेजी से सूखती है। इस प्रकार गर्मी और सूखा एक-दूसरे के प्रभाव को खतरनाक रूप से बढ़ा देते हैं।

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जल जीवन मिशन: नल पहुंचे, लेकिन क्या सुरक्षित है पानी?

केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन के तहत अगस्त 2019 में जहां केवल 17% ग्रामीण परिवारों के पास नल कनेक्शन था, वहीं दिसंबर 2025 तक यह कवरेज बढ़कर 81% से अधिक हो चुका है।

हालांकि, इंफ्रास्ट्रक्चर बनने के बावजूद जल स्रोतों का सूखना चिंता का विषय है। वर्ष 2024 के फंक्शनैलिटी असेसमेंट में पाया गया कि:

  • 86.5% घरों में नल कनेक्शन चालू हालत में मिले।
  • 80.2% परिवारों को ही पर्याप्त मात्रा में पानी मिल पा रहा था।
  • 76% परिवारों को निर्धारित मानक के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण पानी मिल रहा था।

ऐसे में यदि भूजल स्तर गिरता है या जल स्रोत सूखते हैं, तो नल कनेक्शन होने के बावजूद पानी की आपूर्ति ठप हो सकती है।

संकट से निपटने के लिए जरूरी कदम

अल नीनो के प्रभाव से निपटने और जल सुरक्षा बनाए रखने के लिए विशेषज्ञों ने निम्नलिखित रणनीतियों पर जोर दिया है:

  1. वाटर सिक्योरिटी प्लान: हर जल संकटग्रस्त पंचायत में भूजल स्तर और सालभर की पानी की जरूरत का सटीक आकलन करके योजना बनाना।
  2. पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार: पुराने तालाबों, जोहड़ों और बावड़ियों को दोबारा जीवित करना।
  3. परिणाम आधारित जल संरक्षण: मनरेगा के तहत जल संरक्षण कार्यों का मूल्यांकन केवल खर्च या निर्माण से नहीं, बल्कि वास्तविक जल संचयन (Water Retention) के आधार पर करना।

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