डॉ. पूर्णिमा कुमारी

दूर क्षितिज पर चमकता हुआ वॉशिंगटन का सत्ता-शिखर बाहर से जितना भव्य और अपराजेय दिखता है, उसकी अंतड़ियों में गहराता वित्तीय दरार उतना ही भयावह है। वैश्विक पूंजीवाद का यह निर्विवाद मसीहा—जो दशकों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार की धड़कनें तय करता रहा है—आज अपने ही बनाए कर्ज के मकड़जाल में उलझकर सांसें गिन रहा है। जब समृद्धि की बुनियाद ही उधारी के खोखले स्तंभों पर टिकी हो, तो चकाचौंध के पीछे विनाश की आहट साफ़ सुनाई देने लगती है।

सांख्यिकी का त्रासद कैनवास

अगस्त 2026 में सामने आए वित्तीय दस्तावेज़ महज आंकड़े नहीं, बल्कि एक महाशक्ति के विवश आत्मसमर्पण का घोषणापत्र हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज पहली बार 40.05 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक और अलार्म बजाते शिखर को पार कर गया। इसके समानांतर, देश की नॉमिनल जीडीपी 31.86 ट्रिलियन डॉलर के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। कर्ज और सकल घरेलू उत्पाद का यह अनुपात अब 125.8% पर पहुंच चुका है - यानी व्यवस्था की कुल उत्पादकता से कहीं अधिक भारी उसका संचित भार हो चुका है।

महंगाई का प्रेत अब भी अमेरिकी सुपरमार्केटों की गलियों में घूम रहा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) 3.4% पर अटका हुआ है, जो फेडरल रिजर्व के 2% के सुरक्षित दायरे को लगातार मुंह चिढ़ा रहा है। खाद्य और ईंधन के बढ़ते बिल आम नागरिकों के जीवन-स्तर को खोखला कर रहे हैं।

व्योमिंग की सुरम्य वादियों में आयोजित ‘जैक्सन होल’ संगोष्ठी का माहौल किसी युद्धकालीन कक्ष जैसा तनावपूर्ण था। नव-नियुक्त फेडरल रिजर्व प्रमुख केविन वार्श की आवाज में कोई लाग-लपेट नहीं थी:

"मुद्रास्फीति अब भी असहज ऊंचाइयों पर है। सितंबर और दिसंबर में ब्याज दरों में और अधिक आक्रामक वृद्धि के विकल्प टेबल से बाहर नहीं हैं।"

वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और टिक-टिक करता टाइम-बम

यह संकट सिर्फ पोटोमैक नदी के किनारों तक सीमित नहीं है; यह एक वैश्विक टाइम-बम है जिसकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। वाशिंगटन आज केवल अपने कर्ज के ब्याज भुगतान पर प्रतिवर्ष 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक फूंक रहा है।

ट्रेजरी यील्ड का उफान

यूएस ट्रेजरी बॉन्ड्स की यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है, जिससे लंबी अवधि के अमेरिकी ऋण पत्रों को अब जोखिम-मुक्त नहीं माना जा रहा।

वैश्विक वित्तीय संकुचन

वॉल स्ट्रीट से उठी इस लहर ने फ्रैंकफर्ट, पेरिस और टोक्यो तक संप्रभु बॉन्ड यील्ड्स को खींच लिया है। विश्वभर में ऋण लेना महंगा और दुष्कर हो चुका है।

डी-डॉलराइजेशन की आहट

पश्चिम एशिया में ईरान के साथ भड़के सैन्य तनाव ने अमेरिकी खजाने पर रक्षा खर्चों का असहनीय बोझ लाद दिया है। युद्ध की इस अंधी फंडिंग ने 'ग्रीनबैक' (डॉलर) के एकाधिकार पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे वैकल्पिक व्यापारिक मुद्राओं की मांग में तेजी आई है।

अर्थशास्त्रियों की स्पष्ट चेतावनी

यदि यह राजकोषीय घाटा नियंत्रित नहीं हुआ, तो वैश्विक शेयर बाजार एक ऐसे "लॉस्ट डिकेड" (दिशाहीन, शून्य रिटर्न का दशक) में प्रवेश कर जाएंगे जहां से उबरना पीढ़ियों का काम होगा।

भारत: तूफानी समंदर में संभलता लंगर

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की दहलीज पर खड़ा भारत इस वैश्विक भंवर से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। वॉल स्ट्रीट पर चढ़ती ब्याज दरें हमेशा से उभरते बाजारों के लिए पूंजी-निकासी का सबब बनती रही हैं। जब अमेरिकी ट्रेजरी अधिक रिटर्न का चारा फेंकती है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक दलाल स्ट्रीट से तरलता खींचकर डॉलर की सुरक्षित पनाहगाहों की ओर दौड़ते हैं - जिसका सीधा दबाव भारतीय रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।

इसके साथ ही, वाशिंगटन की हालिया संरक्षणवादी नीतियों और आयात शुल्कों ने भारत के निर्यात अधिशेष को मामूली चोट पहुंचाई है।

फिर भी, इस तूफानी समंदर में भारतीय पोत हैरान करने वाले संतुलन के साथ तैर रहा है।

7.8% की रियल जीडीपी वृद्धि

जून-अगस्त 2026 की तिमाही में भारत की 7.8% की अनुमानित विकास दर किसी आर्थिक चमत्कार से कम नहीं है।

घरेलू मांग का सुरक्षा-कवच

रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह, सुदृढ़ ग्रामीण उपभोग और घरेलू पूंजीगत व्यय ने बाहरी झटकों के खिलाफ एक अभेद्य दीवार खड़ी की है।

परंतु आत्ममुग्धता की कोई गुंजाइश नहीं है। जब 40 ट्रिलियन डॉलर का टाइटैनिक हिचकोले खाता है, तो समंदर में उठने वाली लहरें सबसे मजबूत नावों को भी डगमगा सकती हैं। दुनिया अब उस चौराहे पर खड़ी है जहां वित्तीय संप्रभुता का भ्रम टूट रहा है, और नए आर्थिक भूगोल की पटकथा लिखी जा रही है।

( लेखिका आर्थिक मामलों की जानकार हैं और आलेख में वक्तव्य विचार उनके निजी हैं। )