चंडीगढ़। सामाजिक प्रगति और आधुनिकता के बड़े-बड़े दावों के बावजूद पंजाब में लैंगिक समानता की जमीनी हकीकत आज भी चिंताजनक है। शिक्षा से लेकर रोजगार के मोर्चे तक बेटियां आज भी चुनौतियों और भेदभाव से जूझ रही हैं। हाल ही में जारी "वूमेन एंड मेन इन इंडिया: सिलेक्टेड इंडिकेटर्स एंड डेटा" रिपोर्ट के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में महिलाओं की श्रम भागीदारी और रोजगार दर न सिर्फ पुरुषों से, बल्कि राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम है। वहीं, बेटियों की पढ़ाई पर होने वाला खर्च भी बेटों की तुलना में बेहद कम है, जो राज्य में गहरे सामाजिक अंतर को उजागर करता है।

रोजगार के मोर्चे पर पिछड़तीं महिलाएं: राष्ट्रीय औसत से भी पीछे

रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में कार्यबल (वर्कफोर्स) के भीतर महिलाओं की उपस्थिति बेहद निराशाजनक है। आंकड़ों के आईने में स्थिति कुछ इस प्रकार है:

श्रम भागीदारी (LFPR): पंजाब में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की केवल 38.2% महिलाएं ही श्रमबल का हिस्सा हैं, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 40% है। तुलनात्मक रूप से देखें तो पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में यह आंकड़ा 64.7% है। पंजाब में पुरुषों की श्रम भागीदारी दर 75.4% है।

रोजगार की दर: पंजाब में केवल 20% महिलाएं ही किसी न किसी रोजगार से जुड़ी हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात लगभग 27% है।

बेरोजगारी का डबल अटैक: पंजाब में महिला बेरोजगारी दर 7.3% दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत (3.1%) से दोगुने से भी अधिक है। इसके मुकाबले हिमाचल प्रदेश में यह महज 2.3% और हरियाणा में लगभग 4% है।

शिक्षा के बजट में भी भेदभाव: लड़कों पर ज्यादा मेहरबान परिवार

रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू शिक्षा पर होने वाला लैंगिक खर्च है। पंजाब के परिवार बेटियों की तुलना में बेटों की पढ़ाई पर काफी अधिक पैसा खर्च कर रहे हैं:

सालाना शिक्षा खर्च का तुलनात्मक चार्ट

क्षेत्रलड़कों पर औसत खर्चलड़कियों पर औसत खर्च
ग्रामीण पंजाब₹ 24,168₹ 16,327
शहरी पंजाब₹ 28,044₹ 23,158
कुल औसत खर्च₹ 25,102₹ 19,146

यह आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि आज भी समाज में लड़कों की उच्च और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लड़कियों की तुलना में अधिक प्राथमिकता दी जा रही है।

स्वास्थ्य के प्रति बेरुखी: स्क्रीनिंग और जागरूकता की भारी कमी

आर्थिक और शैक्षणिक मोर्चे के अलावा, महिलाओं की सेहत से जुड़े आंकड़े भी डराने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और जांच सुविधाओं की बेहद कमी है:

30-49 वर्ष आयु वर्ग की केवल 24% महिलाओं की ही आज तक सर्वाइकल कैंसर की जांच हो सकी है।

स्तन (ब्रेस्ट) कैंसर की स्क्रीनिंग के मामले में भी यह आंकड़ा महज 24% पर सिमटा हुआ है।

इसके अलावा, एचआईवी संक्रमण की जांच और उसके उपचार से जुड़े आंकड़े भी महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति एक बड़े सुधार और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की मांग करते हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

सामाजिक और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए केवल सरकारी नीतियां काफी नहीं हैं, बल्कि बुनियादी सामाजिक सोच में बदलाव की सख्त जरूरत है। जब तक बेटियों की शिक्षा में निवेश नहीं बढ़ेगा और उनके लिए सुरक्षित व अधिक रोजगार के अवसर पैदा नहीं किए जाएंगे, तब तक राज्य में वास्तविक 'लैंगिक समानता' का लक्ष्य महज एक सपना बनकर रह जाएगा।