नई दिल्ली। राम दयालु सिंह सस्टेनेबल डेवलपमेंट फाउंडेशन (आरडीएसएसडीएफ) की अनुषंगी संस्था अमाइलॉयडोसिस सपोर्ट ग्रुप ऑफ इंडिया (एएसजीआई) ने देश में अत्यंत दुर्लभ एवं जानलेवा बीमारी एएल अमाइलॉयडोसिस को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में समुचित स्थान दिलाने के लिए व्यापक जनप्रतिनिधि अभियान शुरू किया है। इसी क्रम में संस्था के संस्थापक एवं स्वयं इस बीमारी से पीड़ित प्रो. (डॉ.) सतीश चंद्र ने लोकसभा के सभी 540 तथा राज्यसभा के सभी 240 सांसदों को विस्तृत पत्र भेजकर इस बीमारी को "गंभीर, जीवन-घातक अल्ट्रा-रेयर डिजीज" के रूप में मान्यता देने तथा कैंसर के समकक्ष उपचार एवं सरकारी सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है।
प्रो. चंद्र ने अपने पत्र में कहा है कि एएल अमाइलॉयडोसिस एक घातक प्लाज़्मा-सेल विकार है, जिसका उपचार ऑन्कोलॉजी विभागों में मल्टीपल मायलोमा की तरह कैंसर-रोधी दवाओं एवं स्टेम-सेल प्रत्यारोपण के माध्यम से किया जाता है। इसके बावजूद केवल बीमारी के नाम में "कैंसर" शब्द नहीं होने के कारण मरीज आयुष्मान भारत सहित विभिन्न सरकारी उपचार एवं वित्तीय सहायता योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।
उन्होंने सांसदों का ध्यान इस तथ्य की ओर भी आकर्षित किया कि इस बीमारी की पहचान अक्सर देर से हो पाती है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण सामान्य होते हैं। परिणामस्वरूप हृदय, गुर्दे और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को अपूरणीय क्षति पहुंचने के बाद ही अधिकांश मामलों का निदान हो पाता है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि अमाइलॉयडोसिस सपोर्ट ग्रुप ऑफ इंडिया (एएसजीआई) से पंजीकृत 14 मरीजों की अब तक मृत्यु हो चुकी है। संस्था का कहना है कि ये केवल आंकड़े नहीं, बल्कि ऐसे परिवारों की त्रासदी है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को इस दुर्लभ बीमारी के कारण खो दिया।
प्रो. चंद्र ने सांसदों को बताया कि विश्व के 36 से अधिक देशों में अमाइलॉयडोसिस के लिए समर्पित अनुसंधान कार्यक्रम, राष्ट्रीय रजिस्ट्रियां तथा विशेष उपचार केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं, जबकि भारत में अभी तक न तो भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के नेतृत्व में कोई राष्ट्रीय शोध कार्यक्रम प्रारंभ हुआ है, न राष्ट्रीय अमाइलॉयडोसिस रजिस्ट्री बनाई गई है और न ही जन-जागरूकता अभियान चलाया गया है।
उन्होंने सांसदों से संसद एवं भारत सरकार के समक्ष यह विषय उठाने का आग्रह करते हुए एएल अमाइलॉयडोसिस को राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति में शामिल करने, इसे कैंसर के समकक्ष मानते हुए सरकारी उपचार योजनाओं एवं आयुष्मान भारत के दायरे में लाने, महंगी ऑर्फन दवाओं की सुलभ उपलब्धता सुनिश्चित करने, राष्ट्रीय रजिस्ट्री, आईसीएमआर आधारित अनुसंधान कार्यक्रम, क्षेत्रीय सेंटर ऑफ एक्सीलेंस तथा समयबद्ध राष्ट्रीय क्लिनिकल गाइडलाइन तैयार करने की मांग की है।
उल्लेखनीय है कि राम दयालु सिंह सस्टेनेबल डेवलपमेंट फाउंडेशन (आरडीएसएसडीएफ) एवं अमाइलॉयडोसिस सपोर्ट ग्रुप ऑफ इंडिया (एएसजीआई) की ओर से इसी विषय पर 2 जुलाई, 2026 को राज्यसभा सचिवालय की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी समिति के समक्ष एक विस्तृत याचिका भी प्रस्तुत की जा चुकी है। संस्था को उम्मीद है कि सांसदों के हस्तक्षेप से यह दुर्लभ बीमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और संसदीय विमर्श का हिस्सा बनेगी, जिससे हजारों वर्तमान एवं भावी मरीजों को समय पर उपचार, अनुसंधान आधारित चिकित्सा और आर्थिक सहायता उपलब्ध हो सकेगी।





