जबलपुर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बरगी बांध में हुआ भीषण क्रूज हादसा मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा गया है। 15 वर्षों से अधिक समय से संचालित इस क्रूज सेवा में सुरक्षा की ऐसी भारी चूक हुई कि देखते ही देखते पर्यटकों की खुशियां मातम में बदल गईं। प्रत्यक्षदर्शियों और जीवित बचे लोगों के बयानों ने साफ कर दिया है कि यदि समय रहते सुरक्षा ऑडिट और नियमों का पालन किया गया होता, तो कई मासूमों की जान बचाई जा सकती थी।
चश्मदीदों की जुबानी: मौत का वो मंजर
हादसे में जीवित बचे लोगों के आरोप दिल दहला देने वाले हैं। पर्यटकों का कहना है कि क्रूज पर लाइफ जैकेट और अन्य आपातकालीन उपकरणों का नामोनिशान नहीं था।
जूलियस (पीड़ित): अपनी पत्नी को खो चुके जूलियस ने बताया, "जब जहाज डूबने लगा, तब अफरा-तफरी में लाइफ जैकेट बांटे गए। उससे पहले सुरक्षा का कोई नामोनिशान नहीं था।" इस हादसे में उनकी बेटी और नाती अब भी लापता हैं।
प्रिया शर्मा (जीवित बचीं): प्रिया के अनुसार, क्रूज में पर्यटकों को क्षमता से अधिक 'ठूंस-ठूंसकर' भरा गया था। उन्होंने बताया कि रेलिंग इतनी नीची थी कि कोई भी गिर सकता था और बच्चे असुरक्षित ढंग से घूम रहे थे।
ममता की आखिरी जीत: सीने से लिपटा मिला 'लाल'
शुक्रवार को आगरा से आई विशेष डाइविंग टीम जब पानी के भीतर डूबे क्रूज के मलबे तक पहुंची, तो वहां का मंजर देख अनुभवी गोताखोरों का कलेजा भी मुंह को आ गया।
अटूट बंधन: शून्य विजिबिलिटी के बीच गोताखोरों को एक महिला का शव मिला, जिसने अपने मासूम बच्चे को काल के गाल में समाने से पहले अपने सीने से मजबूती से चिपका रखा था।
भावुक क्षण: बचाव दल के अनुसार, 12 घंटे पानी के भीतर रहने के बावजूद माँ की पकड़ ढीली नहीं हुई थी। लोहे की नुकीली रॉड्स और मलबे के बीच से इस माँ-बेटे को बाहर निकालना ऑपरेशन का सबसे चुनौतीपूर्ण और भावुक हिस्सा रहा।
संकरा रास्ता और जान का जोखिम: डाइवर्स की अग्निपरीक्षा
आगरा की डाइविंग टीम के लिए यह ऑपरेशन किसी युद्ध से कम नहीं है। क्षतिग्रस्त क्रूज का ढांचा गोताखोरों के लिए 'डेथ ट्रैप' (मौत का जाल) साबित हो रहा है।
"क्रूज के भीतर लोहे की चादरें और ग्रिल इस कदर मुड़ गई हैं कि एक गोताखोर बीच में फंस गया था। हम हैमर (हथौड़े) से मलबा तोड़कर रास्ता बना रहे हैं।" — बचाव दल का सदस्य
लापरवाही की इंतहा: "ताले में बंद थीं लाइफ जैकेट"
हादसे में जीवित बची दिल्ली की संगीता कोरी ने जो खुलासे किए हैं, वे पर्यटन विभाग और क्रूज संचालकों को कटघरे में खड़ा करते हैं:
अनदेखी: तूफान की चेतावनी के बावजूद चालक ने क्रूज को पानी में उतारा।
अपराध: पर्यटकों को लाइफ जैकेट बांटी ही नहीं गई थीं। जब क्रूज डूबने लगा, तब स्टोर रूम का ताला तोड़कर जैकेट निकालने की कोशिश की गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
रेस्क्यू स्टेटस: एक नज़र में
| स्थिति | विवरण |
|---|---|
| कुल बरामद शव | 09 |
| अभी भी लापता | 06 |
| बचाव दल | सेना, NDRF, और आगरा डाइविंग टीम |
| उपकरण | हाइड्रोलिक मशीनें, गैस कटर और रिमोट कैमरा |
प्रशासनिक मोर्चा: कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह और धर्मेंद्र लोधी लगातार घटनास्थल पर डटे हुए हैं। गैस कटर के जरिए क्रूज के हिस्सों को काटा जा रहा है ताकि शेष लापता लोगों तक पहुंचा जा सके। लेकिन सवाल वही बना हुआ है— क्या मुनाफे की भूख में पर्यटकों की जान को दांव पर लगाना अब एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है?
भोपाल की घटना से नहीं लिया सबक
यह पहली बार नहीं है जब मध्य प्रदेश के जल निकायों में सुरक्षा को लेकर लापरवाही सामने आई हो। साल 2022 में भोपाल की ऊपरी झील (अपर लेक) में भी एक क्रूज आंशिक रूप से डूब गया था। उस समय पर्यटन विभाग ने कड़े ऑडिट, मजबूत रेलिंग और अनिवार्य लाइफ जैकेट का वादा किया था।
कड़वा सच: सूत्रों का दावा है कि विभाग के वादे केवल कागजों तक सीमित रहे। नियमित ऑडिट की कमी और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन ने बरगी में इस त्रासदी को न्यौता दिया।
सत्ता का आश्वासन और प्रशासन की सक्रियता
हादसे के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दुख जताते हुए कहा कि राज्य सरकार प्रभावित परिवारों के साथ खड़ी है और हर संभव सहायता सुनिश्चित की जा रही है। मौके पर जबलपुर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह सहित बचाव दल (SDRF) राहत कार्यों में जुटे हैं। हालांकि, स्थानीय पर्यटकों और मृतक के परिजनों में भारी रोष है। पर्यटक अशोक सक्सेना सवाल उठाते हैं, "क्या प्रशासन तभी जागता है जब कोई बड़ी जान-माल की हानि हो जाती है?"
बरगी बांध: एक परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| नदी | नर्मदा |
| निर्माण काल | 1974 - 1990 |
| मुख्य उद्देश्य | सिंचाई और पनबिजली (90 MW) |
| पर्यटन | जबलपुर से 40 किमी दूर, बोटिंग और क्रूज के लिए प्रसिद्ध |
निष्कर्ष: बरगी बांध की यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि उन चेतावनियों की अनदेखी का नतीजा है जो पिछले कई सालों से दी जा रही थीं। अब सवाल यह है कि क्या इस बार जवाबदेही तय होगी, या फिर एक और जांच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी?





