तिरुवनंतपुरम | केरल विधानसभा चुनावों की आहट के बीच राज्य का सियासी पारा गरमाया हुआ है। एक दशक तक सत्ता के शीर्ष पर रहने के बाद, क्या मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन लगातार तीसरी बार चुनावी मैदान में उतरेंगे? फिलहाल पार्टी के संकेतों को देखें तो विजयन ही इस जंग के सेनापति नजर आ रहे हैं। विज्ञापनों से लेकर होर्डिंग्स तक, सरकार की उपलब्धियों के साथ केवल विजयन की छवि का चमकना उनके निर्विवाद नेतृत्व की तस्दीक करता है।

विजयन के लिए मैदान में उतरना क्यों है जरूरी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजयन का चुनाव न लड़ना विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा दे सकता है। विपक्षी दल इसे "कैप्टन का डूबता जहाज छोड़कर भागना" करार दे सकते हैं। आधुनिक केरल के शिल्पकार माने जाने वाले विजयन का चुनावी मैदान में होना कैडरों के उत्साह के लिए अनिवार्य माना जा रहा है।

'दो कार्यकाल' के नियम पर संशय

2021 के चुनावों में माकपा ने दो बार विधायक रह चुके नेताओं को टिकट न देने का कड़ा फैसला लिया था, जिससे युवा चेहरों को मौका मिला और पार्टी को भारी जीत मिली। हालांकि, पिछले महीने पार्टी ने संकेत दिया कि इस नियम की समीक्षा की जाएगी।

सवाल यह है: क्या यह नियम पूरी तरह खत्म होगा या विजयन जैसे कुछ चुनिंदा नेताओं को इससे छूट मिलेगी?

उत्तराधिकार की दौड़ और विकल्प

पार्टी ने आधिकारिक तौर पर किसी उत्तराधिकारी का नाम नहीं लिया है, लेकिन कुछ प्रमुख नाम चर्चा में हैं:

के.के. शैलजा: पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और पार्टी की सबसे लोकप्रिय महिला नेता। यदि उन्हें दो कार्यकाल के नियम से छूट मिलती है, तो वे "पहली महिला मुख्यमंत्री" के विचार को जीवित रख सकती हैं।

पी.ए. मोहम्मद रियास: विजयन के दामाद और वर्तमान लोक निर्माण मंत्री। कोझिकोड के बेपोर से उनकी दूसरी पारी लगभग तय मानी जा रही है और चुनाव बाद उनकी भूमिका पर विजयन का निर्णय निर्णायक होगा।

विकास बनाम विचारधारा

जहाँ पूर्व मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन घोटालों और सामाजिक बुराइयों पर प्रहार के लिए जाने जाते थे, वहीं विजयन ने अपना ध्यान 'निवेश और बाजार-आधारित विकास मॉडल' पर केंद्रित किया है। हालांकि कांग्रेस इसे माकपा का 'दक्षिणपंथी झुकाव' बताती है, लेकिन माकपा को भरोसा है कि मध्यम वर्ग उनके इस विकासवादी एजेंडे का समर्थन करेगा।

निष्कर्ष: गेंद विजयन के पाले में

मई में 81 वर्ष के होने जा रहे पिनाराई विजयन के लिए यह चुनाव उनकी विरासत का लिटमस टेस्ट होगा। यदि वे फिर से जीतते हैं, तो पार्टी में उनका कद और भी अभेद्य हो जाएगा। हार की स्थिति में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभालते हैं या किसी नए सितारे के उदय का मार्ग प्रशस्त करते हैं।