कोलकाता | भारतीय निर्वाचन आयोग ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखों का ऐलान कर दिया है। राज्य की सभी 294 सीटों पर इस बार केवल दो चरणों में मतदान संपन्न होगा। चुनाव आयोग का यह फैसला रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि 2021 में यही प्रक्रिया 8 लंबी चरणों में पूरी हुई थी।
चुनाव का पूरा शेड्यूल
पहला चरण (152 सीटें): 23 अप्रैल 2026
दूसरा चरण (142 सीटें): 29 अप्रैल 2026
नतीजे: 4 मई 2026
विशेषज्ञों की राय: क्या 2 फेज ममता के लिए बनेंगे चुनौती?
वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चरणों की संख्या कम होना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए समीकरण बदल सकता है:
संसाधनों का विकेंद्रीकरण: वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी के अनुसार, 8 चरणों में टीएमसी को अपने चुनावी तंत्र और कैडर्स को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में केंद्रित करने का समय मिल जाता था। अब महज 6 दिनों के अंतर पर लगभग आधी-आधी सीटों पर एक साथ चुनाव होने से प्रबंधन की बड़ी चुनौती खड़ी होगी।
एंटी-इंकम्बेंसी का दबाव: राज्य में पिछले 15 वर्षों से टीएमसी का शासन है। लंबे समय की सत्ता के कारण पैदा हुई 'विरोधी लहर' को संभालना ममता के लिए इस बार कड़ा इम्तिहान होगा।
मोदी-शाह बनाम ममता: सीधा मुकाबला
वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल के विश्लेषण के मुताबिक, बंगाल का चुनाव एक बार फिर 'स्थानीय बनाम राष्ट्रीय' के बजाय ममता बनर्जी बनाम मोदी-शाह के चेहरे पर सिमट गया है।
ममता की ताकत: वह इकलौती ऐसी नेता मानी जाती हैं जो बीजेपी की आक्रामक पिच पर जाकर उन्हें टक्कर देती हैं। उनका हालिया 'लड़ाकू' रुख (जैसे ईडी बनाम पुलिस विवाद) यह दर्शाता है कि वह महीनों पहले से चुनावी मोड में हैं।
बीजेपी का चैलेंज: बीजेपी के पास अभी भी राज्य में ममता के कद का कोई स्थानीय चेहरा नहीं है, लेकिन उनकी संगठनात्मक मशीनरी नतीजों के आखिरी क्षण तक संघर्ष करने के लिए जानी जाती है।
मुख्य बदलाव और राजनीतिक निहितार्थ
| विशेषता | 2021 का चुनाव | 2026 का चुनाव |
|---|---|---|
| चरणों की संख्या | 8 चरण | 2 चरण |
| ममता का रुख | चरणों की संख्या की आलोचना की थी | फिलहाल इस मुद्दे पर मौन |
| मुख्य मुद्दा | स्थानीय अस्मिता और विकास | शासन-प्रशासन प्रणाली और सुरक्षा |
निष्कर्ष: जहाँ विपक्ष दो चरणों के फैसले को निष्पक्षता और गति के रूप में देख रहा है, वहीं टीएमसी के लिए यह 'करो या मरो' की स्थिति है। क्या ममता बनर्जी एक साथ इतनी सीटों पर अपना प्रभाव कायम रख पाएंगी या बीजेपी इस संक्षिप्त शेड्यूल का फायदा उठाकर सत्ता परिवर्तन करेगी, इसका फैसला 4 मई को होगा।





