कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले एक गंभीर संवैधानिक और प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है। राज्य की संशोधित मतदाता सूची से हटाए गए 23.4 लाख से अधिक लोगों के मताधिकार पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। विडंबना यह है कि इन मतदाताओं की अपील सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित 19 अपीलीय न्यायाधिकरण (Tribunals) बुनियादी ढांचे के अभाव में अब तक पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाए हैं।

समय की कमी और 'फ्रीज' होती मतदाता सूची

बंगाल में पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होना है, जिसके लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 6 अप्रैल (सोमवार) दोपहर 3 बजे तक है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, नामांकन के साथ ही संबंधित सीटों की मतदाता सूची 'फ्रीज' कर दी जाएगी।

प्रभाव: पहले चरण की 152 सीटों पर सोमवार दोपहर के बाद मतदाता सूची में कोई बदलाव संभव नहीं होगा, जिससे लाखों लोगों के लिए वोट देने का रास्ता तकनीकी रूप से बंद हो जाएगा।

सर्वाधिक प्रभावित जिले: मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में अपील के मामले सबसे अधिक हैं, जहाँ पहले चरण में ही मतदान होना है।

कागजों पर सिमटे न्यायाधिकरण: टेबल-कुर्सी तक की कमी

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीनी हकीकत चिंताजनक है। जोका स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी संस्थान में बनाए गए केंद्रीकृत परिसर में टेबल-कुर्सी जैसी मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है।

न्यायाधीशों की आपत्ति: सुनवाई का जिम्मा संभाल रहे कई सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की कमी और व्यवस्थागत अस्पष्टता पर गंभीर नाराजगी जताई है।

CEO की स्वीकारोक्ति: बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज कुमार अग्रवाल ने भी स्वीकार किया है कि न्यायाधिकरण निर्धारित समय पर पूरी क्षमता से शुरू नहीं हो पाएंगे। 20-25 लाख लंबित मामलों के मुकाबले वर्तमान क्षमता न के बराबर है।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश के घर पर हुई पहली सुनवाई: एक उम्मीद की किरण

इस अव्यवस्था के बीच एक ऐतिहासिक उदाहरण भी सामने आया। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम की अध्यक्षता वाले न्यायाधिकरण ने मुर्शिदाबाद के फरक्का से कांग्रेस प्रत्याशी मेहताब शेख का मामला उनके घर पर सुनकर निपटाया।

मामला: मेहताब शेख का नाम 2002 की सूची में था, लेकिन इस बार हटा दिया गया था, जिससे वह नामांकन नहीं कर पा रहे थे।

फैसला: न्यायाधिकरण ने दस्तावेजों की जांच के बाद उनका नाम मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया। यह न्यायाधिकरण द्वारा निपटाया गया राज्य का पहला अपील मामला बना।

मानवीय और लोकतांत्रिक संकट

करीब 60 लाख विचाराधीन मामलों में से 52 लाख का निपटारा हुआ, जिनमें से 23.4 लाख नाम खारिज कर दिए गए। ये सभी लोग कानूनी रूप से अपील के हकदार हैं, लेकिन अपीलीय तंत्र की विफलता उन्हें संविधान प्रदत्त सबसे बड़े अधिकार— 'वोट' से वंचित कर सकती है। सरकारी दफ्तरों में बढ़ती भीड़ और न्यायाधिकरणों की अनुपस्थिति ने प्रशासन की तैयारियों पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

मुख्य सांख्यिकी:

हटाए गए नाम: 23.4 लाख से अधिक।

गठित न्यायाधिकरण: 19 (प्रभावी रूप से निष्क्रिय)।

डेडलाइन: 6 अप्रैल, दोपहर 3:00 बजे (पहले चरण के लिए सूची फ्रीज)।

हॉटस्पॉट जिले: मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, 24 परगना।