नई दिल्ली/कोलकाता पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को निष्पक्ष और पारभयमुक्त संपन्न कराने के लिए निर्वाचन आयोग (EC) ने एक ऐतिहासिक और कड़ा निर्णय लिया है। आयोग ने राज्य में तैनात केंद्रीय बलों की कार्यप्रणाली और उनकी आवाजाही पर सीधी नजर रखने के लिए एक अत्याधुनिक 'मॉनिटरिंग सिस्टम' लागू करने का फैसला किया है।
इतिहास में पहली बार बदली रणनीति
अब तक के चुनावों में निर्वाचन आयोग केंद्रीय बलों के सदुपयोग के लिए पूरी तरह राज्य प्रशासन पर निर्भर रहता था। लेकिन यह पहली बार है जब आयोग खुद सीधे तौर पर बलों की गतिविधियों की निगरानी करेगा। सूत्रों के अनुसार, यह कदम विपक्षी दलों की उन शिकायतों के बाद उठाया गया है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि पिछला प्रशासन चुनावों के दौरान केंद्रीय बलों का सही इस्तेमाल नहीं करता था, ताकि सत्ताधारी दल को लाभ मिल सके।
तकनीक से होगी 'कमांडो' की निगरानी
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि चुनाव प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। निगरानी को पुख्ता करने के लिए दो प्रमुख तकनीकी उपाय किए जा रहे हैं:
बॉडी कैमरा: ड्यूटी पर तैनात जवानों की वर्दी पर 'बॉडी कैमरे' लगाए जाएंगे, जिससे उनके हर एक्शन पर नजर रखी जा सके।
GPS ट्रैकर्स: सुरक्षा बलों द्वारा उपयोग किए जाने वाले वाहनों में GPS सिस्टम लगाया जाएगा, ताकि उनकी रियल-टाइम लोकेशन और मूवमेंट को ट्रैक किया जा सके।
'जीरो टॉलरेंस' की नीति
मंगलवार को बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल और पुलिस नोडल अधिकारियों के साथ हुई उच्च स्तरीय बैठक में आयोग ने सख्त लहजे में कहा कि दिशा-निर्देशों के उल्लंघन पर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई जाएगी। सुरक्षा बलों के कमांडरों को अब प्रतिदिन अपनी तैनाती और आवाजाही की रिपोर्ट सौंपनी होगी।
"आयोग का संदेश साफ है—केंद्रीय बलों को अपना काम मुस्तैदी से करना होगा। इस बार हर गतिविधि पर हमारी नजर है।" > — वरिष्ठ अधिकारी, निर्वाचन आयोग
भारी तैनाती के संकेत
इस बार की तैयारियां असाधारण हैं। चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही, 10 मार्च तक केंद्रीय बलों की 480 कंपनियाँ बंगाल पहुँचने वाली हैं। 2021 के चुनावों में कुल 1,100 कंपनियाँ तैनात की गई थीं। जानकारों का मानना है कि जिस तरह आयोग शुरुआत से ही सख्त रुख अपना रहा है, उससे संकेत मिलते हैं कि इस बार सुरक्षा बलों की अब तक की सबसे भारी तैनाती देखी जा सकती है।
राज्य पुलिस की भूमिका पर उठते सवालों और विपक्षी दलों के अविश्वास के बीच, निर्वाचन आयोग का यह 'डिजिटल पहरा' बंगाल चुनावों में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है।





