चंडीगढ़: सिटी ब्यूटीफुल के प्रशासन को हिला देने वाले 116 करोड़ रुपये के फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) घोटाले में एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की मुख्य वित्त अधिकारी (CFO) नलिनी मलिक की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने अदालत में जो तथ्य पेश किए हैं, वे सरकारी तंत्र में गहरे तक फैली भ्रष्टाचार की जड़ों को उजागर करते हैं।
अफसरों की जेब में पहुँचे 50 करोड़
पुलिस ने ड्यूटी मजिस्ट्रेट को सूचित किया कि नलिनी मलिक और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को इस घोटाले को अंजाम देने के बदले 50 करोड़ रुपये का 'हिस्सा' मिला था। इस भारी-भरकम राशि के बदले सरकारी खजाने के साथ बड़ी हेराफेरी की गई। कोर्ट ने पुलिस को नलिनी मलिक से गहन पूछताछ के लिए चार दिन का रिमांड मंजूर किया है।
95 करोड़ के बजाय खाते में मिले महज 81 रुपये
घोटाले की परतें तब खुलीं जब स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद बैंक खातों और FD को नगर निगम (MC) के खाते में ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू हुई। रिकॉर्ड के मुताबिक:
अपेक्षित राशि: खातों में 95.78 करोड़ रुपये होने चाहिए थे।
वास्तविक राशि: जब निगम ने बैलेंस चेक किया, तो खाते में केवल 81.20 रुपये ही बचे थे। इस अंतर ने प्रशासन के होश उड़ा दिए और जांच में 116.84 करोड़ रुपये की फर्जी FD का खेल सामने आया।
शेल कंपनियाँ और रियल एस्टेट का 'खेल'
जांच एजेंसी के अनुसार, यह कोई साधारण चोरी नहीं बल्कि एक सुनियोजित कूटनीतिक अपराध था।
सांठगांठ: आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) के तत्कालीन शाखा प्रबंधक रिभव ऋषि ने नलिनी मलिक और क्रेस्ट के परियोजना निदेशक सुखविंदर सिंह के साथ मिलकर साजिश रची।
फर्जीवाड़ा: सरकारी धन को हड़पने के लिए फर्जी शेल कंपनियाँ बनाई गईं।
निवेश: फर्जी FD रसीदें तैयार कर असली पैसे को शेल कंपनियों के जरिए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में निवेश कर दिया गया।
बैंक अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका
इस घोटाले में बैंक कर्मियों की भूमिका सबसे अहम रही है। आरोपी रिभव ऋषि 2023 से 2025 के बीच सेक्टर-32 स्थित शाखा में तैनात था, जहां नगर निगम के खाते खुलवाए गए थे। पुलिस अब बैंक के संबंध प्रबंधक अभय कुमार और पूर्व अधिकारी सीमा धीमान की भूमिका की भी जांच कर रही है।
अब तक की गिरफ्तारियां: पुलिस इस मामले में सुखविंदर सिंह (परियोजना निदेशक, क्रेस्ट) और साहिल कुक्कर (लेखाकार) को पहले ही सलाखों के पीछे भेज चुकी है। नलिनी मलिक की गिरफ्तारी को अब इस घोटाले की अंतिम कड़ियों को जोड़ने के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निष्कर्ष: 116 करोड़ रुपये का यह गबन न केवल चंडीगढ़ नगर निगम की वित्तीय स्थिति पर चोट है, बल्कि यह स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की पारदर्शिता पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। पुलिस अब उन रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स की पहचान करने में जुटी है जहाँ सरकारी पैसा लगाया गया था।





