भोपाल:

मध्य प्रदेश में पवित्र नदी 'शिप्रा' के नाम को लेकर बरसों से चला आ रहा संशय अब हमेशा के लिए दूर हो गया है। मोहन यादव सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए निर्देश दिए हैं कि सूबे के सभी सरकारी दस्तावेजों में अब 'क्षिप्रा' की जगह शुद्ध रूप से ‘शिप्रा’ लिखा और माना जाएगा। गुरुवार को मंत्रालय में आयोजित नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) की उच्च स्तरीय बैठक के दौरान यह दिलचस्प वाकया सामने आया, जहां मुख्यमंत्री ने आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सरकारी ढर्रे की एक बड़ी भाषाई चूक को ऑन-द-स्पॉट पकड़ लिया।

जब मुख्यमंत्री के तर्कों के आगे AI को मांगनी पड़ी माफी

बैठक के दौरान जब अधिकारी मुख्यमंत्री के सामने डिजिटल प्रेजेंटेशन दे रहे थे, तब स्क्रीन पर नदी का नाम 'क्षिप्रा' लिखा देखकर इतिहास और संस्कृति के जानकार सीएम डॉ. मोहन यादव ने तुरंत आपत्ति जताई। इसके बाद जो हुआ, वह बेहद दिलचस्प था:

अधिकारियों और AI का पहला तर्क: अधिकारियों ने अपनी बात सही साबित करने के लिए तत्काल एआई (AI) की मदद ली। एआई ने शुरुआत में बताया कि संस्कृत शब्द 'क्षिप्र' (जिसका अर्थ तेज या द्रुत प्रवाह होता है) से 'क्षिप्रा' बना है।

मुख्यमंत्री का पलटवार: सीएम ने इस तर्क को बीच में ही टोकते हुए कहा कि उज्जैन की इस पवित्र नदी की धारा (मानसून को छोड़कर) स्वाभाविक रूप से बेहद मंथर यानी धीमी गति से चलती है, इसलिए 'तेज बहाव' वाला तर्क भौगोलिक रूप से गलत है।

ग्रंथों का संदर्भ और AI की माफी: मुख्यमंत्री के निर्देश पर जब एआई से यजुर्वेद और महाकवि कालिदास के ग्रंथों के संदर्भ में दोबारा सवाल पूछा गया, तो एआई ने तुरंत अपनी गलती स्वीकार की और बकायदा लिखित में माफी मांगते हुए 'शिप्रा' नाम को सही ठहराया।

इतिहास और सनातन ग्रंथों में दर्ज प्रामाणिक साक्ष्य

पुनः समीक्षा के दौरान एआई की स्क्रीन पर प्राचीन ग्रंथों के ये अकाट्य प्रमाण सामने आए, जिसके बाद नाम बदलने का अंतिम निर्णय लिया गया:

1. यजुर्वेद का प्रमाण: ऋषियों ने प्राचीन यजुर्वेद में ‘शिप्रे: अवे: पत्र:’ कहकर इस पावन नदी का स्मरण किया है।

2. कालिदास का 'रघुवंश': महाकवि कालिदास ने रघुवंशम के इंदुमती स्वयंवर प्रसंग में स्पष्ट रूप से ‘शिप्रातरंगानिलकम्पि तासु’ लिखा है।

3. कालिदास का 'मेघदूत': मेघदूत ग्रंथ में भी नदी से उठने वाली शीतल हवा का वर्णन करते हुए ‘शिप्रावातः प्रियतम इवं प्रार्थनाचाटुकारः’ का उल्लेख मिलता है।

बैठक में लिए गए अन्य महत्वपूर्ण फैसले

इस भाषाई सुधार के बाद बैठक का माहौल काफी हल्का-फुल्का हो गया। इसी बैठक में प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा नदी और श्रद्धालुओं से जुड़े कई अन्य बड़े प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई:

'नमन मिशन' का गठन: नर्मदा परिक्रमा पथ को पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त करने और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार के लिए 100 करोड़ रुपये के वार्षिक बजट से 'नमन मिशन' बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ।

दीनदयाल रसोई योजना: परिक्रमा मार्ग पर आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत आवश्यकताओं, सूचना पट्टिकाओं और प्रमुख मंदिरों के पास भोजन व्यवस्था के लिए बंद पड़ी ‘दीनदयाल रसोई’ योजनाओं को दोबारा शुरू किया जाएगा।

अमरकंटक में जैव विविधता संस्थान: मां नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक की पर्यावरण सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए वहां एक अत्याधुनिक ‘जैव विविधता प्रबंधन संस्थान’ की स्थापना की जाएगी।

निष्कर्ष:

यह घटना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, लेकिन देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक वास्तविकताओं के सटीक मूल्यांकन के लिए इंसानी सूझबूझ और पारंपरिक ज्ञान की प्रासंगिकता हमेशा सर्वोपरि रहेगी।