चंडीगढ़: 'सिटी ब्यूटीफुल' के नाम से मशहूर चंडीगढ़ में एक तरफ उद्योगों को पंख लगाने की तैयारी चल रही है, तो दूसरी तरफ शहर की बुनियाद रखने वाले अन्नदाता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। चंडीगढ़ के 22 गांवों के किसानों और भूमि मालिकों ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। आरोप है कि शहर के विस्तार के लिए अपनी उपजाऊ जमीन देने वाले मूल निवासियों के लिए प्रशासन के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं है।

उद्योगपतियों में उत्साह, ग्रामीणों में आक्रोश

प्रशासन द्वारा उद्योगों को प्रोत्साहन देने के कदमों का जहां व्यापारिक जगत स्वागत कर रहा है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भारी नाराजगी है। पेंडू विकास मंच के प्रधान सतिंदर सिंह और स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन का दोहरा रवैया अब बर्दाश्त से बाहर है। किसानों ने स्पष्ट किया है कि वे औद्योगिक प्रगति के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास की इस दौड़ में उन्हें हाशिए पर धकेला जाना मंजूर नहीं है।

किसानों की प्रमुख मांगें: न्याय और समानता

ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने अपनी मांगों का मसौदा रखते हुए 'समान न्याय' की गुहार लगाई है:

लैंड पूलिंग नीति: किसानों की मांग है कि चंडीगढ़ में भी पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर एक प्रभावी और पारदर्शी लैंड पूलिंग पॉलिसी लागू की जाए।

मुआवजे में बढ़ोतरी: वर्तमान में मुआवजे के लिए तय मल्टीप्लाइंग फैक्टर (1.25) को नाकाफी बताते हुए इसे पंजाब की तर्ज पर बढ़ाकर 2 करने की मांग की गई है।

अधिकारों की सुरक्षा: ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि दशकों से शहर को अपनी जमीन देने वाले मूल निवासियों के लिए आज तक कोई ठोस नीति क्यों नहीं बनाई गई?

प्रशासन से तीखे सवाल: "हमें हक से वंचित क्यों रखा?"

किसानों ने सीधे तौर पर प्रशासक, वित्त सचिव और उपायुक्त को कटघरे में खड़ा किया है। उनका तर्क है कि जब पड़ोसी राज्यों में किसानों को उनकी जमीन का उचित हक और विकास में हिस्सेदारी मिल रही है, तो चंडीगढ़ के भूमि मालिकों के साथ भेदभाव क्यों किया जा रहा है?

"हमने इस शहर को अपनी सबसे उपजाऊ जमीनें दीं ताकि यह 'ब्यूटीफुल' बन सके, लेकिन आज हम अपने ही अधिकारों के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अब समय आ गया है कि हमें भी अन्य राज्यों की तरह समान अधिकार और न्याय मिले।" — सतिंदर सिंह, प्रधान, पेंडू विकास मंच

आगे की रणनीति: आर-पार की लड़ाई

प्रशासन की चुप्पी से नाराज ग्रामीणों ने अब 'पक्के मोर्चे' की तैयारी शुरू कर दी है। गांवों में बैठकों का दौर जारी है और जल्द ही एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने की चेतावनी दी गई है। यदि प्रशासन ने समय रहते किसानों की सुध नहीं ली, तो चंडीगढ़ की सड़कों पर विकास की चमक के बीच विरोध का धुआं उठना तय है।