करनाल: शहर के निजी स्कूलों में नए शैक्षणिक सत्र की घंटी बजते ही अभिभावकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। शिक्षा की आड़ में निजी स्कूलों और पब्लिशर्स की मिलीभगत का एक ऐसा 'बिजनेस मॉडल' सामने आया है, जहाँ अभिभावकों को विकल्प के बजाय मजबूरी परोसी जा रही है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और दुकानों के बाहर लगी लंबी कतारें इस अव्यवस्था की गवाही दे रहे हैं।

'सेट' की मजबूरी, जेब पर भारी

अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन और पब्लिशर्स ने मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह रचा है, जिसमें केवल किताबें ही नहीं, बल्कि कॉपियां और कवर भी एक ही पैकेज में अनिवार्य कर दिए गए हैं।

दबाव की राजनीति: दुकानदार अभिभावकों को एकल (Single) किताब देने से मना कर रहे हैं। उनका तर्क है कि फिलहाल पूरा 'सेट' ही उपलब्ध है।

समय का खेल: पब्लिशर्स का कहना है कि 'खुला सेट' 6 अप्रैल के बाद मिलेगा, लेकिन तब तक स्कूल शुरू हो चुके होंगे, जिससे मजबूरन अभिभावकों को अभी पूरा महंगा पैकेज खरीदना पड़ रहा है।

चुनिंदा दुकानों पर घंटों का इंतजार

शहर की कुछ चुनिंदा दुकानों पर ही विशेष स्कूलों की किताबें मिलने के कारण वहाँ सुबह से ही 'जनसैलाब' उमड़ रहा है। घंटों लाइन में लगने के बाद भी कई बार किताबें खत्म होने का बहाना बना दिया जाता है, जिससे अभिभावकों को बार-बार चक्कर काटने पड़ रहे हैं। अभिभावकों की मांग है कि भीड़ को देखते हुए पब्लिशर्स को अतिरिक्त स्टाफ और काउंटर लगाने चाहिए थे।

स्कूल बनाम पब्लिशर: जिम्मेदारी किसकी?

इस पूरे विवाद में जिम्मेदारी को लेकर खींचतान जारी है:

अभिभावकों का तर्क: स्कूल प्रबंधन जानबूझकर ऐसे वेंडरों को काम देता है जो कमीशन के चक्कर में मनमानी करते हैं। स्कूलों को पता होता है कि कितने छात्र हैं, फिर भी पर्याप्त स्टॉक की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती?

स्कूलों का बचाव: कुछ स्कूलों का कहना है कि वे कॉपियां खरीदने के लिए मजबूर नहीं करते, यह पब्लिशर्स की अपनी मनमानी है।

पब्लिशर्स का पक्ष: उनका कहना है कि शुरुआत में सेट में ही सामग्री आती है और कुछ दिनों बाद फुटकर किताबें भी उपलब्ध करा दी जाएंगी।

जनता की मांग: प्रशासन करे हस्तक्षेप

शिक्षा के इस व्यवसायीकरण से परेशान अभिभावकों ने जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि स्कूलों को किसी एक वेंडर के बजाय किताबों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि वे कहीं से भी उचित दाम पर किताबें खरीद सकें।

अभिभावक की आवाज: "एक तरफ बच्चों की पढ़ाई की चिंता है, दूसरी तरफ यह आर्थिक शोषण। पूरा सेट खरीदने के नाम पर अनावश्यक सामग्री थमाई जा रही है, जो सरासर गलत है।"

यह स्थिति दर्शाती है कि नियम-कायदों के बावजूद धरातल पर निजी स्कूलों की 'मोनोपॉली' बरकरार है, जिसका सीधा असर आम आदमी के बजट पर पड़ रहा है।