प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल जिले के एक निजी परिसर में नमाजियों की संख्या सीमित करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए जिला प्रशासन को सख्त हिदायत दी है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान संभल के पुलिस अधीक्षक (SP) और जिलाधिकारी (DM) की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि अधिकारी कानून का शासन स्थापित करने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए।
"इस्तीफा दें या ट्रांसफर करवाएं": कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
मामले की पिछली सुनवाई (27 फरवरी) का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि जिला अधिकारियों का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है, न कि नागरिकों के अधिकारों का हनन करना। कोर्ट ने कहा:
"यदि आप (SP और DM) जिले में कानून का राज स्थापित नहीं कर सकते, तो आपको अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर कहीं और अपना तबादला करवा लेना चाहिए।"
विवादित ढांचा 'मस्जिद' नहीं, पर नमाज पर रोक नहीं
कोर्ट ने याचिकाकर्ता मुनाजिर खान द्वारा प्रस्तुत ढांचे की तस्वीरों का अवलोकन करने के बाद एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड और तस्वीरों के अनुसार, वह स्थान "आज की तारीख तक मस्जिद नहीं है", बल्कि एक दो मंजिला घर है।
निजी अधिकार: कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी व्यक्ति के निजी परिसर में प्रार्थना या धार्मिक आयोजन पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकती, चाहे वह किसी भी धर्म का हो।
परंपरा का पालन: कोर्ट ने निर्देश दिया कि 1995 से चली आ रही परंपरा के अनुसार वहां नमाज अदा की जा सकती है और प्रशासन इसमें संख्या की सीमा तय करके हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
क्या था पूरा मामला?
संभल निवासी मुनाजिर खान ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि जिला प्रशासन ने रमजान के महीने में उनके परिसर में नमाजियों की संख्या केवल 20 तक सीमित कर दी थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि उनके दादा ने 1995 में इसे बनवाया था और यह वक्फ संपत्ति है। हालांकि, कोर्ट ने माना कि यह एक रिहायशी मकान जैसा है, लेकिन चूंकि वहां लंबे समय से नमाज पढ़ी जा रही है, इसलिए सुरक्षा प्रदान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
विविधता ही भारत की ताकत: हाई कोर्ट
सुनवाई के दौरान अदालत ने भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि और विविधता पर भावुक टिप्पणी करते हुए कहा:
"1.4 अरब की आबादी वाले इस देश की खूबसूरती इसके लचीलेपन और ताकत में निहित है, जो इसकी ऐतिहासिक, धार्मिक और भाषाई विविधता से पैदा होती है। दुनिया में ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है जहाँ सदियों से हर बड़े धर्म और संस्कृति का सह-अस्तित्व रहा हो।"
राज्य सरकार का पक्ष
उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि वह किसी की निजी संपत्ति या पूजा स्थल पर धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करती है। सरकार ने भरोसा दिलाया कि यदि कोई अराजक तत्व धार्मिक कार्यों में बाधा डालने की कोशिश करता है, तो प्रशासन पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराएगा।
निष्कर्ष: हाई कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि 'अमन-चैन' के नाम पर नागरिकों के संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों का गला नहीं घोंटा जा सकता। कोर्ट ने संभल प्रशासन को 16 मार्च के अपने आदेश के जरिए कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का अंतिम निर्देश दिया है।





