कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रशासनिक और शैक्षणिक मोर्चे पर दो बड़े और दूरगामी फैसले लिए हैं। एक ओर जहाँ राज्य में पशु वध को लेकर दशकों पुराने कानून को सख्ती से लागू करने का आदेश जारी किया गया है, वहीं दूसरी ओर स्कूलों की प्रार्थना सभा के स्वरूप में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है।
1. पशु वध पर शिकंजा: 14 वर्ष की आयु और फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य
कलकत्ता हाई कोर्ट के 2018 के आदेश और 'पश्चिम बंगाल पशु हत्या नियंत्रण अधिनियम, 1950' का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया है। अब राज्य में गायों सहित अन्य पशुओं की हत्या बिना लिखित अनुमति के नहीं की जा सकेगी।
प्रमुख शर्तें और नियम:
फिटनेस प्रमाण पत्र: किसी भी जानवर (गाय, बैल, सांड, बछड़ा, भैंस) की हत्या से पहले यह प्रमाणित करना होगा कि वह वध के लिए उपयुक्त है।
अधिकार क्षेत्र: यह प्रमाण पत्र केवल नगरपालिका अध्यक्ष या पंचायत समिति के सभापति द्वारा, एक सरकारी पशु चिकित्सक के साथ संयुक्त रूप से जारी किया जा सकता है।
अनिवार्य मानदंड: अनुमति केवल तभी दी जाएगी जब जानवर की आयु 14 वर्ष से अधिक हो और वह प्रजनन या काम के योग्य न रहा हो, अथवा वह किसी गंभीर चोट या असाध्य बीमारी से स्थायी रूप से अक्षम हो गया हो।
2. स्कूलों में गूंजेगा 'वंदे मातरम': शिक्षा विभाग का नया फरमान
राज्य के शिक्षा विभाग ने एक महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी करते हुए सभी सरकारी और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में सुबह की प्रार्थना सभा (मॉर्निंग असेंबली) के दौरान 'वंदे मातरम' गाना अनिवार्य कर दिया है।
नया प्रोटोकॉल:
कक्षाएं शुरू होने से पहले सभी छात्रों द्वारा वंदे मातरम का गायन तत्काल प्रभाव से लागू करने को कहा गया है।
इसका उद्देश्य छात्रों में राष्ट्रभक्ति की भावना को और सुदृढ़ करना है।
स्कूलों में असमंजस की स्थिति
सरकार के इस फैसले के बाद स्कूल प्रबंधन के सामने समय प्रबंधन की चुनौती खड़ी हो गई है। शिक्षकों का कहना है कि:
राष्ट्रगान (जन-गण-मन) अनिवार्य है और उसे हटाया नहीं जा सकता।
पिछली सरकार ने राज्य गीत (बांग्लार माटी, बांग्लार जल) को अनिवार्य किया था।
अब वंदे मातरम जुड़ने से प्रार्थना सभा लंबी हो जाएगी, जिससे कक्षाओं के समय में देरी होने की चिंता है।
स्कूल प्रमुख का बयान: "हम राष्ट्रगान और राज्य गीत के साथ अब वंदे मातरम को भी शामिल करेंगे। हालांकि, तीन-तीन गीतों के गायन से प्रार्थना सभा का समय बढ़ जाएगा, जिससे शैक्षणिक सत्र के समय को समायोजित करना एक चुनौती होगी।"
निष्कर्ष: सरकार के ये दोनों ही फैसले राज्य की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था में एक नई चर्चा को जन्म दे रहे हैं। जहाँ पशु वध पर कानून की सख्ती से पशु संरक्षण को बल मिलने की उम्मीद है, वहीं वंदे मातरम की अनिवार्यता को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।





