देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के डोईवाला स्थित पैनेसिया अस्पताल से एक बेहद दर्दनाक और डरावना हादसा सामने आया है। बुधवार को अस्पताल में एयर कंडीशनर (AC) फटने के कारण भीषण आग लग गई, जिससे पूरे परिसर में अफरा-तफरी और भगदड़ मच गई। इस वीभत्स हादसे में आईसीयू (ICU) में जिंदगी की जंग लड़ रही एक 55 वर्षीय महिला मरीज की मौत हो गई। वहीं, बचाव कार्य के दौरान तीन पुलिसकर्मियों सहित कुल 11 लोग झुलस गए हैं, जिनमें एक नवजात शिशु भी शामिल है।
धमाके के बाद धुएं का गुबार, सांस लेने के लिए तड़पे मरीज
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पैनेसिया अस्पताल में बुधवार को सब कुछ सामान्य चल रहा था कि अचानक एक जोरदार धमाके के साथ एसी में ब्लास्ट हो गया। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप ले लिया और कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत में दमघोंटू काला धुआं भर गया।
मची भगदड़: धुएं के कारण अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीजों को सांस लेने में भारी दिक्कत होने लगी।
बचाव कार्य: अस्पताल स्टाफ और स्थानीय लोगों ने मुस्तैदी दिखाते हुए आनन-फानन में मरीजों को वार्डों से बाहर निकालना शुरू किया। गंभीर रूप से बीमार मरीजों को स्ट्रेचर और व्हीलचेयर पर जैसे-तैसे बाहर सुरक्षित निकाला गया।
अधिकारी पहुंचे मौके पर: हादसे की खबर मिलते ही गढ़वाल मंडलायुक्त विनय शंकर पांडेय, सिटी मजिस्ट्रेट प्रत्यूष सिंह और एसएसपी प्रमेन्द्र सिंह डोबाल ने भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल का जायजा लिया। दमकल कर्मियों ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया।
दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट किए गए मरीज, 2 की हालत नाजुक
हादसे के बाद पूरे अस्पताल परिसर को खाली करा लिया गया है। एंबुलेंस की मदद से मरीजों को तुरंत नजदीकी चिकित्सालयों में भेजा गया। कैलाश अस्पताल में लाए गए छह मरीजों में से दो की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है और वे वेंटिलेटर/आईसीयू सपोर्ट पर हैं।
बड़ा सवाल: क्या फाइलों में ही सिमटा है फायर ऑडिट?
इस हादसे ने देहरादून के निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। पैनेसिया अस्पताल में लगी आग ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
सुरक्षा से खिलवाड़: दून में अधिकांश निजी अस्पताल बेहद सीमित जगह, संकरे रास्तों और कमजोर फायर सेफ्टी इंतजामों के बीच चल रहे हैं। कई अस्पतालों के पास न तो पर्याप्त पार्किंग है और न ही 'इमरजेंसी एग्जिट' (आपातकालीन निकास द्वार)।
| खामियां जो हादसे का सबब बनती हैं | जमीनी हकीकत |
|---|---|
| फायर ऑडिट व मॉक ड्रिल | सिर्फ कागजी औपचारिकताओं तक सीमित। |
| इलेक्ट्रिक उपकरणों की मॉनिटरिंग | भारी लोड के बावजूद एसी और बिजली लाइनों की समय पर चेकिंग नहीं होती। |
| प्रशासनिक रवैया | बड़ा हादसा होने पर ही जिम्मेदार विभाग जागते हैं, कुछ दिन बाद फिर वही लापरवाही शुरू हो जाती है। |
फायर ब्रिगेड की शुरुआती जांच में भले ही वजह एसी ब्लास्ट बताई जा रही हो, लेकिन विभाग अब आग लगने के वास्तविक और तकनीकी कारणों की गहराई से जांच कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर कब तक जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे रहेंगे और कब तक मासूम मरीजों की जिंदगी दांव पर लगती रहेगी?





