श्रीनगर/जम्मू | जम्मू-कश्मीर की शांत वादियों में इन दिनों 'शराबबंदी' के मुद्दे ने सियासी तपिश बढ़ा दी है। केंद्र शासित प्रदेश में धार्मिक आधार पर शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग ने एक ऐसे विवाद को जन्म दे दिया है, जहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही आर्थिक नफा-नुकसान और सामाजिक सरोकारों के बीच बंटे नजर आ रहे हैं।
उपमुख्यमंत्री का पलटवार: "हमारे दौर में नहीं खुलीं दुकानें"
सियासी घमासान के बीच उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी ने तीखा रुख अख्तियार किया है। उन्होंने इस मांग को उठाने वालों को आईना दिखाते हुए कहा कि उन्हें किसी औपचारिक मांग की जानकारी नहीं है। उन्होंने पिछली सरकारों, विशेषकर पीडीपी (PDP) पर निशाना साधते हुए कहा:
"शराब की दुकानें नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकाल में नहीं खुलीं। जब पीडीपी की सरकार थी या जब राज्यपाल शासन के दौरान नई दुकानें खोली जा रही थीं, तब इन नेताओं ने चुप्पी क्यों साधी थी?"
पार्टियों के सुर: संतुलन बनाम विरोध
शराबबंदी के इस संवेदनशील मुद्दे पर जम्मू-कश्मीर की प्रमुख पार्टियों का रुख कुछ इस प्रकार है:
| राजनीतिक दल | प्रमुख नेता | स्टैंड / तर्क |
|---|---|---|
| बीजेपी | बी.एस. मनकोटिया, पवन गुप्ता | व्यक्तिगत रूप से समर्थन, लेकिन राजस्व के नुकसान की चिंता। |
| कांग्रेस | जी.ए. मीर, इरफान लोन | बिना ठोस रणनीति के पाबंदी से अवैध तस्करी और ब्लैक मार्केटिंग बढ़ेगी। |
| पीडीपी | वहीद-उर-रहमान पारा | राजस्व के नाम पर युवाओं के स्वास्थ्य से समझौता किया जा रहा है। |
| NC | मीर सैफुल्लाह | सोच सकारात्मक है, लेकिन अंतिम निर्णय सरकार के पाले में है। |
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राजस्व बनाम नैतिकता की जंग
जहाँ एक ओर निर्दलीय विधायक शेख खुर्शीद इसे सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से अनिवार्य बता रहे हैं, वहीं सरकार के भीतर भी मतभेद साफ हैं। खेल मंत्री सतीश शर्मा ने व्यक्तिगत तौर पर शराबबंदी का समर्थन किया है, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि इसके आर्थिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
क्या हैं प्रमुख चुनौतियाँ?
विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी लागू करना केवल धार्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन बड़ी चुनौतियां हैं:
राजस्व का घाटा: शराब से मिलने वाला टैक्स राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है।
पर्यटन पर असर: एक प्रमुख पर्यटन स्थल होने के नाते, शराबबंदी का असर अंतरराष्ट्रीय और घरेलू सैलानियों पर पड़ सकता है।
अवैध व्यापार: कांग्रेस नेताओं की आशंका है कि बिहार और गुजरात की तरह यहाँ भी 'जहरीली शराब' या ब्लैक मार्केटिंग का खतरा बढ़ सकता है।
निष्कर्ष: फिलहाल जम्मू-कश्मीर विधानसभा में इस मुद्दे पर कोई सर्वसम्मति बनती नहीं दिख रही है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह धार्मिक भावनाओं और सामाजिक सुधारों के बीच तालमेल बिठाते हुए राज्य के खजाने को कैसे सुरक्षित रखती है।





