नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को समय पर और त्रुटिहीन तरीके से पूरा करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने कमर कस ली है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक ढांचे में चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता (Sanctity of Electoral Process) से समझौता नहीं किया जा सकता।
न्यायिक अधिकारियों की तैनाती पर अहम निर्देश
काम के भारी दबाव और सीमित समय को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को विशेषाधिकार देते हुए अतिरिक्त न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की अनुमति दी है। आदेश की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
अनुभव को प्राथमिकता: कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अब 3 साल से अधिक अनुभव वाले सिविल जजों (सीनियर और जूनियर डिवीजन दोनों) को एसआईआर प्रक्रिया में तैनात कर सकेंगे।
पड़ोसी राज्यों से मदद: यदि बंगाल में न्यायिक अधिकारियों की कमी बनी रहती है, तो सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड और उड़ीसा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से सहायता लेने का सुझाव दिया है।
सेवानिवृत्त अधिकारियों का विकल्प: आवश्यकता पड़ने पर इन राज्यों के सेवारत या सेवानिवृत्त (Retired) न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।
अदालत की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि एसआईआर जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया के लिए पर्याप्त मानव संसाधन होना अनिवार्य है। अदालत ने झारखंड और उड़ीसा के मुख्य न्यायाधीशों से आग्रह किया है कि यदि कलकत्ता हाई कोर्ट से न्यायिक अधिकारियों की मदद के लिए अनुरोध आता है, तो उस पर सहानुभूतिपूर्वक और तत्परता से विचार किया जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह आदेश?
समय सीमा: चुनाव पूर्व मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए समय बहुत कम बचा है।
पारदर्शिता: न्यायिक अधिकारियों की निगरानी में यह प्रक्रिया होने से पक्षपात की गुंजाइश खत्म होगी।
अंतर-राज्य समन्वय: यह अपनी तरह का दुर्लभ निर्देश है जहाँ एक राज्य की चुनाव प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए दूसरे राज्यों के न्यायिक तंत्र से सहयोग की बात कही गई है।





