कोलकाता: बंगाल की राजनीति में सोमवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। कहावत है— 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना', लेकिन कोलकाता के 'प्रमोद दासगुप्ता भवन' से लेकर जिलों के माकपा दफ्तरों तक जो माहौल था, वह केवल किसी की खुशी में शामिल होना नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक बदलाव का संकेत था।

विधानसभा चुनाव के नतीजों में जैसे-जैसे भाजपा की जीत के संकेत मिले, माकपा कार्यालयों में वह सन्नाटा टूट गया जो पिछले एक दशक से पसरा हुआ था। दोपहर होते-होते कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा, नारेबाजी हुई और हवा में एक अजीब सा उत्साह तैरने लगा।

विचित्र विरोधाभास: जीत भाजपा की, जश्न माकपा का?

हैरानी की बात यह है कि माकपा को इस चुनाव में महज एक सीट हासिल हुई है। फिर भी यह उत्साह क्यों? दरअसल, इस जश्न की जड़ें आंकड़ों से ज्यादा 'मनोवैज्ञानिक बढ़त' में छिपी हैं।

ध्रुवीकरण का अंत: पिछले एक दशक से बंगाल की राजनीति केवल टीएमसी और भाजपा के बीच सिमट कर रह गई थी। वामपंथ को 'अप्रासंगिक' मान लिया गया था।

दमन का हिसाब: 2011 में ममता बनर्जी द्वारा 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने के बाद, माकपा कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक उत्पीड़न और अत्याचार के आरोप लगाए थे। आज का जश्न उसी दमनकारी दौर के अंत की उम्मीद का प्रतीक है।

रणनीतिक सोच: 'शत्रु का शत्रु मित्र' या राजनीतिक अवसर?

माकपा के एक वरिष्ठ नेता ने इस हलचल को स्पष्ट करते हुए कहा:

"यह जश्न किसी विशेष दल की जीत का नहीं है। यह उस नैरेटिव के टूटने का है जिसमें वामपंथ को मृत घोषित कर दिया गया था। आज की तस्वीर बता रही है कि हम फिर से मैदान में हैं।"

विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की यह जीत तृणमूल कांग्रेस के उस अभेद्य किले को ढहा रही है, जिसने वामपंथ के लिए राजनीतिक जमीन पूरी तरह बंद कर दी थी। सत्ता परिवर्तन के बाद पैदा होने वाले 'शून्य' में वाम दल अब एक सशक्त विपक्ष के रूप में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की जुगत में हैं।

एक दिलचस्प मोड़

2026 के ये रुझान बंगाल को त्रिकोणीय संघर्ष की ओर ले जाते दिख रहे हैं। भले ही विधानसभा में संख्या बल कम हो, लेकिन सड़कों पर बढ़ती माकपा कार्यकर्ताओं की यह सक्रियता बता रही है कि 'तीसरा खिलाड़ी' अब अपनी वापसी की नई पटकथा लिखने के लिए पूरी तरह तैयार है।