बेंगलुरु। राजनीति में वादे और दावे तो रोज बनते-बिगड़ते हैं, लेकिन कुछ प्रण इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं। बात 23 अक्टूबर, 2019 की एक तूफानी और बारिश वाली रात की है। दिल्ली की तिहाड़ जेल के बाहर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हुजूम खड़ा था। जैसे ही कनकपुरा का यह कद्दावर नेता 50 दिनों की सलाखों के पीछे से बाहर आया, हर कोई हैरान था। हमेशा बेदाग सफेद कपड़ों और क्लीन-शेव लुक में रहने वाले डी.के. शिवकुमार के चेहरे पर एक घनी, आधी सफेद और आधी काली दाढ़ी उग आई थी।

जेल की तन्हाई में थके हुए दिखने वाले शिवकुमार ने उस वक्त अपने करीबियों से एक गुप्त प्रतिज्ञा साझा की थी—"जब तक कर्नाटक की कमान हाथ में नहीं आती, इस चेहरे पर उस्तरा नहीं लगेगा।" शनिवार को जब विधान सौध के दरवाजे उनके लिए खुले और वे सिद्दरमैया के उत्तराधिकारी के रूप में अधिकृत हुए, तो उनका वह ऐतिहासिक प्रण आखिरकार पूरा होने के मुहाने पर पहुंच गया।

वीडियो पार्लर से राजनीति के 'चाणक्य' बनने तक का सफर

1980 के दशक में बेंगलुरु दक्षिण जिले की एक छोटी सी दुकान... जो सिर्फ फिल्में किराये पर देने वाला वीडियो पार्लर नहीं, बल्कि शिवकुमार की राजनीतिक पाठशाला थी। यहाँ नौजवान जुटते थे, कारोबारी रणनीतियाँ बनती थीं और राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले कार्यकर्ता देर रात तक चर्चा करते थे। इसी दुकान से शिवकुमार ने राजनीति का सबसे बड़ा सबब सीखा—रिश्ते निभाना, एहसान याद रखना और लोगों के दिलों में जगह बनाना।

23 साल की उम्र में बड़ी चुनौती: 1985 में महज 23 साल की उम्र में उन्होंने सथानूर सीट पर जेडीएस सुप्रीमो व पूर्व पीएम एच.डी. देवगौड़ा को चुनौती दी। हालांकि वे पहला चुनाव हार गए, लेकिन इसने सूबे की सियासत में 'वोक्कालिगा' समुदाय के वर्चस्व की एक ऐसी कद्दावर प्रतिद्वंद्विता को जन्म दिया, जो आज भी जारी है।

कनकपुरा के 'बांडे' (द रॉक): अपने भाई डी.के. सुरेश के साथ मिलकर उन्होंने कनकपुरा को कांग्रेस का अभेद्य किला बना दिया। क्षेत्र के मुनाफेदार ग्रेनाइट और स्टोन-क्वेरी बिजनेस में दबदबे के कारण उन्हें 'कनकपुरा बांडे' (कनकपुरा का रॉक) कहा जाने लगा। विरोधियों के लिए यह उनकी आर्थिक ताकत का प्रतीक था, तो समर्थकों के लिए विपरीत राजनीतिक तूफानों में चट्टान की तरह डटे रहने की उनकी क्षमता का।

जब बने 'जायंट किलर' और दिल्ली के 'संकटमोचक'

डी.के. शिवकुमार उन चुनिंदा क्षेत्रीय नेताओं में से हैं जिन्होंने दिल्ली के भरोसे राजनीति नहीं की, बल्कि अपना एक स्वतंत्र और बेहद वफादार राजनीतिक साम्राज्य खड़ा किया।

किंगमेकर की भूमिका की दो बड़ी मिसालें:

2002 (महाराष्ट्र संकट): विलासराव देशमुख की सरकार को गिरने से बचाने के लिए महाराष्ट्र के विधायकों को बेंगलुरु के रिसॉर्ट्स में सुरक्षित रखा और अविश्वास प्रस्ताव पास कराया।

2017 (अहमद पटेल का राज्यसभा चुनाव): जब गुजरात में भाजपा आक्रामक मोर्चेबंदी कर रही थी, तब शिवकुमार ने गुजरात के कांग्रेस विधायकों की जिम्मेदारी संभाली। अहमद पटेल चुनाव जीते और शिवकुमार गांधी परिवार के सबसे भरोसेमंद 'क्राइसिस मैनेजर' बन गए।

इसी रसूख के कारण वे केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर आए। 2017 में आईटी के छापे पड़े और 2019 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी ने उन्हें गिरफ्तार किया। लेकिन शिवकुमार ने जेल की इस प्रताड़ना को भी अपनी 'राजनीतिक पूंजी' में बदल दिया।

धैर्य की परीक्षा और शिखर पर दस्तक

साल 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत दिलाने के बावजूद हाईकमान ने अनुभवी सिद्दरमैया को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी। कोई और नेता होता तो बगावत कर देता, लेकिन शिवकुमार ने इस झटके को अवसर में बदला। बेंगलुरु विकास मंत्री के रूप में उन्होंने शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को ऐसी रफ्तार दी कि वे जनता की अपरिहार्य पसंद बन गए।

अब, शनिवार की वो ऐतिहासिक सुबह आ चुकी है। शिवकुमार का लंबा इंतजार खत्म हुआ और कर्नाटक के सर्वोच्च शिखर का ताज उनके सिर सजने को तैयार है। अब पूरे कनकपुरा और कर्नाटक की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सात साल बाद आखिरकार वह उस्तरा उनकी ऐतिहासिक दाढ़ी तक पहुंच पाएगा!