लखनऊ | उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने सत्ताधारी भाजपा और चुनाव आयोग पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए इसे लोकतंत्र के खिलाफ एक 'बड़ी साजिश' करार दिया है। वहीं, बढ़ते विवाद और राजनीतिक दलों की मांग को देखते हुए चुनाव आयोग ने प्रक्रिया की समय-सीमा में बड़ा बदलाव किया है।
"वोट काटो अभियान": अखिलेश यादव के गंभीर आरोप
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कुछ चौंकाने वाले दावे किए हैं:
फॉर्म-7 का 'दुरुपयोग': सपा का आरोप है कि भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा फर्जी फॉर्म-7 (नाम हटाने के लिए आवेदन) भरकर विपक्षी समर्थकों, विशेषकर PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समुदाय के नाम हटवाए जा रहे हैं।
बड़ा टारगेट: सपा का दावा है कि प्रत्येक विधानसभा सीट से 7,000 से 15,000 वोट कटवाने का लक्ष्य रखा गया है।
संवेदनशील जिले: जौनपुर, सुल्तानपुर, मेरठ, कन्नौज और लखनऊ जैसे जिलों में एक ही व्यक्ति द्वारा दर्जनों फॉर्म जमा किए जाने के कथित प्रमाण दिए गए हैं।
चुनाव आयोग का एक्शन: समय-सीमा में विस्तार
विवाद और तकनीकी जटिलताओं को देखते हुए मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नवदीप रिनवा ने नई समय-सारणी की घोषणा की है:
दावे और आपत्तियां: फॉर्म-6 (नाम जोड़ने) और फॉर्म-7 (नाम हटाने) जमा करने की अंतिम तिथि अब 6 मार्च, 2026 तक बढ़ा दी गई है।
अंतिम प्रकाशन: अब अंतिम मतदाता सूची 10 अप्रैल, 2026 को जारी की जाएगी (पहले यह 6 मार्च को आनी थी)।
अब तक का आंकड़ा: ड्राफ्ट रोल में लगभग 2.89 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जिसे आयोग ने मृत्यु, पलायन और डुप्लीकेट एंट्री का परिणाम बताया है।
भाजपा का पलटवार: "हार के डर से बौखलाहट"
भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। भाजपा का कहना है कि:
यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और चुनाव आयोग के अधीन है।
सपा प्रमुख आगामी चुनावों में संभावित हार को देखकर 'आधारहीन' आरोप लगा रहे हैं।
पार्टी का लक्ष्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी अवैध मतदाता सूची में न रहे।
मुख्य विवाद का बिंदु: > विपक्ष का तर्क है कि 18.7% मतदाताओं का नाम एक साथ कटना संदेहास्पद है, जबकि आयोग का कहना है कि यह "गहन शुद्धिकरण" (Intensive Cleaning) का हिस्सा है ताकि मतदाता सूची पूरी तरह सटीक हो सके।





