संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा एपस्टीन फाइल का मुद्दा उठाया जाना कोई सनसनीखेज बयान नहीं, बल्कि सरकार की नैतिकता पर सीधा प्रहार था। इसके जवाब में मंत्री हरदीप सिंह पुरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने सवालों का समाधान करने के बजाय संदेह को और गहरा किया। सरकार आज जवाब देने की जगह बचाव की मुद्रा में दिखती है—और यही सबसे गंभीर संकेत है।
यह याद रखना जरूरी है कि एपस्टीन फाइल कोई विपक्षी कल्पना नहीं, बल्कि अमेरिका की न्यायिक एजेंसियों द्वारा सार्वजनिक किए गए आधिकारिक दस्तावेज़ हैं। जेफरी एपस्टीन 2008 में यौन अपराधों में दोषी ठहराया जा चुका था। इसके बावजूद, उसके साथ वर्षों बाद तक संवाद, आत्मीय भाषा और “हैव फन”, “एग्ज़ॉटिक आइलैंड” जैसे संदर्भ—क्या यह सब “पेशेवर संपर्क” की श्रेणी में आता है? विपक्ष का सवाल सीधा है - जब दुनिया भर में केवल संपर्क के आधार पर नेता पद छोड़ रहे हैं, तो भारत में जवाबदेही का मानक क्यों बदल जाता है?
सरकार की दलील है कि “मिलना अपराध नहीं।” विपक्ष भी यही मानता है। लेकिन सवाल मिलने का नहीं, मिलने के बाद की भाषा, संदर्भ और निरंतरता का है। नैतिकता ईमेलों की संख्या से नहीं, उनके आशय से तय होती है। एक भी संवाद अगर सत्ता की साख पर प्रश्न खड़ा करता है, तो उसका स्पष्ट, तथ्यपरक उत्तर देना सरकार का दायित्व है—न कि आलोचकों पर हमला।
इस पूरे प्रकरण में सरकार की सबसे चिंताजनक भूमिका सूचना-नियंत्रण की दिखाई देती है। विपक्षी ट्वीट्स पर आपत्ति, मीडिया को कथित “हिदायतें”, और सवालों से बचने की रणनीति—ये सब दर्शाते हैं कि सरकार को सच से कम, बहस से ज़्यादा डर है। यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो खुली बहस से परहेज़ क्यों?
राहुल गांधी का यह सवाल भी वाजिब है कि एपस्टीन फाइल के सार्वजनिक होने और भारत–अमेरिका ट्रेड डील की घोषणाओं के समय का मेल संयोग है या दबाव का परिणाम। लोकतंत्र में संदेह पैदा होना अपराध नहीं, उसे दूर करना सरकार की जिम्मेदारी है।
आज असली प्रश्न विपक्ष के आरोप नहीं, सरकार की चुप्पी है। बहुमत नैतिकता का विकल्प नहीं हो सकता। एपस्टीन फाइल ने सत्ता को
आईना दिखाया है—अब तय सरकार को करना है कि वह जवाबदेह लोकतंत्र की कसौटी पर खड़ी होती है या सवालों से भागकर इतिहास में दर्ज होती है। n
एपस्टीन फाइल: सत्ता की चुप्पी व लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा एपस्टीन फाइल का मुद्दा उठाया जाना कोई सनसनीखेज बयान नहीं, बल्कि सरकार की नैतिकता पर सीधा प्रहार था। इसके जवाब में मंत्री हरदीप सिंह पुरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने सवालों का समाधान करने के बजाय संदेह को और गहरा किया। सरकार आज जवाब देने की जगह बचाव की मुद्रा में दिखती है—और यही सबसे गंभीर संकेत है।
16 Feb 2026
|
247
अन्य खबरें
संपादकीय- डिजिटल नियंत्रण ढांचाः चुप्पी की ओर बढ़ता लोकतंत्र
15 Apr 2026 119
शब्दचित्रः नियति का शंखनाद
15 Apr 2026 125
इस्लामाबाद में कूटनीति की अंत्येष्टिः सुलगता सन्नाटा
15 Apr 2026 113
रसोई का संकट
15 Apr 2026 220
आवरणकथा- सत्ता संग्राम
15 Apr 2026 127
लाल अंतः बंदूकों के बाद का सवाल
15 Apr 2026 93
रॉकेट फोर्स: युद्ध का नया व्याकरण
15 Apr 2026 100
डिजिटल विद्रूपता का नया युग
15 Apr 2026 97
थोरियम का शंखनाद
15 Apr 2026 101
बिहार में नया ‘सम्राट’
15 Apr 2026 90
आकाश की विवशता
15 Apr 2026 112
अंबर के आलिंगन का महाअभ्यास
15 Apr 2026 88
अदृश्य आकाश, रक्तरंजित अरण्य
15 Apr 2026 101
असफल शांति, बढ़ता युद्ध
12 Apr 2026 119
साइना नेहवालः जिद, युग, विरासत
16 Feb 2026 408