बांग्लादेश: जनादेश पार कूटनीति के द्वार

बांग्लादेश में बीएनपी की प्रचंड जीत केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की कूटनीति में नए अध्याय का संकेत है। यह जनादेश भारत के लिए आशंका नहीं, बल्कि संतुलित संवाद और रणनीतिक पुनर्संयोजन का अवसर खोलता है।

16 Feb 2026  |  24

इतिहास की गति कभी-कभी किसी शांत नदी की तरह नहीं, बल्कि हिमालयी जलप्रपात की तरह तीव्र और अप्रत्याशित होती है। बांग्लादेश के आम चुनावों में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी को मिला 200 से अधिक सीटों का प्रचंड जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की आकांक्षाओं का पुनर्जन्म है। 12 फरवरी के इन नतीजों ने शेख हसीना के प्रस्थान के बाद उपजी अनिश्चितता को समाप्त कर दिल्ली के लिए एक नई कूटनीतिक 'बिसात' बिछा दी है।
जनादेश का दर्शन और भारत का रुख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तारिक रहमान को दी गई बधाई केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति का नया घोषणापत्र है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह किसी व्यक्ति विशेष के बजाय बांग्लादेश की 'लोकतांत्रिक चेतना' का सम्मान करता है। बीएनपी की जीत दिल्ली के लिए एक 'राहत' भी है, क्योंकि कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी को जनता ने नकार दिया है। जमात का हारना उस 'अंधेरी सुरंग' के बंद होने जैसा है, जिसे अक्सर पाकिस्तान की आईएसआई का संरक्षण प्राप्त रहा है।
4,096 किलोमीटर लंबी साझी सीमा केवल भूगोल नहीं, भारत की सुरक्षा की 'नब्ज' है। पिछले डेढ़ दशक में पूर्वोत्तर भारत ने जो शांति देखी, उसका बड़ा श्रेय ढाका की 'जीरो टॉलरेंस' नीति को जाता है। उल्फा और एनडीएफबी जैसे समूहों पर लगाम कसने में शेख हसीना का सहयोग ऐतिहासिक था। अब, तारिक रहमान के नेतृत्व में भारत इसी सुरक्षा-संवाद की निरंतरता चाहता है। दिल्ली की अपेक्षा है कि बांग्लादेश की मिट्टी का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए न हो। यह केवल संधि नहीं, बल्कि वह 'मौन समझौता' है जिस पर हमारे उत्तर-पूर्व का भविष्य टिका है।
भू-राजनीति के समुद्र में चीन का प्रभाव एक ऐसी 'लहर' है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के समीप चीन की सक्रियता भारत के लिए संवेदनशील मुद्दा है। हालांकि, बीएनपी का पूर्ण बहुमत उसे बाहरी शक्तियों की बैसाखी पर निर्भर होने से बचाता है। भारत यहां 'वेट एंड वाच' की मुद्रा में है। हमारा 'रणनीतिक धैर्य' और साझा सांस्कृतिक जड़ें ही चीन के आर्थिक जाल का काट बनेंगी।
अगरतला-अखौरा रेल लिंक और चटगांव-मोंगला बंदरगाह केवल ढांचे नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक उदय के 'दो फेफड़े' हैं। बीएनपी सरकार के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते पर पुनः चर्चा व्यापारिक रिश्तों में 'प्राणवायु' फूंकने जैसा होगा। इसके साथ ही, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भारत के लिए एक संवेदनात्मक मुद्दा है। यह द्विपक्षीय संबंधों के 'तापमान' को निर्धारित करने वाला सबसे सटीक यंत्र साबित होगा।
1971 की साझी स्मृतियों और 21वीं सदी के आर्थिक यथार्थ के बीच, तारिक रहमान का उदय संबंधों को 'री-सेट' करने का स्वर्णिम अवसर है। पुराने दुराग्रहों की भस्म से ही विश्वास का 'फिनिक्स' जन्म लेगा। यदि दिल्ली एक 'सशक्त साझेदार' की भूमिका निभाती है और ढाका अपने राष्ट्रवाद को भारत-विरोध से मुक्त रखता है, तो यह दक्षिण एशिया की स्थिरता का 'ध्रुव तारा' बन सकता है।
इतिहास ने ढाका को जनादेश की शक्ति दी है और दिल्ली को कूटनीतिक बुद्धिमत्ता। अब समय है कि दोनों मिलकर एक ऐसा 'काव्य' लिखें जहां धुआं रहित सीमाएं हों और दैदीप्यमान साझा भविष्य। n

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