परिसीमन: ततैया का छत्ता

परिसीमन की प्रक्रिया भारत के लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे के लिए एक निर्णायक मोड़ बन चुकी है। यह केवल संसदीय सीटों के पुनर्वितरण का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, संतुलन और राष्ट्रीय एकता की गहरी परीक्षा है।

16 Feb 2026  |  39

भारतीय लोकतंत्र का रथ एक ऐसे दोराहे पर आकर खड़ा हो गया है, जहां से आगे का रास्ता न तो सीधा है और न ही सपाट। भूगोल और जनसांख्यिकी की जटिलताएं कभी भी संघवाद के चौकोर खानों में आसानी से फिट नहीं होतीं। यही कारण है कि जैसे-जैसे जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन  की घड़ी निकट आ रही है, प्रतिनिधित्व और आनुपातिकता का प्रश्न एक ज्वलंत मुद्दा बनकर उभर रहा है। यह केवल सीटों के गणित का सवाल नहीं है -  यह भारत की आत्मा, उसके संघीय ढांचे और विविधता के बीच संतुलन का सवाल है।
प्रश्न यह है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कब तक और किस हद तक केवल जनसंख्या के आंकड़ों से बांधकर रखा जाएगा? क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल 'सिर गिनना' है, या उन आवाजों को भी सुनना है जो संख्या में कम होते हुए भी राष्ट्र निर्माण में बराबर की भागीदार हैं? दक्षिण भारत के राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में जो ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है, क्या उन्हें उसका दंड अपनी राजनीतिक शक्ति खोकर चुकाना होगा? यह स्थिति एक ऐसे ततैया के छत्ते को छेड़ देने जैसी है, जिससे निकला विष भारतीय संघवाद की नसों को नीला कर सकता है।
परिसीमन की इस अपरिहार्यता से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा 'मध्य मार्ग' है जो उत्तर भारत की बढ़ती आबादी को प्रतिनिधित्व भी दे और दक्षिण भारत को 'आहत' भी न होने दे?


डॉ. बी.आर. अंबेडकर का संघीय दर्शन और बहुसंख्यकवाद का अट्टहास
इस वैचारिक कुरुक्षेत्र की गहराई को समझने के लिए हमें आधुनिक भारत के मुख्य वास्तुकार डॉ. बी.आर. अंबेडकर के उन मौलिक विचारों की ओर लौटना होगा, जिन्होंने भारतीय संघवाद की आधारशिला रखी थी। संविधान सभा के गहन वाद-विवादों में बाबासाहेब ने स्पष्ट किया था कि भारत 'राज्यों का एक संघ' है। उन्होंने एक शक्तिशाली केंद्र की वकालत की थी ताकि देश को बाहरी और आंतरिक विघटन से बचाया जा सके, लेकिन वे 'बहुसंख्यकवाद के अत्याचार'  के खतरों के प्रति भी उतने ही सजग थे।
अंबेडकर का मानना था कि संघवाद का अर्थ केवल केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का तकनीकी बँटवारा नहीं है, बल्कि यह विभिन्न भाषाई और क्षेत्रीय समूहों के बीच 'राजनीतिक संतुलन' बनाए रखने का एक जीवंत तंत्र है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी दी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि यदि उत्तर के विशालकाय राज्य केवल अपनी अंधी जनसंख्या के बल पर दक्षिण के राज्यों पर राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करने लगे, तो दक्षिण भारत के लोग स्वयं को एक 'आंतरिक उपनिवेश' के रूप में महसूस करने लगेंगे। अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि लोकतंत्र केवल 'एक व्यक्ति, एक वोट' नहीं है, बल्कि यह 'एक मूल्य' भी है। यदि एक क्षेत्र की विफलता (जनसंख्या विस्फोट) दूसरे क्षेत्र की सफलता (जनसंख्या नियंत्रण) को निगल जाए, तो संघवाद का नैतिक आधार ही समाप्त हो जाता है।
आज जब परिसीमन की आहट से दक्षिण में असुरक्षा की गहरी लहर है, तो अंबेडकर का यह भय यथार्थ के अत्यंत निकट प्रतीत होता है। यदि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य अपनी जनसांख्यिकीय अक्षमता को 'राजनीतिक लाभांश'  में बदल लेते हैं, तो यह उस सामाजिक अनुबंध का उल्लंघन होगा, जिसे संविधान निर्माताओं ने बड़ी बारीकी से बुना था। अंबेडकर का दर्शन हमें सचेत करता है कि 'भीड़तंत्र' और 'लोकतंत्र' के बीच की रेखा बहुत महीन है और परिसीमन इस रेखा को मिटाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।


राजकोषीय विखंडन: 15वें वित्त आयोग का विवाद और जनसांख्यिकी का दंड
परिसीमन का विवाद केवल संसद की दीर्घाओं तक सीमित नहीं है, इसकी जड़ें राज्यों की तिजोरी और विकास की गति से भी जुड़ी हैं। 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों ने इस 'ततैया के छत्ते' को और अधिक उत्तेजित कर दिया। विवाद का मुख्य बिंदु था—राजस्व आवंटन के लिए 1971 की जनगणना के पुराने और स्वीकृत आधार को छोड़कर 2011 की जनगणना के आँकड़ों को प्राथमिक आधार बनाना।
दक्षिण भारत के राज्यों—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना—का तर्क अत्यंत प्रबल और न्यायसंगत है। उन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने पिछले पाँच दशकों में केंद्र सरकार द्वारा दी गई 'राष्ट्रीय जनसंख्या नीति' (1976) को ईश्वरीय आदेश की तरह माना और लागू किया। उन्होंने अपनी प्रजनन दर (TFR) को प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से भी नीचे पहुँचा दिया। लेकिन 15वें वित्त आयोग द्वारा 2011 के आँकड़ों का उपयोग करने का अर्थ यह था कि इन राज्यों को उनके द्वारा प्राप्त की गई 'जनसांख्यिकीय सफलता' के लिए आर्थिक दंड दिया जा रहा था। यह एक भयावह विरोधाभास है—जहाँ उत्तर के बीमारू राज्यों को उनकी 'प्रजनन विफलता' के लिए अधिक फंड और अधिक संसाधन प्राप्त हो रहे हैं।
राजकोषीय संघवाद की दृष्टि से, यह विवाद एक विखंडनकारी स्थिति पैदा कर रहा है। दक्षिण के राज्य भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30-35% का योगदान देते हैं, जबकि राष्ट्रीय जनसंख्या में उनका हिस्सा लगातार गिर रहा है। यदि 2027 के बाद परिसीमन केवल जनसंख्या के अनुपात में हुआ, तो स्थिति यह होगी कि 'कमाई' दक्षिण करेगा और 'खर्च' का निर्णय उत्तर भारत का राजनीतिक आधिपत्य लेगा। यह 'प्रतिनिधित्व रहित कराधान'  का एक आधुनिक संस्करण होगा, जो किसी भी संघ की आंतरिक शांति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। 15वें वित्त आयोग के विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनसंख्या आधारित आवंटन अब भारत की एकता के लिए 'रणनीतिक जोखिम' बन चुका है।


नारी शक्ति वंदन और परिसीमन का संवैधानिक गठबंधन
वर्ष 2023 में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण विधेयक) ने परिसीमन के इस जटिल प्रश्न में एक भावुक और 'नैतिक पेंच' जोड़ दिया है। इस कानून की प्रस्तावना में ही यह शर्त रखी गई है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण तभी मिलेगा, जब अगली जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो जाएगी। इस वैधानिक शर्त ने परिसीमन को एक 'संवैधानिक अपरिहार्यता' बना दिया है जिसे अब टाला नहीं जा सकता।
राजनीतिक दृष्टिकोण से, यह एक 'चेकमेट' की स्थिति है। कोई भी राजनीतिक दल महिला आरक्षण का विरोध नहीं करना चाहता, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ने का अर्थ है कि आधी आबादी को शक्ति देने के मार्ग में क्षेत्रीय संतुलन को दांव पर लगाना। यदि महिला आरक्षण लागू करने के लिए उत्तर भारत की सीटों में भारी बढ़ोतरी की जाती है और दक्षिण को हाशिए पर धकेला जाता है, तो यह 'लैंगिक न्याय' बनाम 'क्षेत्रीय न्याय'  का एक विचित्र युद्ध बन जाएगा। क्या भारतीय संसद के पास यह कूटनीतिक बुद्धिमत्ता है कि वह महिलाओं के ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व और दक्षिण भारत की क्षेत्रीय अस्मिता के बीच कोई न्यायपूर्ण समन्वय स्थापित कर सके? यह प्रश्न 2026 के बाद भारतीय राजनीति के सबसे बड़े मंथन का केंद्र होगा।

समाधान का वैश्विक मॉडल: यूरोपीय ‘अवरोही आनुपातिकता’
इस पहेली को सुलझाने के लिए हमें गणित के सूत्रों से बाहर निकलकर 'दार्शनिक कूटनीति' की शरण में जाना होगा। हमें यूरोपीय संघ के उस सफल प्रयोग से सीखना चाहिए जिसे 'अवरोही आनुपातिकता' कहा जाता है। यूरोपीय संसद में जर्मनी (8.3 करोड़ आबादी) और माल्टा (5 लाख आबादी) जैसे देशों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन इसी सिद्धांत पर आधारित है। नियम यह है कि बड़े राज्यों के पास कुल सीटें तो अधिक होंगी, लेकिन छोटे राज्यों के पास उनकी जनसंख्या के अनुपात में 'अपेक्षाकृत अधिक' सीटें होंगी ताकि वे बड़े राज्यों के जनसांख्यिकीय दबाव में दब न जाएँ।
भारतीय संदर्भ में, रवि के. मिश्रा का सुझाव इसी का एक आधुनिक संस्करण है। उनका तर्क है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को बढ़ाकर (लगभग 848 या उससे अधिक) इस प्रकार पुनर्गठित किया जाए कि किसी भी राज्य की वर्तमान सीटों में एक भी सीट की कमी न आए। यदि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 होती हैं, तो केरल की सीटों को 20 पर ही स्थिर रखा जाए, भले ही उसकी जनसंख्या का राष्ट्रीय अनुपात घटा हो। यह 'एक व्यक्ति, एक मूल्य' के सिद्धांत और 'क्षेत्रीय स्वायत्तता' के बीच का एक सम्मानजनक और न्यायपूर्ण समझौता होगा।

राज्यसभा: राज्यों के हितों का अजेय सुरक्षा कवच
दक्षिण और पूर्वोत्तर की चिंताओं को दूर करने का एक और ठोस तरीका 'उच्च सदन' यानी राज्यसभा के चरित्र और शक्तियों में आमूल-चूल परिवर्तन करना है। हमें अमेरिका की 'सीनेट' के मॉडल से प्रेरणा लेनी चाहिए, जहाँ हर राज्य को, चाहे वह क्षेत्रफल और जनसंख्या में कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो, समान रूप से दो-दो सीटें दी जाती हैं।
भारत में भी, लोकसभा को तो जनसंख्या के आधार पर विस्तारित होने दिया जा सकता है, लेकिन राज्यसभा की सीटों को कम से कम 2047 (आजादी के शताब्दी वर्ष) तक 'यथास्थिति' में फ्रीज रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही, राज्यसभा की शक्तियों में विस्तार होना चाहिए—विशेषकर उन विषयों पर जो राज्यों की संप्रभुता, राजकोषीय स्वायत्तता और भाषाई अधिकारों से जुड़े हैं। यदि राज्यसभा को 'समान प्रतिनिधित्व' वाला एक सशक्त सदन बना दिया जाए, तो दक्षिण के राज्यों को यह भय नहीं रहेगा कि उत्तर के विशाल राज्य दिल्ली में बैठकर उनकी नियति का फैसला अकेले करेंगे। राज्यसभा को 'राज्यों का अजेय ढाल' बनाना ही भारतीय संघवाद की संजीवनी है।

बड़े राज्यों का पुनर्गठन: सुशासन की अनिवार्य शर्त
परिसीमन की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि यह केवल 'संख्याबल' को मान्यता देता है, 'प्रबंधकीय सुशासन' को नहीं। आज उत्तर प्रदेश की आबादी दुनिया के कई बड़े देशों से अधिक है। क्या एक ही प्रशासनिक केंद्र से इतने विशाल भूगोल और जनसांख्यिकी का न्यायपूर्ण संचालन संभव है? परिसीमन के इस संकट को हमें एक अवसर में बदलना चाहिए और 'राज्य पुनर्गठन आयोग 2.0' का गठन करना चाहिए।
उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे विशालकाय राज्यों को छोटे और प्रशासनिक रूप से सक्षम इकाइयों में विभाजित करना अब राष्ट्रहित में है। विदर्भ, पूर्वांचल, बुंदेलखंड, हरित प्रदेश, मारवाड़ और मिथिला जैसे राज्यों का उदय सत्ता के संकेंद्रण को तोड़ेगा। जब उत्तर प्रदेश पाँच छोटे राज्यों में बँट जाएगा, तो दिल्ली की सत्ता का रास्ता केवल एक सूबे के हाथ में नहीं होगा। छोटे राज्य न केवल सुशासन सुनिश्चित करते हैं, बल्कि वे संघ में शक्ति के संतुलन को भी विकेंद्रीकृत करते हैं। यह परिसीमन के विष का सबसे प्रभावी काट है—सत्ता को संख्या से हटाकर सेवा के केंद्रों में विभाजित करना।

भारत 2.0: सांस्कृतिक भूगोल व प्राचीन जनपदों की वापसी
प्रसिद्ध लेखक गौतम देसीराजू ने 'भारत 2.0' की जो परिकल्पना पेश की है, वह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि क्रांतिकारी है। उनका सुझाव है कि भारत को लगभग 75 राज्यों में पुनर्गठित किया जाए, जिनकी जनसंख्या और भौगोलिक आकार में एक प्रकार का सामंजस्य हो। यह विचार हमें प्राचीन भारत के 'जनपदों' और 'गणराज्यों' की याद दिलाता है। वर्तमान प्रशासनिक सीमाएँ काफी हद तक ब्रिटिश औपनिवेशिक सुविधा और 1956 के भाषाई आधार की विरासत हैं। सत्तर के दशक में राशिदुद्दीन खान ने भी 56 इकाइयों वाले संघीय भारत का प्रस्ताव रखा था। यदि भारत को वास्तव में एक 'आधुनिक और विकसित' राष्ट्र बनना है, तो उसे अपनी आंतरिक सीमाओं को वैज्ञानिक प्रबंधन और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर फिर से खींचना होगा। 75 राज्यों का यह ढाँचा परिसीमन के विवाद को जड़ से समाप्त कर देगा, क्योंकि तब हर राज्य का भार, प्रभाव और प्रतिनिधित्व लगभग समान होगा। यह भारत को उसकी जड़ों से जोड़ने और भविष्य के लिए तैयार करने का सबसे तार्किक मार्ग है।
 

शक्ति का ध्रुवीकरण और राज्यों का बदलता राजनीतिक कद
पिछले सात दशकों में भारतीय राजनीति का चरित्र 'राज्यों' के प्रभाव से खिसककर 'दिल्ली' के केंद्र की ओर झुक गया है। आज 56 लाख करोड़ रुपये का केंद्रीय बजट, जो सभी राज्यों के संयुक्त बजट से भी अधिक है, इस 'राजकोषीय वर्चस्व' का सबसे बड़ा प्रमाण है। जीएसटी के आने के बाद राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता काफी हद तक कम हो गई है और वे अब केंद्र के 'हस्तांतरण' पर निर्भर हैं।
ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया राज्यों को और अधिक शक्तिहीन बना सकती है। यदि केंद्र सरकार ही नीतियों और संसाधनों का मुख्य स्रोत है, तो राज्यों की भूमिका केवल 'सेवा वितरण' की रह जाएगी। इस स्थिति में, राज्यों का बड़ा भौगोलिक आकार उनके लिए शक्ति नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक बोझ बन जाता है। छोटे राज्य अधिक पारदर्शी, गतिशील और जवाबदेह होते हैं। परिसीमन को केवल राजनीतिक कुर्सियों की दृष्टि से नहीं, बल्कि नागरिकों तक सुलभ न्याय और सुविधाओं की पहुँच की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।


राष्ट्रीय एकता का नया संकल्प
परिसीमन की यह प्रक्रिया केवल सीटों का गणितीय बंटवारा नहीं है, यह भारत के भविष्य का मानचित्र खींचने का ऐतिहासिक अवसर है। जैसे ही जनगणना के आंकड़े सामने आएंगे, देश में एक अभूतपूर्व वैचारिक और राजनीतिक मंथन शुरू होगा। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करते समय हमें केवल कैलक्युलेटर का उपयोग नहीं करना है, बल्कि ऐतिहासिक बुद्धिमत्ता और संघीय संवेदनशीलता का परिचय देना है।
यदि हमने दक्षिण भारत को यह महसूस होने दिया कि उनकी राष्ट्र-निर्माण की सफलता ही उनकी राजनीतिक निर्बलता बन गई है, तो हम 'विविधता में एकता' के उस पवित्र संकल्प के साथ द्रोह करेंगे। भारत को इस संकट से निकलने के लिए एक 'नए संघीय अनुबंध' की आवश्यकता है—जहाँ उत्तर के जनबल को प्रतिनिधित्व मिले, दक्षिण की मेधा को सुरक्षा मिले, महिलाओं को उनकी उचित भागीदारी मिले और छोटे राज्यों को उनकी गरिमापूर्ण पहचान मिले।
परिसीमन का यह ‘ततैया का छत्ता’ यदि कूटनीतिक विवेक से संभाला गया, तो यह भारतीय लोकतंत्र को अधिक जीवंत, उत्तरदायी और संतुलित बनाएगा। लेकिन यदि इसे केवल तात्कालिक सत्ता के अंकगणित के लिए छेड़ा गया, तो इससे उठने वाली क्रोध की लहरें गणराज्य की नींव को हिला सकती हैं। यह समय संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर 'राष्ट्र-प्रथम' की सोच के साथ एक सर्वसमावेशी समाधान खोजने का है। 

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