संक्रांति का शंखनाद, भारत-ईयू एफटीए
अठारह वर्षों की कूटनीतिक जड़ता को तोड़ते हुए भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौता केवल आर्थिक करार नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था की ओर बढ़ता एक निर्णायक कदम है। ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ भारत को व्यापार, तकनीक और रणनीति—तीनों स्तरों पर वैश्विक धुरी के रूप में स्थापित करती है।
16 Feb 2026
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जनवरी 2026 की उन बर्फीली और ठिठुरती रातों के बीच, जब नई दिल्ली की रायसीना हिल्स गणतंत्र दिवस की भव्यता के आलोक में देदीप्यमान थी, तब वैश्विक कूटनीति के गलियारों में एक ऐसी ऊष्मा का संचार हो रहा था जिसने पिछले अठारह वर्षों की कूटनीतिक जड़ता को पिघला दिया। यह ऊष्मा थी—भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच उस 'मुक्त व्यापार समझौते' (एफटीए) की परिणति, जिसे इतिहास के पन्नों में एक 'वैचारिक और आर्थिक संक्रांति' के रूप में दर्ज किया जाएगा। 27 जनवरी 2026 को आसमान से बरसते बारिश की बूंदों के बीच यह तारीख केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं, बल्कि भारतीय कूटनीति के 'मध्याह्न सूर्य' का उद्घोष थी। दो विशाल लोकतांत्रिक शक्तियों ने जब एक-दूसरे का हाथ थामकर उस संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसे यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (सभी समझौतों की जननी) की संज्ञा दी, तो वह केवल दो बाज़ारों का मिलन नहीं था, बल्कि भविष्य के एक नए बहुध्रुवीय विश्व-क्रम का शंखनाद था।
यह समझौता उस समय धरातल पर उतरा है जब वैश्विक व्यवस्था एक भयावह विखंडन के दौर से गुजर रही है। एक ओर अटलांटिक के पार से आने वाली हवाएं 'अमेरिका फर्स्ट' के कठोर और अप्रत्याशित संरक्षणवाद की कड़वाहट से भरी हैं, तो दूसरी ओर पूर्व का 'ड्रैगन' अपनी आर्थिक आक्रामकता और 'डेब्ट-ट्रैप कूटनीति' से दुनिया की आपूर्ति श्रृंखलाओं को बंधक बना रहा है। ऐसे में नई दिल्ली और ब्रुसेल्स का यह मिलन वैश्विक अर्थव्यवस्था के क्षितिज पर एक ऐसे प्रकाश-स्तंभ के समान है, जो न केवल स्थिरता का संदेश देता है, बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित साझा समृद्धि अब भी संभव है।
'उत्तरायण' का दार्शनिक और कूटनीतिक रूपक
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने जब इस समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो उनके शब्दों में केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और दार्शनिक अंतर्दृष्टि थी। उन्होंने इस समझौते की तुलना भारत के पवित्र पर्व 'मकर संक्रांति' से करते हुए एक अद्भुत रूपक गढ़ा। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की ओर देखते हुए कहा, 'आज नई दिल्ली में खड़े होकर मुझे भारत के उस प्राचीन ज्ञान की याद आ रही है जो सूर्य की गति में जीवन का दर्शन खोजता है। यह समझौता उस समय संपन्न हुआ है जब भारत सूर्य के उत्तरायण का उत्सव मना रहा है। जिस प्रकार सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर अंधकार को पराजित करता है और उत्तरी गोलार्ध में प्रकाश और ऊर्जा का विस्तार करता है, ठीक उसी प्रकार यह 'मदर ऑफ ऑल डील्स' भारत और यूरोप के संबंधों में अठारह वर्षों से व्याप्त संशय, जड़ता और बाधाओं के अंधकार को समाप्त कर एक नई ऊर्जा का संचार करेगी। आज से हमारे संबंध 'दक्षिणायन' के संकोच से निकलकर 'उत्तरायण' के आत्मविश्वास में प्रवेश कर चुके हैं।'
उर्सुला का यह रूपक अत्यंत मारक और सटीक था। 2007 से लेकर 2025 तक, यह वार्ता कूटनीति के 'हिमयुग' में फँसी रही। कभी यह कृषि और डेयरी के पेचीदा सवालों पर ठिठकी, तो कभी डेटा सुरक्षा, श्रम मानकों और बौद्धिक संपदा के चक्रव्यूह में उलझी रही। लेकिन जनवरी 2026 में, जैसे ही सूर्य ने अपनी दिशा बदली, वैसे ही दोनों पक्षों की कूटनीतिक इच्छाशक्ति ने उन सभी ऐतिहासिक अवरोधों को भस्म कर दिया। यह 'उत्तरायण' केवल खगोलीय नहीं, बल्कि वैचारिक था—जहां यूरोप ने यह स्वीकार किया कि भारत के बिना उसकी 'रणनीतिक स्वायत्तता' अधूरी है, और भारत ने यह पहचाना कि यूरोप उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के लिए सबसे भरोसेमंद और स्थिर भागीदार है।
भू-राजनीतिक कुरुक्षेत्र
इस महा-संधि की गहराई को समझने के लिए हमें उस वैश्विक कुरुक्षेत्र का अवलोकन करना होगा जहां यह आकार ले रही है। वाशिंगटन में डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी ने 'ट्रांस-अटलांटिक' और 'इंडो-पैसिफिक' संबंधों की सहजता को एक झटके में अनिश्चितता के भँवर में डाल दिया। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल की 'आक्रामक टैरिफ नीति' ने भारत जैसे रणनीतिक सहयोगियों पर भी 50 प्रतिशत तक के भारी आयात शुल्क थोप दिए। अमेरिका का यह 'आर्थिक राष्ट्रवाद' यूरोप के लिए एक गहरे विश्वासघात के समान था, जो दशकों तक वाशिंगटन को अपना सुरक्षा कवच मानता रहा था। ट्रम्प की 'ग्रेसिया' और यूरोप के प्रति उनकी बेरुखी ने ब्रुसेल्स को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब अटलांटिक के पार का उसका पुराना मित्र अब भरोसेमंद नहीं रहा।
इधर, चीन और रूस के बीच की 'सीमा-विहीन मित्रता' और बीजिंग की 'बेल्ट एंड रोड' पहल के माध्यम से यूरोप की आर्थिक घेरेबंदी ने ब्रुसेल्स के नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी थी। यूरोप को अब यह आभास हो गया कि बीजिंग पर उसकी अत्यधिक निर्भरता उसकी संप्रभुता के लिए एक घातक 'ट्रोजन हॉर्स' सिद्ध हो सकती है। ऐसे में, भारत—जो 1.45 बिलियन की आबादी, 4.2 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी और विश्व की सबसे युवा कार्यबल का स्वामी है—यूरोप के लिए केवल एक बाज़ार नहीं, बल्कि एक 'अस्तित्वगत अनिवार्यता' बनकर उभरा।
यह समझौता भारत की कूटनीति का वह 'मास्टरस्ट्रोक' है, जिसने अमेरिका और चीन के द्वि-ध्रुवीय तनाव के बीच एक तीसरा ध्रुव खड़ा कर दिया है। 'मदर ऑफ ऑल डील्स' ने भारत को वह 'लीवरेज' प्रदान किया है, जिससे वह अब वाशिंगटन और बीजिंग दोनों की आंखों में आंखें डालकर अपनी शर्तों पर वैश्विक व्यापार का व्याकरण लिख सकता है।
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