महाराष्ट्र का नया व्याकरणः ठाकरे विरासत का विसर्जन
महाराष्ट्र के हालिया स्थानीय निकाय चुनाव किसी साधारण राजनीतिक मुकाबले का परिणाम नहीं, बल्कि एक पूरे युग के क्षय का संकेत हैं। मतदाताओं का झुकाव शिंदे की शिवसेना की ओर यह बताता है कि बाल ठाकरे की विरासत अब स्मृति का विषय अधिक और राजनीतिक शक्ति का स्रोत कम रह गई है। यह चुनाव उस कठोर सच्चाई को सामने रखता है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब प्रतीकों से नहीं, सत्ता, संगठन और स्पष्ट वैचारिक दिशा से तय हो रही है।
16 Feb 2026
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महाराष्ट्र के हालिया स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे किसी सामान्य चुनावी हार-जीत की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह एक राजनीतिक युग के अवसान का 'मर्सिया' हैं। ठाकरे बंधुओं—उद्धव और राज—का एक मंच पर आना भले ही भावनात्मक रूप से आंदोलित करने वाला दृश्य रहा हो, लेकिन मतदाता के विवेक पर इसका कोई जादुई असर नहीं हुआ। मराठी मानुष के वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा शिंदे की शिवसेना की ओर झुक गया, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बाल ठाकरे की विरासत अब केवल नाम की मोहताज नहीं रही, बल्कि उसके अर्थ बदल चुके हैं। यह चुनावी फैसला महाराष्ट्र की राजनीति में उन अनुत्तरित प्रश्नों को मुखर कर रहा है, जिन्हें अब तक दबी जुबान से टाला जा रहा था: क्या बाल ठाकरे के दोनों राजनीतिक वारिस मिलकर भी उस जनादेश को अपनी ओर मोड़ सकते हैं जो कभी उनकी बपौती था? यदि नहीं, तो क्या उनकी विरासत वास्तव में जीवित है, या वह केवल एक 'प्रतीकात्मक अवशेष' बनकर रह गई है?
व्यक्तित्व का मोहपाश और संस्थागत शून्यता
बाल ठाकरे केवल शिवसेना के प्रमुख नहीं थे; वे स्वयं ही शिवसेना थे। उनका 'इकबाल' निर्विवाद था, उनकी आवाज़ ही कानून थी, और उनका हर समर्थक के साथ रिश्ता पूरी तरह से व्यक्तिगत और भावुक था। उनके नेतृत्व में शिवसेना एक पारंपरिक राजनीतिक संगठन की तरह कम और एक ऐसे आंदोलन की तरह अधिक थी, जो उनके ओजस्वी व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द केंद्रित था। वह आवाज़ विवादों को सुलझाती थी, अनुशासनात्मक चाबुक चलाती थी और कार्यकर्ताओं को विचारधारा के सांचे में ढालती थी।
किंतु, बाल ठाकरे ने जो बनाया, वह बहुत ठोस होते हुए भी संस्थागत रूप से कमजोर था। उनका नेतृत्व पूरी तरह से 'व्यक्ति-केंद्रित' था, जिसने कार्यकर्ताओं में अंधभक्ति तो पैदा की, लेकिन ऐसा कोई लोकतांत्रिक ढांचा नहीं खड़ा किया जिसके सहारे पार्टी उनके बाद भी अपने मूल स्वरूप में बनी रह सके। विडंबना यह है कि शिवसेना की इसी विशिष्टता ने उसे एक समय अजेय ताकत बनाया था, लेकिन आज वही अनोखापन उसकी विरासत को कमजोर और भंगुर बना रहा है।
वैधता का संकट और आक्रामक हिंदुत्व का विसर्जन
सत्ता का हस्तांतरण केवल कुर्सियों का मिलना नहीं होता; यह उस 'इकबाल' को बनाए रखने की चुनौती भी है। उद्धव ठाकरे को पार्टी का ढांचा और 'ठाकरे' उपनाम का वजन तो विरासत में मिला, लेकिन उन्हें वह कमान और करिश्मा सहजता से प्राप्त नहीं हुआ, जिसने संगठन को एक सूत्र में बांधे रखा था। शिवसेना को अधिक संवैधानिक, सौम्य और सत्ता-उन्मुख दल बनाने की उद्धव की कोशिशों ने अनजाने में ही उस 'आक्रामक प्रतिबद्धता' को कमजोर कर दिया, जो पार्टी की नींव थी। वह काडर, जो दो-टूक आक्रामकता और आक्रामक हिंदुत्व पर फलता-फूलता था, उसने खुद को वैचारिक अनिश्चय की स्थिति में पाया। परिणाम यह हुआ कि पार्टी आज भी बाल ठाकरे का नाम तो लेती है, लेकिन उनका व्यवहार अब 'बाल ठाकरे की शिवसेना' जैसा नहीं रहा।
इसी वैचारिक रिक्तता का लाभ एकनाथ शिंदे ने अत्यंत विध्वंसक और प्रभावी ढंग से उठाया। शिंदे का तर्क यह रहा है कि उद्धव ने सत्ता के मोह में कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा के साथ गठबंधन कर बाल ठाकरे के मूल आक्रामक हिंदुत्व से समझौता कर लिया। यह दावा उनके 2022 के विद्रोह का नैतिक आधार बना। उद्धव मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धो बैठे और आज, 2024 के बाद, शिंदे स्वयं को बाल ठाकरे के मूल राजनीतिक स्वभाव के सच्चे वैचारिक उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यहाँ उद्धव 'विरासत की वैधता' का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि शिंदे 'विरासत की निरंतरता' का।
करिश्मा बनाम यथार्थ: राज ठाकरे की सीमाएं
यदि उद्धव विरासत की वैधता हैं, तो राज ठाकरे उस 'करिश्मे' के वाहक हैं, जो बाल ठाकरे की पहचान थी। राज को अपने चाचा की भाषण कला, टकराव की शैली और राजनीतिक समझ विरासत में मिली है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के माध्यम से उन्होंने बाल ठाकरे के उस पुराने अंदाज को—सड़कों पर आक्रामकता, प्रवासियों के खिलाफ तीखे तेवर और 'मराठी मानुष' के दावे को—जीवित रखने का प्रयास किया है। हालिया चुनावों में उन्होंने उन्हीं नारों को दोहराया, जो 1960 के दशक की याद दिलाते हैं।
किंतु, राज की राजनीति उसी बीते दौर में थमी हुई है। प्रवासी विरोधी राजनीति आज के बहु-सांस्कृतिक और वैश्वीकृत महाराष्ट्र में केवल एक 'सप्लीमेंट' हो सकती है, मुख्य मुद्दा नहीं। बाल ठाकरे स्वयं इस विचार से बहुत आगे बढ़कर एक व्यापक हिंदुत्व के ढांचे में ढल चुके थे। राज का प्रयास उस अतीत को पुनर्जीवित करने का है, जिसे समय पीछे छोड़ चुका है।
महान विनियोग: भाजपा की रणनीतिक विजय
इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य की सबसे महत्वपूर्ण कहानी 'विनियोग' की है। पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी ने शिवसेना की विरासत के उन तत्वों को—उग्र राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता और अनुशासित संगठन—बाल ठाकरे के वारिसों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से अपनाया है। भाजपा ने शिवसेना के उस 'सड़क-छाप' प्रभाव को एक अनुशासित चुनावी मशीनरी में बदल दिया है।
शिंदे के साथ गठबंधन करके भाजपा ने उस वैचारिक स्थान पर कब्जा कर लिया है, जिस पर कभी शिवसेना का एकाधिकार था। इस प्रक्रिया में उसने उद्धव और राज दोनों को हाशिए पर धकेल दिया है। आज भाजपा के पास चुनावी गणित, संगठनात्मक गहराई और सत्ता तक पहुंच तीनों हैं, जबकि ठाकरे वारिस 'असली बनाम नकली' की बहस में उलझे हुए हैं।
प्रतीकवाद की घटती मुद्रा
चचेरे भाइयों का मिलन प्रतीकात्मक रूप से शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति में प्रतीकवाद केवल तालियां बटोर सकता है, वोट नहीं। वोट विश्वसनीयता और ताकत को मिलते हैं। आज बाल ठाकरे की विरासत जो बची है, वह न तो कोई एकजुट पार्टी है और न ही निर्विवाद मराठी शक्ति। वह केवल एक 'प्रतीकात्मक पूंजी' है, जिसका मूल्य बाज़ार की राजनीति में लगातार गिर रहा है।
मतदाता का संदेश स्पष्ट और निर्णायक है: विरासत का आदर किया जा सकता है, उसे याद किया जा सकता है, लेकिन उसे अब राजनीति की नई परिस्थितियों में दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र की राजनीति को अपनी छवि के अनुसार गढ़ा था, लेकिन आज उनके प्रतिस्पर्धियों ने उस छवि का इस्तेमाल करना उनके अपने वारिसों से बेहतर सीख लिया है। टाइगर का युग अस्त हो रहा है, और पीछे रह गई है केवल एक गूँज, जो अब जंगल को नियंत्रित करने में असमर्थ है।
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