सह्याद्रि की अभेद्य पर्वतमालाओं और अरब सागर की उद्दाम लहरों की ओट में बसा महाराष्ट्र, भारतीय राजनीति की वह उर्वर प्रयोगशाला है जहाँ सत्ता का विमर्श अक्सर स्थापित क्षत्रपों और चंद रसूखदार परिवारों की निजी जागीरदारी के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। दशकों तक इस वीरभूमि का अलिखित संविधान यही रहा कि यहाँ का सिंहासन केवल ‘मराठा’ प्रभुत्व के लिए आरक्षित है। यशवंतराव चव्हाण की विरासत से लेकर शरद पवार के चाणक्य-कौशल तक, महाराष्ट्र की सियासत केवल मराठा अस्मिता और ग्रामीण सहकारिता के ‘शुगर बेल्ट’ की मिठास से संचालित होती थी। किंतु, 15 जनवरी 2026 के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने न केवल इस पुरानी पटकथा को भस्म कर दिया है, बल्कि एक ब्राह्मण चेहरे—देवेंद्र फडणवीस—को आधुनिक काल के ‘पेशवा’ के रूप में महानायक बनाकर प्रतिष्ठित कर दिया है।
ऐतिहासिक रूप से ‘पेशवा’ छत्रपति के साम्राज्य के वे मेधावी प्रधानमंत्री थे, जिनके पास प्रशासनिक दृष्टि और सामरिक रणनीति का अद्भुत संगम था। आज के लोकतांत्रिक विन्यास में फडणवीस का उदय इसी मेधा के पुनरुद्धार जैसा है। उन्होंने महाराष्ट्र की उस सामंती राजनीति को चुनौती दी, जिसने लोकतंत्र को बारामती की गद्दी और मातोश्री के आदेशों तक सीमित कर दिया था। पश्चिमी महाराष्ट्र की सहकारी समितियों, चीनी मिलों और जिला बैंकों के जिस अभेद्य चक्रव्यूह को शरद पवार ने अपना अभेद्य सुरक्षा कवच बनाया था, फडणवीस ने उसे अपनी सूक्ष्म नीतिगत प्रहारों और पारदर्शी शासन के अमोघ अस्त्र से तार-तार कर दिया। यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि उस आर्थिक ढांचे का विध्वंस है जिसने पीढ़ियों से ग्रामीण जनता को राजनीतिक बंधक बनाए रखा था।
29 में से 23 महानगर पालिकाओं पर भाजपा का एकछत्र आधिपत्य और एशिया की सबसे समृद्ध नगरपालिका, बीएमसी (BMC) पर भगवा ध्वज का फहराना, फडणवीस की उस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का प्रतिफल है जिसने मराठा वर्चस्व के समांतर ‘माधव’ (माली, धनगर, वंजारी) और अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) का एक ऐसा अजेय सामाजिक गठबंधन खड़ा कर दिया, जिसकी काट पारंपरिक क्षत्रपों के पास नहीं थी। फडणवीस की यह विजय एक ‘मूक क्रांति’ है, जिसने उस ‘प्रशासक राज’ का अंत किया जिसने चार वर्षों तक नगरों की लोकतांत्रिक आवाज को नौकरशाही की फाइलों में कैद कर रखा था। मार्च 2022 से जनवरी 2026 तक मुंबई और पुणे जैसे महानगरों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति ने जो संवैधानिक शून्यता पैदा की थी, उसे फडणवीस ने राजनीतिक साहस के साथ समाप्त किया है।
अजित पवार के आकस्मिक और दुखद अवसान के बाद उपजी राजनीतिक शून्यता और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के वैचारिक विसर्जन ने विपक्ष को दिशाहीन बना दिया है। ऐसे में फडणवीस ने खुद को स्थिरता, विकासवादी हिंदुत्व और ‘न्यू इंडिया’ के विजन के एकमात्र ध्रुव के रूप में स्थापित किया है। वे अब केवल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भर नहीं हैं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद की भाजपा की राष्ट्रीय कतार में अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के समकक्ष एक ‘रणनीतिक महाशक्ति’ बनकर उभरे हैं। फडणवीस ने यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक भारत की राजनीति अब ‘कुल’ (Lineage) और वंशवादी गौरव से नहीं, बल्कि ‘कौशल’ (Competence) और समावेशी नेतृत्व से तय होगी। 2029 के चुनावी क्षितिज पर उनकी यह धमक न केवल महाराष्ट्र, बल्कि पूरे देश के राजनीतिक भूगोल को बदलने का सामर्थ्य रखती है। यह उस ‘ब्राह्मण पेशवा’ का उदय है, जिसने मराठा किले के भीतर अपनी मेधा से एक ऐसी अमिट लकीर खींच दी है, जो आने वाले दशकों तक राज्य की राजनीति का व्याकरण तय करेगी।
मराठा दुर्ग में 'आधुनिक पेशवा' का शंखनाद
सह्याद्रि की अभेद्य पर्वतमालाओं और अरब सागर की उद्दाम लहरों की ओट में बसा महाराष्ट्र, भारतीय राजनीति की वह उर्वर प्रयोगशाला है जहाँ सत्ता का विमर्श अक्सर स्थापित क्षत्रपों और चंद रसूखदार परिवारों की निजी जागीरदारी के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। दशकों तक इस वीरभूमि का अलिखित संविधान यही रहा कि यहाँ का सिंहासन केवल ‘मराठा’ प्रभुत्व के लिए आरक्षित है।
16 Feb 2026
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