पहचान का वनवास
असम के बागानों में ‘टी-ट्राइब’ पहचान तले दबी आदिवासी अस्मिता अब चुनावी गणित को चुनौती दे रही है। यह ऐतिहासिक न्याय और राजनीतिक वजूद की बहाली का एक निर्णायक शंखनाद है।
16 Feb 2026
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चाय की खुशबू में दफन एक प्राचीन सभ्यता
असम के हरे-भरे चाय बागानों से उठती चाय की खुशबू में एक ऐसी कड़वाहट घुली है, जिसे मुख्यधारा का विमर्श अक्सर अनदेखा कर देता है। यह कड़वाहट है—अमरजीत केरकेट्टा जैसे लाखों आदिवासियों की छीनी गई पहचान की। लगभग दो सौ वर्ष पूर्व, औपनिवेशिक सत्ता ने जिन्हें 'सस्ते श्रम' के रूप में झारखंड और छोटा नागपुर के जंगलों से उखाड़कर ब्रह्मपुत्र की वादियों में रोपा था, आज वे अपनी ही जड़ों के लिए तरस रहे हैं। अमरजीत का सवाल बुनियादी भी है और मारक भी: "आखिर 'टी-ट्राइब' का मतलब क्या है?" क्या सौ-दो सौ साल पुराना एक उद्योग, हज़ारों साल पुराने खड़िया, उरांव, मुंडा और संथाल इतिहास को अपनी मखमली चादर तले दबा सकता है? असम में इन आदिवासियों को 'टी-ट्राइब' या 'एक्स-टी ट्राइब' जैसे औद्योगिक लेबलों से पुकारा जाना केवल भाषाई सरलीकरण नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित 'सांस्कृतिक विलोपन' है। विडंबना देखिए, जिस आदिवासी पहचान को पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और उनकी पैतृक भूमि झारखंड में संवैधानिक गरिमा प्राप्त है, वही पहचान असम की सीमा में प्रवेश करते ही 'अन्य पिछड़ा वर्ग' की प्रशासनिक फाइलों में दफन हो जाती है। यह 'उधार की पहचान' के साथ जीने की एक ऐसी विवशता है, जहाँ व्यक्ति का वजूद उसके पसीने से सींचे गए चाय के पत्तों से तो आंका जाता है, लेकिन उसकी नागरिक गरिमा और भाषाई अस्मिता को मान्यता के गलियारों में दरकिनार कर दिया जाता है। अमरजीत की लड़ाई केवल आरक्षण की नहीं, बल्कि उस 'आदिवासी' शब्द को पुनः प्राप्त करने की है, जिसे 1950 के दशक में रणनीतिक रूप से उनसे छीन लिया गया था। यह संघर्ष उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का आह्वान है, जिसने एक पूरी सभ्यता को बागानों की चहारदीवारी में 'अदृश्य' बना दिया है।
अस्मिता बनाम चुनावी गणित
असम की राजनीति का वास्तविक व्याकरण अक्सर उन 'अदृश्य' हाथों से लिखा जाता है, जो सुबह की पहली किरण के साथ चाय की कोमल पत्तियां तोड़ते हैं। किंतु विडंबना यह है कि लोकतंत्र के इस महासमर में ये हाथ केवल 'वोट' डालने के लिए तो निर्णायक माने जाते हैं, परंतु सत्ता के शीर्ष पर अपनी दावेदारी पेश करने के लिए इन्हें संवैधानिक बाधाओं के चक्रव्यूह में उलझा दिया गया है। ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम जैसे संगठनों का यह ऐतिहासिक आरोप कि आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में आदिवासियों को 'डी-शेड्यूल' कर उनकी राजनीतिक रीढ़ तोड़ दी गई, भारतीय संघवाद के एक स्याह अध्याय की ओर संकेत करता है। यह महज़ एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी 'रणनीतिक बेदखली' थी, जिसने करोड़ों आदिवासियों को उनके नैसर्गिक राजनीतिक नेतृत्व से वंचित कर दिया।
असम में झारखंड मूल के इन आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने से इनकार करना केवल तकनीकी जटिलता नहीं है; इसके पीछे सत्ता का वह गहरा संरक्षणवादी चरित्र और चुनावी भय छिपा है, जो संख्याबल के समीकरणों से थर्राता है। वर्तमान में असम की 126 विधानसभा सीटों में से केवल 19 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। यदि सत्तर लाख से अधिक की आबादी वाले इन तथाकथित 'टी-ट्राइब्स' को उनकी वास्तविक जनजातीय पहचान मिल जाती है, तो आरक्षित सीटों का यह आंकड़ा उछलकर 45 तक पहुँच सकता है। यह सांख्यिकीय बदलाव केवल सीटों का बँवारा नहीं होगा, बल्कि यह असम की राजनीतिक धुरी को ही विस्थापित कर देगा। यह दिसपुर की देहरी पर एक ऐसे नेतृत्व को खड़ा कर देगा, जिसकी जड़ें छोटा नागपुर के पठारों और असम के बागानों के साझा संघर्षों में रची-बसी होंगी। राजनीतिक गलियारों में यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि आदिवासियों को एसटी का दर्जा देने का अर्थ है—असम में एक 'आदिवासी मुख्यमंत्री' की संभावना के द्वार खोलना। यही वह बुनियादी डर है जो बड़ी राजनीतिक शक्तियों को पिछले कई दशकों से 'चुनावी घोषणापत्रों' और 'धरातलीय क्रियान्वयन' के बीच झूलने पर विवश कर रहा है।
इस विवाद की जटिलता तब और बढ़ जाती है जब 'अहोम' जैसे सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समुदाय भी स्वयं को एसटी श्रेणी में शामिल करने की मांग उठाते हैं। असम कैबिनेट द्वारा हाल ही में छह समुदायों को एसटी दर्जा देने की मंजूरी देने के बाद, संघर्ष 'मूल निवासी बनाम प्रवासी' की उस पेचीदा बहस में तब्दील हो गया है, जहाँ दो सदियों से असम की मिट्टी को अपने रक्त से सींचने वाले झारखंडी आदिवासियों को आज भी 'बाहरी' चश्मे से देखा जाता है। झारखंड सरकार द्वारा भेजा गया प्रतिनिधिमंडल इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने की एक कोशिश है, लेकिन अंतिम समाधान दिसपुर की राजनीतिक इच्छाशक्ति और ऐतिहासिक न्याय की भावना में ही निहित है। जब तक आदिवासियों को उनकी वास्तविक पहचान और संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त नहीं होती, तब तक 'सबका साथ, सबका विकास' का उद्घोष इन बागानों की गहरी घाटियों में महज़ एक गूँज बनकर रह जाएगा। भूमि के स्वामित्व से वंचित और न्यूनतम मज़दूरी की अंतहीन जद्दोजहद में फँसे ये आदिवासी आज उस मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ उनकी अस्मिता और राजनीतिक वजूद के बीच की लक्ष्मण-रेखा धुंधली हो चुकी है। यह लड़ाई अब आरक्षण के आर्थिक लाभ से कहीं ऊपर उठकर 'आत्म-सम्मान' के उस कुरुक्षेत्र में पहुँच गई है, जहाँ वे ‘टी-ट्राइब’ के अपमानजनक लेबल को उतारकर अपनी प्राचीन जनजातीय विरासत को पुनः स्थापित करने के लिए संकल्पबद्ध हैं। असम की राजनीति में यह मूक क्रांति आने वाले वर्षों में सत्ता के स्थापित और वंशवादी बुर्जों को हिलाने का पूर्ण सामर्थ्य रखती है।
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