संसद में टकराव, जवाबदेही पर सवाल
हालिया बजट सत्र में संसद केवल हंगामे का मंच नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही की कठोर परीक्षा बन गया। विपक्ष ने सत्ता को ऐसे सवालों के कटघरे में खड़ा किया, जिनसे बचना अब राजनीतिक नहीं, लोकतांत्रिक संकट बनता जा रहा है।
16 Feb 2026
|
35
हालिया बजट सत्र में संसद का वातावरण केवल शोर और व्यवधान का प्रतीक नहीं था, बल्कि वह उस गहरी लोकतांत्रिक बेचैनी का प्रतिबिंब था, जो आज देश के भीतर फैलती जा रही है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस सत्र को औपचारिक बहसों तक सीमित न रखते हुए सरकार को ऐसे मुद्दों पर घेरने की कोशिश की, जिनका सीधा संबंध देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों से है। यह टकराव केवल सत्ता और विपक्ष के बीच नहीं था, बल्कि यह सवाल पूछने के अधिकार और जवाब देने की जिम्मेदारी के बीच की लड़ाई थी।
सबसे पहले और सबसे तीखे रूप में जो मुद्दा उभरा, वह था एपस्टीन फाइल। अंतरराष्ट्रीय न्यायिक दस्तावेज़ों में दर्ज ये फाइलें किसी राजनीतिक अफवाह का हिस्सा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़ा तथ्यात्मक रिकॉर्ड हैं। जेफरी एप्सटीन से जुड़े दस्तावेज़ों में जब भारत से संबंधित संदर्भ सामने आए, तो विपक्ष का सवाल स्वाभाविक था—क्या सरकार इस पर पूरी पारदर्शिता के साथ संसद को जानकारी देगी? राहुल गांधी ने यह स्पष्ट किया कि आरोप लगाना विपक्ष का उद्देश्य नहीं, बल्कि स्पष्टीकरण मांगना उसका संवैधानिक कर्तव्य है। इसके बावजूद सरकार की प्रतिक्रिया टालने वाली रही। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस ने तथ्यों को स्पष्ट करने के बजाय तकनीकी दलीलों का सहारा लिया, जिससे संदेह और गहरा हुआ। लोकतंत्र में नैतिक जवाबदेही केवल कानूनी बचाव से पूरी नहीं होती; वहां सार्वजनिक विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
इसी कड़ी में भारत–अमेरिका व्यापार समझौते का मुद्दा उठा, जिसने विपक्ष को सरकार पर सीधा हमला करने का अवसर दिया। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह समझौता किसानों, छोटे व्यापारियों और घरेलू उद्योगों के हितों को कमजोर करता है। उनका सवाल था—क्या यह सौदा संसद और जनता को विश्वास में लेकर किया गया, या फिर इसे बंद दरवाज़ों के पीछे तय किया गया? सरकार की ओर से विस्तृत दस्तावेज़ी जवाब के बजाय सामान्य बयान दिए गए। विपक्ष का तर्क स्पष्ट था: यदि समझौता देशहित में है, तो उससे जुड़ी हर शर्त और प्रभाव संसद के पटल पर क्यों नहीं रखे जाते?
बजट को लेकर विपक्ष की आलोचना केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने सरकार की दृष्टि पर सवाल खड़े किए। यह बजट बेरोज़गारी, महँगाई और ग्रामीण संकट जैसी समस्याओं का ठोस समाधान पेश करने में विफल रहा। युवाओं के लिए रोज़गार सृजन के वादे भाषणों में तो दिखे, लेकिन ज़मीनी योजनाओं में उनका प्रतिबिंब कम नज़र आया। ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसे भविष्य के निर्णायक क्षेत्रों पर बजट की चुप्पी यह दर्शाती है कि सरकार दीर्घकालिक रणनीति के बजाय तात्कालिक राजनीतिक संतुलन साधने में अधिक रुचि रखती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी इस सत्र में केंद्र में रहा। लद्दाख और चीन सीमा से जुड़ी स्थिति पर विपक्ष ने स्पष्ट चर्चा की मांग की, लेकिन सदन में इस विषय पर बहस को सीमित रखा गया। राहुल गांधी का तर्क था कि सीमा पर हालात पर सवाल उठाना राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि राष्ट्रहित है। यदि स्थिति सामान्य है, तो सरकार को खुलकर बताना चाहिए; और यदि गंभीर है, तो देश को सच जानने का अधिकार है। इस मुद्दे पर सरकार की असहजता ने विपक्ष के आरोपों को और धार दी।
संसदीय प्रक्रियाओं को लेकर भी विपक्ष का हमला तीखा था। विपक्षी सांसदों का निलंबन, बोलने के अवसरों में कटौती और नियमों की चयनात्मक व्याख्या—ये सब घटनाएँ इस ओर इशारा करती हैं कि बहुमत को संवाद के बजाय नियंत्रण का औज़ार बनाया जा रहा है। स्पीकर के विरुद्ध नोटिस देना कोई साधारण कदम नहीं होता; यह उस स्थिति को दर्शाता है जब विपक्ष को लगता है कि सदन का संतुलन और निष्पक्षता खतरे में है।
किसानों का मुद्दा भी इस सत्र में प्रमुखता से उठा। न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि आय की स्थिरता और आयात नीति को लेकर विपक्ष ने सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा। उनका तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों की आड़ में यदि घरेलू कृषि को कमजोर किया गया, तो इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। यह चेतावनी राजनीतिक बयान से अधिक एक नीतिगत आग्रह थी।
सरकार का बार-बार दोहराया गया बचाव—कि विपक्ष निराधार आरोप लगा रहा है—अब असर खोता दिख रहा है। जब सवाल लगातार बढ़ते जाएँ और जवाब लगातार टलते रहें, तो लोकतंत्र में अविश्वास की खाई गहरी होती है। विपक्ष का रुख साफ है: पारदर्शिता कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। चाहे मामला एपस्टीन फाइल का हो, व्यापार समझौतों का हो, बजट की प्राथमिकताओं का हो या राष्ट्रीय सुरक्षा का—सरकार को तथ्य सामने रखने ही होंगे।
अंततः, यह बजट सत्र एक चेतावनी के रूप में दर्ज होगा। यह चेतावनी सरकार के लिए भी है और लोकतंत्र के लिए भी। विपक्ष ने यह संकेत दे दिया है कि वह मुद्दों पर पीछे हटने वाला नहीं है। अब सरकार के सामने विकल्प साफ हैं—या तो वह बहस और जवाबदेही को अपनाए, या फिर चुप्पी और टालमटोल की राजनीति जारी रखे। लेकिन इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र में आख़िरी फैसला सदन नहीं, जनता सुनाती है।
ट्रेंडिंग
साइना नेहवालः जिद, युग, विरासत
16 Feb 2026 56
SHANTI: भविष्य का आधार
16 Feb 2026 67
आकाशीय संप्रभुताः SJ-100 बनेगा भारत का सारथी?
16 Feb 2026 46
आत्मनिर्भर भारत का 'रेयर अर्थ' संकल्प
16 Feb 2026 55
भारत-मलेशियाः नई कूटनीतिक धुरी
16 Feb 2026 36
पहचान का वनवास
16 Feb 2026 23
मराठा दुर्ग में 'आधुनिक पेशवा' का शंखनाद
16 Feb 2026 27
महाराष्ट्र का नया व्याकरणः ठाकरे विरासत का विसर्जन
16 Feb 2026 13
परिसीमन: ततैया का छत्ता
16 Feb 2026 39
डिजिटल रण और भारत का विवेक
16 Feb 2026 12
भारत-अमेरिका व्यापार समझौताः कूटनीतिक 'रीसेट'
16 Feb 2026 48
संक्रांति का शंखनाद, भारत-ईयू एफटीए
16 Feb 2026 31
केंद्रीय बजटः भविष्य का बजट, वर्तमान की चिंता
16 Feb 2026 24
बांग्लादेश: जनादेश पार कूटनीति के द्वार
16 Feb 2026 25
एपस्टीन फाइल: सत्ता की चुप्पी व लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
16 Feb 2026 24