भारत-मलेशियाः नई कूटनीतिक धुरी

कुआलालंपुर में भारत-मलेशिया ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी का नया व्याकरण लिखा है। रक्षा, तकनीक और सांस्कृतिक विरासत का यह संगम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक स्थिरता का एक नया सूर्योदय है।

16 Feb 2026  |  36

कुआलालंपुर की गगनचुंबी इमारतों के साये में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मलेशियाई समकक्ष अनवर इब्राहिम के बीच संवाद की कड़ियां जुड़ीं, तो वह केवल दो राष्ट्राध्यक्षों की औपचारिक भेंट मात्र नहीं थी। वह हिंद-प्रशांत के सामरिक मानचित्र पर दो ऐसी शक्तियों का महामिलन था, जो अपनी साझा नियति को 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' के सांचे में ढालने के लिए संकल्पित हैं। फरवरी 2026 की इस यात्रा ने न केवल दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति को एक नई ऊर्जा प्रदान की, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में नई दिल्ली और कुआलालंपुर के बीच का सेतु अब पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ और बहुआयामी हो चुका है। प्रधानमंत्री मोदी की यह तीसरी मलेशिया यात्रा उस समय घटित हुई जब वैश्विक राजनीति में 'आसियान केंद्रीयता' और समुद्री सुरक्षा के प्रश्न सबसे मुखर हैं।
मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इस विमर्श को 'अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक' की संज्ञा देते हुए उस ऐतिहासिक विरासत को याद किया, जो 1957 से दोनों देशों को एक सूत्र में बांधे हुए है। इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि ग्यारह प्रमुख दस्तावेजों का आदान-प्रदान और समझौतों की वह श्रृंखला रही, जिसने रक्षा, तकनीक, संस्कृति और व्यापार के नए व्याकरण लिखे हैं। इन समझौतों में ऑडियो-विजुअल सह-निर्माण से लेकर आपदा प्रबंधन, भ्रष्टाचार निवारण और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सहयोग जैसे महत्वपूर्ण आयाम शामिल हैं। यह विविधता इस बात का प्रमाण है कि भारत और मलेशिया अब केवल पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे 'को-सिस्टम' का निर्माण कर रहे हैं जहाँ सुरक्षा और समृद्धि एक-दूसरे की पूरक हैं। विशेष रूप से, दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषदों के बीच सहयोग और आतंकवाद के विरुद्ध 'शून्य सहिष्णुता' का स्पष्ट संदेश—'कोई दोहरा मापदंड नहीं, कोई समझौता नहीं'—इस साझेदारी की सामरिक गहराई को रेखांकित करता है।
इस कूटनीतिक यात्रा का तकनीकी आयाम विशेष रूप से जाज्वल्यमान रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल अर्थव्यवस्था को इस साझेदारी का नया 'ग्रोथ इंजन' बताया। मलेशिया, जो वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर निर्यात में छठे स्थान पर है और जिसकी अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 25 प्रतिशत है, भारत की 'डिजिटल इंडिया' और विनिर्माण महत्त्वाकांक्षाओं के लिए एक अनिवार्य भागीदार बनकर उभरा है। एनपीसीआई और मलेशिया के पे-नेट के बीच सीमा पार भुगतान को लेकर हुआ समझौता डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक एकीकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। यह समझौता न केवल व्यापारिक सुगमता बढ़ाएगा, बल्कि दोनों देशों के आम नागरिकों के बीच वित्तीय लेन-देन को भी एक नई परिभाषा देगा। इसके साथ ही, आयुर्वेद और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग यह दर्शाता है कि भारत अपनी प्राचीन विरासत को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर वैश्विक कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों की ऊष्मा इस यात्रा के हर मोड़ पर महसूस की गई। प्रधानमंत्री मोदी ने तमिल भाषा के प्रति 'साझा प्रेम' को दोनों देशों को जोड़ने वाला एक जीवंत तंतु बताया। मलेशिया की शिक्षा, मीडिया और जनजीवन में तमिल की जीवंत उपस्थिति को स्वीकार करते हुए उन्होंने यूनिवर्सिटी मालाया में 'तिरुवल्लुवर केंद्र' की स्थापना और मलेशियाई नागरिकों के लिए 'तिरुवल्लुवर छात्रवृत्ति' की घोषणा की। यह केवल भाषाई सम्मान नहीं, बल्कि एक 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति है जो दिलों को जोड़ती है। कूटनीति के इसी मानवीय पक्ष का विस्तार तब देखने को मिला जब प्रधानमंत्री ने 'इंडियन नेशनल आर्मी' के वयोवृद्ध योद्धा जेयराज राजा राव से भेंट की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आईएनए के बलिदानों को याद करना उस ऐतिहासिक ऋण की स्वीकृति थी, जिसने भारत की नियति को गढ़ने में दक्षिण-पूर्व एशिया की भूमिका को अमर बना दिया है।
निष्कर्षतः, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत-मलेशिया संबंधों के एक नए सूर्योदय की घोषणा है। जहाँ एक ओर रक्षा और समुद्री सुरक्षा के मोर्चे पर दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता के लंगर के रूप में उभर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर व्यापार और नवाचार के धरातल पर वे एक-दूसरे की क्षमताओं का लाभ उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और ऊर्जा व खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने का आह्वान यह संकेत देता है कि यह साझेदारी आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक विन्यास को प्रभावित करने का सामर्थ्य रखती है। कुआलालंपुर की सड़कों पर बिछाया गया 'रेड कार्पेट' और 'गार्ड ऑफ ऑनर' केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक उभरते हुए नए भारत के प्रति मलेशिया के गहरे विश्वास और साझा भविष्य की आकांक्षा का प्रतिबिंब था। यह यात्रा सिद्ध करती है कि जब प्राचीन सांस्कृतिक जड़ें आधुनिक सामरिक विज़न के साथ मिलती हैं, तो वह 'डिजिटल कुरुक्षेत्र' के इस युग में भी शांति और प्रगति का एक अभेद्य दुर्ग खड़ा कर सकती हैं। 

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