इतिहास के पन्नों में भारत और रूस (पूर्ववर्ती सोवियत संघ) का संबंध सदैव रक्षा गलियारों की गूँज और 'मिग' या 'सुखोई' जैसे लड़ाकू विमानों की गर्जना से परिभाषित होता रहा है। किंतु, फरवरी 2026 में हैदराबाद के नीले आकाश के नीचे 'विंग्स इंडिया 2026' के मंच पर जो दृश्य उभरा, वह एक भिन्न भविष्य की ओर संकेत कर रहा था। रूस द्वारा अपने क्षेत्रीय यात्री जेट 'सुपरजेट SJ-100' और टर्बोप्रॉप 'Il-114-300' का अनावरण केवल एक औद्योगिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस सामरिक साझेदारी का नया व्याकरण था जो अब युद्धभूमि से निकलकर नागरिक उड्डयन के वाणिज्यिक क्षितिज तक विस्तृत हो रही है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और रूस के यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन के बीच SJ-100 के भारत में संभावित निर्माण का समझौता उस 'डिजिटल और औद्योगिक कुरुक्षेत्र' में भारत की बढ़ती धमक का प्रमाण है, जहाँ अब मुकाबला केवल हथियारों का नहीं, बल्कि तकनीक, विनिर्माण और बाजार पर आधिपत्य का है।
विंग्स इंडिया 2026 का शंखनाद
एशिया के सबसे बड़े नागरिक उड्डयन आयोजन 'विंग्स इंडिया 2026' ने भारत को वैश्विक विमानन विन्यास की धुरी के रूप में प्रस्तुत किया। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू द्वारा इस शो का उद्घाटन और विमानन विनिर्माण को बढ़ावा देने का संकल्प यह स्पष्ट करता है कि सरकार अब विमानों के केवल 'संचालन' से संतुष्ट नहीं है, बल्कि वह 'निर्माण' के क्षेत्र में अपनी संप्रभुता चाहती है। बोइंग 787-9 ड्रीमलाइनर और एयरबस ए321 नियो जैसे पश्चिमी दिग्गजों के बीच रूसी 'नभ-विहंगों'—Il-114-300 और SJ-100—की उपस्थिति एक रणनीतिक संतुलन पैदा कर रही थी।
ये रूसी विमान केवल प्रदर्शनी की वस्तुएं नहीं थे; ये रूसी स्वदेशीकरण की पराकाष्ठा हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों की आग में तपकर निकले ये विमान पूरी तरह से रूसी प्रणालियों, घटकों और 'पीडी-8' इंजनों से लैस हैं। रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव की उपस्थिति और यूएसी-इंडिया समझौते पर मुहर लगना इस बात की पुष्टि है कि मास्को अब भारत को केवल एक ग्राहक नहीं, बल्कि अपने भविष्य के नागरिक विमानन पारिस्थितिकी तंत्र के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देख रहा है।
भारतीय विमानन बाजार
भारत आज विश्व का सबसे तेजी से बढ़ता नागरिक उड्डयन क्षेत्र है। 2025 तक यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हवाई यात्री बाजार बन चुका है, जो राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में 5% का योगदान दे रहा है। 2014 में जहाँ केवल 74 हवाई अड्डे थे, आज उनकी संख्या बढ़कर 160 हो चुकी है। 161.3 मिलियन से अधिक घरेलू यात्रियों की आवाजाही और इंडिगो व एयर इंडिया जैसी दिग्गज कंपनियों द्वारा आगामी दशक के लिए दिए गए 1000 से अधिक विमानों के ऑर्डर यह बताते हैं कि भारतीय आकाश की प्यास अनंत है।
किंतु विडंबना यह रही है कि इस विशाल बाजार पर दशकों से बोइंग और एयरबस जैसी पश्चिमी शक्तियों का एकाधिकार रहा है। भारत के पास विनिर्माण कौशल है, श्रमशक्ति है और 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुकूल नीतियां हैं, लेकिन 'मौलिक डिजाइन' और 'इंजन तकनीक' के मोर्चे पर हम अब भी आयातित मेधा पर निर्भर हैं। रूस के साथ प्रस्तावित साझेदारी इसी शून्यता को भरने का एक साहसी प्रयास है।
पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण
भारत में परिवहन विमान निर्माण का सपना नया नहीं है, लेकिन इसकी गति अब तीव्र हुई है। एचएएल द्वारा लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के तहत बनाए गए 'एवरो' और 'डॉर्नियर' इसके शुरुआती अध्याय थे। आज टाटा समूह इस क्षेत्र में एक 'गेम-चेंजर' बनकर उभरा है। एयरबस C-295 सामरिक सैन्य परिवहन विमान का निर्माण वडोदरा में शुरू होना एक ऐतिहासिक मोड़ है। सितंबर 2026 में जब पहला 'मेड-इन-इंडिया' C-295 बाहर आएगा, तो उसमें 96% स्वदेशी सामग्री होगी। यह परियोजना 125 से अधिक भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को एक ऐसी मूल्य शृंखला से जोड़ रही है जो भविष्य के स्वदेशी यात्री विमानों की नींव रखेगी।
इसी क्रम में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस का ब्राजील की कंपनी 'एम्ब्रेयर' के साथ समझौता एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है। यह निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों का वह 'सिनर्जी' है जो भारत को केवल असेंबली लाइन से ऊपर उठाकर एक 'इंटीग्रेटेड एयरोस्पेस इकोसिस्टम' में रूपांतरित करने के लिए तैयार है।
SJ-100 प्रस्ताव
अक्टूबर 2025 में मास्को में हस्ताक्षरित एचएएल-यूएसी समझौता विशेष रूप से 'उड़ान' योजना के तहत क्षेत्रीय हवाई अड्डों को जोड़ने के लिए बनाया गया है। 103 सीटों वाला यह जेट भारत की लघु-दूरी की उड़ानों के लिए एक आदर्श विकल्प है। एचएएल का अनुमान है कि आगामी दशक में भारत को 200 और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को 350 क्षेत्रीय जेट विमानों की आवश्यकता होगी।
यहाँ एक जटिल पहलू पश्चिमी प्रतिबंधों का है। यूएसी वर्तमान में अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के घेरे में है। लेकिन भारत ने अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' को अक्षुण्ण रखते हुए स्पष्ट किया है कि वह एकतरफा प्रतिबंधों को स्वीकार नहीं करता। नई दिल्ली का तर्क तार्किक है—जब पश्चिम स्वयं रूस से अरबों डॉलर का सामान खरीद रहा है, तो भारत पर उँगली उठाना केवल 'दोहरा मापदंड' है। भारत के लिए रूस एक 'परखा हुआ मित्र' है जो तकनीक हस्तांतरण में पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक उदार रहा है। रूसी तकनीक और भारत की कुशल कार्यशक्ति, सॉफ्टवेयर विशेषज्ञता और निजी क्षेत्र की वित्तीय सुदृढ़ता मिलकर विमानन की एक नई 'वैश्विक सर्वश्रेष्ठ पद्धति' खड़ी कर सकते हैं।
सेवा से स्वायत्तता तक
विमानन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु उपेक्षित पक्ष है 'रखरखाव, मरम्मत और संचालन' । वर्तमान में भारत की 80-85% एमआरओ आवश्यकताएं विदेशों से पूरी की जाती हैं, जिससे भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च कर और अपर्याप्त बुनियादी ढांचा इस क्षेत्र की बाधाएं रही हैं।
सरकार ने अब इस दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। एमआरओ सेवाओं पर कर को 18% से घटाकर 5% करना और रॉयल्टी शुल्क को समाप्त करना लागत को 10-20% तक कम कर देगा। नीति आयोग का सुझाव है कि पहले वैश्विक दिग्गजों के साथ संयुक्त उद्यम बनाकर मूल्य शृंखला में ऊपर चढ़ा जाए। भारत का लक्ष्य सिंगापुर की तर्ज पर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का एमआरओ हब बनना है। यदि रूस के SJ-100 का निर्माण भारत में होता है, तो इसके साथ ही रूसी-भारतीय संयुक्त एमआरओ केंद्रों का जाल बिछेगा, जो केवल भारत ही नहीं, बल्कि समूचे दक्षिण और पूर्व एशिया के विमानों की सेवा कर सकेंगे।
चुनौतियां और भविष्य की राह
इतने बड़े स्वप्न के मार्ग में चुनौतियां हिमालय सदृश हैं। भारत के पास निर्माण कौशल तो है, लेकिन 'मूल डिजाइन क्षमता' का अब भी अभाव है। हम इंजनों और एवियोनिक्स के लिए आज भी विदेशी साझेदारों के मोहताज हैं।
इसके लिए भारत को 'वैमानिकी विकास एजेंसी' की तर्ज पर एक स्वतंत्र नागरिक विमानन प्राधिकरण की आवश्यकता है, जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन कार्य करे। यह एजेंसी सार्वजनिक और निजी विनिर्माण इकाइयों के बीच समन्वय स्थापित करे और मध्यम-भार वाले सैन्य परिवहन विमानों के साथ-साथ नागरिक यात्री विमानों के विकास को गति दे। भारत को विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं के साथ इंजन निर्माण के लिए संयुक्त उद्यमों पर जोर देना होगा, क्योंकि इंजन ही किसी भी विमान का 'हृदय' होता है।
सिलिकॉन और स्टील का नया संतुलन
इक्कीसवीं सदी के इस नए 'औद्योगिक कुरुक्षेत्र' में, जहाँ पश्चिम अब चीन से किनारा कर रहा है और यूरोप में उत्पादन लागत आसमान छू रही है, भारत विमान निर्माण और रखरखाव के लिए सबसे उपयुक्त गंतव्य है। नई दिल्ली की कूटनीतिक कुशलता ने इसे एक ऐसे दुर्लभ स्थान पर खड़ा कर दिया है जहाँ इसके पास पश्चिम का निवेश और रूस की तकनीक, दोनों उपलब्ध हैं।
रूस-भारत SJ-100 परियोजना केवल एक विमान के निर्माण का अनुबंध नहीं है; यह भारत के आत्मनिर्भरता के संकल्प का 'टेक-ऑफ' है। भविष्य के युद्ध और भविष्य की समृद्धि केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि डेटा सेंटरों, आरएंडडी प्रयोगशालाओं और एयरोस्पेस फैक्ट्रियों में तय होगी। भारत को अपनी वैधानिक संप्रभुता के साथ-साथ 'तकनीकी संप्रभुता' को सुरक्षित करना होगा। यदि हम अपने स्वयं के डिजाइन, पेटेंट और इंजनों का विकास कर सके, तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय आकाश में भारतीय मेधा से बने विमान उड़ेंगे। रूस के साथ यह साझेदारी उस महान यात्रा का एक अनिवार्य और सामरिक प्रस्थान बिंदु है। यह समय भय का नहीं, बल्कि भविष्य की आँखों में आँखें डालकर अपनी शर्तों पर इतिहास लिखने का है। नभ-स्पर्श के इस महायज्ञ में भारत का विवेक ही उसका सबसे बड़ा पथ-प्रदर्शक होगा।
आकाशीय संप्रभुताः SJ-100 बनेगा भारत का सारथी?
भारत-रूस का 'SJ-100' समझौता केवल विमान निर्माण का अनुबंध नहीं, बल्कि पश्चिमी एकाधिकार को चुनौती देती एक सामरिक हुंकार है। तकनीकी संप्रभुता और 'उड़ान' योजना के लक्ष्यों को साधता यह 'नभ-विहंग', क्या भारत को वैश्विक विमानन विनिर्माण का नया शक्ति-केंद्र बना पाएगा? आइए, इस नए औद्योगिक कुरुक्षेत्र का विश्लेषण करें।
16 Feb 2026
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