भारत की शिक्षा यात्रा : नींव नेहरू की, नवाचार मोदी का

स्वतंत्र भारत की शिक्षा यात्रा दो अलग-अलग युगों की कहानी है। एक ओर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ज्ञान की आधारशिला रखी, तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे तकनीक, नवाचार और वैश्विक दृष्टि से नई दिशा देने का प्रयास किया।

13 Jun 2026  |  280

 

 

भारत का इतिहास केवल राजनैतिक घटनाओं का इतिहास नहीं है; यह विचारों, संस्थाओं और पीढ़ियों के निर्माण का इतिहास भी है। यदि किसी राष्ट्र की आत्मा को समझना हो तो उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और ज्ञान-संस्थानों को देखना चाहिए। इस दृष्टि से स्वतंत्र भारत के दो लंबे प्रधानमंत्रित्व काल - पंडित जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी, विशेष अध्ययन के विषय बन जाते हैं। यह विषय समीचिन इसलिए भी है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री के कार्यकाल का रिकार्ड अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तोड़ा है। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान का शांत, तथ्याधारित और निष्पक्ष मूल्यांकन समय की मांग है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उस भारत की बागडोर संभाली थी जो सदियों की गुलामी से निकलकर अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रहा था। स्वतंत्रता के समय देश की निरक्षरता दर लगभग 82–84% थी, अर्थात साक्षरता दर 20 प्रतिशत से भी कम थी। गाँवों में विद्यालय दुर्लभ थे और उच्च शिक्षा कुछ बड़े शहरों तक सीमित थी। ऐसे समय में नेहरू ने शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का औजार माना।

नेहरू का भारत, एक विशाल बंजर भूमि की तरह था, जहां सबसे पहले ज्ञान के बीज बोने थे। भारत सरकार के आधिकारिक शिक्षा आंकड़ों के अनुसार, जहां 1950-51 में देश में केवल 2.1 लाख प्राथमिक विद्यालय, 13 हजार उच्च प्राथमिक विद्यालय और 7 हजार माध्यमिक विद्यालय थे. वहीं नेहरू की नीतियों के फलस्वरूप 1964-65 तक यह संख्या बढ़कर क्रमशः 3.9–4.0 लाख प्राथमिक विद्यालय, 67 हजार उच्च प्राथमिक विद्यालय और 27 हजार माध्यमिक विद्यालय हो गई। इस प्रकार उनके शासनकाल में लगभग 2 लाख से अधिक नए विद्यालय अस्तित्व में आए और लाखों बच्चों के लिए विद्यालयों के द्वार खुले। जनसांख्यिकी के अनुपात में देखें तो 1951 में प्रति 1,570 व्यक्तियों पर उपलब्ध एक विद्यालय का औसत सुधरकर 1964-65 तक प्रति 950 व्यक्तियों पर एक विद्यालय हो गया।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में, जहाँ 1947 में मात्र 20 विश्वविद्यालय और 500 कॉलेज थे, वहीं 1964 तक उनकी संख्या बढ़कर 60 से अधिक विश्वविद्यालय और लगभग 2,500 कॉलेज हो गई। इस प्रकार नेहरू युग में लगभग 40 से अधिक नए विश्वविद्यालय और करीब 2,000 नए कॉलेज स्थापित हुए, जिससे उच्च शिक्षा का अनुपात प्रति 1.7 करोड़ जनसंख्या पर एक विश्वविद्यालय से सुधरकर प्रति 80 लाख जनसंख्या पर एक विश्वविद्यालय हो गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) और अनेक वैज्ञानिक संस्थान उसी युग की देन हैं। नेहरू स्वयं इन्हें "आधुनिक भारत के मंदिर" कहा करते थे, जिनका प्रभाव केवल संख्या से नहीं बल्कि गुणवत्ता से भी आँका जाता है।
यदि नेहरू ने शिक्षा का वृक्ष लगाया, तो नरेंद्र मोदी का कार्यकाल उस वृक्ष की नई शाखाओं और तकनीकी विस्तार का काल कहा जा सकता है। जब मोदी ने सत्ता संभाली, तब देश में विद्यालयों का व्यापक नेटवर्क पहले से मौजूद था। चुनौती अब विद्यालयों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, तकनीकी पहुँच और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने की थी।

यही कारण है कि जहाँ 2013-14 में भारत में लगभग 15.2 लाख स्कूल थे, वहीं UDISE+ 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार देश में स्कूलों की संख्या लगभग 14.71 लाख दर्ज की गई। यह कमी विद्यालयों की अकर्मण्यता के कारण नहीं, बल्कि कई छोटे विद्यालयों के विलय (मर्जिंग), पुनर्गठन और युक्तिकरण के कारण हुई। इस व्यवस्था में वर्तमान में प्रति स्कूल औसतन 970–980 व्यक्तियों का अनुपात संतुलित बना हुआ है।

 

मोदी सरकार के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP 2020) लागू की गई, जिसे स्वतंत्र भारत की सबसे व्यापक शैक्षिक सुधार योजना माना जाता है। इस नीति ने रटंत शिक्षा के स्थान पर कौशल, नवाचार और बहुविषयक अध्ययन को प्राथमिकता दी। डिजिटल इंडिया अभियान के साथ शिक्षा का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। DIKSHA, SWAYAM, और PM e-Vidya जैसे प्लेटफॉर्मों ने शिक्षा को कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकालकर मोबाइल और इंटरनेट तक पहुँचा दिया।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी शिक्षा मंत्रालय के AISHE (अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण) आंकड़ों के अनुसार उल्लेखनीय विस्तार हुआ। वर्ष 2014-15 से 2021-22 के बीच ही देश में 341 नए विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय-स्तरीय संस्थान स्थापित हुए। 2014 की तुलना में, जहाँ कॉलेजों की संख्या लगभग 36–37 हजार थी, वह 2021-22 तक बढ़कर 43,796 पंजीकृत कॉलेजों तक पहुँच गई। इस प्रकार 2014 से 2026 के बीच लगभग 6,000–7,000 अतिरिक्त कॉलेज (सरकारी और निजी मिलाकर) अस्तित्व में आए। वर्तमान में लगभग 1,400 विश्वविद्यालयों और 43,000+ कॉलेजों को मिलाकर उच्च शिक्षा संस्थानों का औसत अनुपात प्रति 32,000–33,000 व्यक्तियों पर बैठता है। इसके साथ ही IIT, IIM और AIIMS जैसे शीर्ष संस्थानों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि की गई तथा कौशल विकास मंत्रालय के माध्यम से रोजगारोन्मुख शिक्षा पर विशेष बल दिया गया।

हालाँकि, दोनों कालखंडों की तुलना करते समय केवल संख्या को आधार बनाना उचित नहीं होगा। नेहरू और मोदी के सामने परिस्थितियाँ सर्वथा भिन्न थीं। नेहरू को एक ऐसा राष्ट्र मिला था जहाँ शैक्षिक ढाँचा लगभग शून्य से प्रारम्भ करना था और साक्षरता की दर बेहद प्राथमिक स्तर पर थी। वहीं मोदी को एक स्थापित व्यवस्था मिली, जिसे नई तकनीक, गुणवत्ता, डिजिटल समावेशन और वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालना था।

एक दृष्टि से देखें तो नेहरू का योगदान "विस्तार" का था और मोदी का योगदान "परिवर्तन" का। नेहरू ने शिक्षा के लिए आधारशिला रखी, जबकि मोदी ने उसी भवन में आधुनिक सुविधाएँ और समकालीन प्रासंगिकता जोड़ने का प्रयास किया। एक ने दीपक जलाया, दूसरे ने उसमें नई ऊर्जा का संचार किया।

फिर भी दोनों युगों की अपनी चुनौतियाँ रही हैं। नेहरू काल में संसाधनों और साक्षरता की घोर कमी थी, जबकि आज के युग में गुणवत्ता, कौशल-बेमेल, रोजगार और वैश्विक स्तर के शोध की चुनौतियाँ सामने हैं। आज भी विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्थानों की उपस्थिति अपेक्षाकृत सीमित है। ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच की डिजिटल खाई पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसलिए यह कहना कि किसी एक युग ने सारी समस्याओं का समाधान कर दिया, इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

वास्तव में भारत की शिक्षा यात्रा किसी एक नेता की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के सामूहिक प्रयास की कहानी है। नेहरू और मोदी दो अलग-अलग युगों के प्रतिनिधि हैं। एक ने स्वतंत्र भारत को शिक्षित करने का सपना देखा, दूसरे ने उस शिक्षा को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने का संकल्प लिया।
इतिहास का निष्पक्ष विद्यार्थी न तो अतीत का अंध-गायक होता है और न वर्तमान का अंध-समर्थक। वह उपलब्धियों को स्वीकार करता है, सीमाओं को पहचानता है और तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालता है। शिक्षा के क्षेत्र में नेहरू और मोदी का मूल्यांकन भी इसी तटस्थ दृष्टि से होना चाहिए।
आखिरकार, राष्ट्रों का भविष्य संसदों में नहीं, कक्षाओं में लिखा जाता है। और भारत की इन कक्षाओं के निर्माण में नेहरू और मोदी—दोनों की अपनी-अपनी ऐतिहासिक ईंटें जुड़ी हुई हैं।