एक खत अपने व्यक्तिगत आजादी और मानव अधिकारों की रक्षा में सहयोग के लिये एमिनेस्टी इंटरनेशनल के नाम.
बेंगलुरु में एमिनेस्टी के कार्यक्रम में कश्मीर की आजादी के नारे के परिप्रेक्ष्य में.
17 Aug 2016
|
2831
एमिनेस्टी इंटरनेशनल
मैं एक 35 वर्षीय युवा हूँ. मेरा नाम कुछ भी हो, पर मैं भारत का एक नागरिक हूँ. ऊँच कूल में जन्मा एक हिन्दू हूँ. आर्थिक रूप से नीचले मध्यमवर्ग में आता हूँ. मेहनत से कला क्षेत्र में उच्चतर शिक्षा हासिल की हुई है. परन्तु बेरोजगार हूँ. निसन्देह वर्तमान जीवन से संतुष्ट नहीं. मुझे मेरे राष्ट्र से शिकायत है अतः मुझे आजादी चाहिये. मेरे पास थोड़ी पुस्तैनी जमीनें है उसे मै एक सम्प्रभु क्षेत्र के रूप में स्थापित करना चाहता हूँ. मै एमिनेस्टी इंटरनेशनल जैसी मानव अधिकारों की रक्षा में तत्पर संस्था से इस बाबत सहायता चाहता हूँ.
मैंने सुना है कि एमिनेस्टी दुनियाभर में मानवाधिकारों और प्रजातंत्र की रक्षा के लिये काम कर रही है. वह भारत में भी जंगलों में नक्सलियों, गाँवों और शहरोँ में शोषित और असंतुष्ट लोगों तथा पहाड़ों में कश्मीरियों तथा नार्थ-ईस्ट के लोगों की मानवाधिकारों और प्रजातान्त्रिक अधिकार्रों के पक्ष में झंडा बुलंद करता रहता है. अभी कुछ दिन पहले ही एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बेंगलुरु में अपने कार्यक्रम में कश्मीर की आजादी, महान प्रजातान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश पाकिस्तान के पक्ष में पाकिस्तान जिन्दाबाद और भारत मुर्दाबाद के नारे भी लगवाये हैं. यही नहीं कई कश्मीरी हिन्दुओं और भारतीय सैनिकों की हत्या करने वाला महान मानवाधिकारवादी बुरहान वानी के समर्थन में भी नारे लगवाये हैं.
मुझे पता चला है कि दुनिया भर में एमिनेस्टी इंटरनेशनल की आलोचना भी होती रही है. इनपर आरोप है कि ये उन्हीं देशों में ज्यादा सक्रिय रहते हैं जहाँ चुनी हुई प्रजातान्त्रिक सरकारें काम करती है और सबसे पहले ये लोग इन सरकारों के खिलाफ ही काम करते हैं. आरोप है कि भारत में नक्सलियों और आतंकवादी घटनायों में शामिल लोगों के पक्ष में ये अपना आवाज बुलंद करते हैं और ऐसे NGO को आर्थिक तौर पर मदद भी करते हैं जो सरकारों और व्यवस्था के विरुद्ध काम करते हों. बेंगलुरु की घटना को लोग इसी क्रम में देख भी रहे हैं. पुलिस ने एमिनेस्टी पर देशद्रोह का केस भी दर्ज किया है. उम्मीद है एमिनेस्टी जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था का ऐसी बातों से भारत जैसे देश में बाल भी बांका नहीं होगा.
एमिनेस्टी को इसराइल,चीन,रूस,अमेरिका आदि जैसे ताकतवर मुल्कों ने क्या बिगाड़ लिया. एमिनेस्टी हमास और इसराइल के विरुद्ध हमेशा से खड़ा रहा है तो क्या हुआ जो पीएलओ की हत्यायों पर हमेशा चुप रहा है.अरबों द्वारा अपने नागरिकों को नहीं दिए गए कई नागरिक अधिकारों पर भी नहीं बोलता ये कोई बड़ी बात तो है नहीं. बड़ी बात यह है कि एमिनेस्टी ने तालिबान के नाम पर अमेरिका द्वारा की गयी हिंसा पर आवाज उठायी है. चीन द्वारा जिनजियांग में मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों को छीने जाने पर आवाज उठाई है. और तो और एमिनेस्टी ने अमेरिका के जेलों में बंद 600 के करीब दुनियाभर के खतरनाक आतंकियों की स्थिति को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान फांसीवादी रुसी और नाजीवादी जर्मन सरकार के जेलों में बंद गुलामों से तुलना तक कर दी है. एमिनेस्टी की कार्यपद्धति की जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है जब इन्होने तालिबान के कट्टर समर्थक, जिहाद के पैरवीकार मोज्ज़म बेग जो गुअतान्मो कैद से बाहर हुआ था के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की भी घोषणा की. हाँ ये अलग बात है कि इस निर्णय को एमिनेस्टी के कई मुर्ख अधिकारियों ने विरोध किया था जिनमें गीता सहगल जैसी बड़ी अधिकारी भी शामिल थी. एमिनेस्टी ने और भी कई महान कार्य किये हैं जो गर्व का विषय है जैसे, वेश्यावृति के वैधीकरण के पक्ष में खड़े होना अपनी ब्रांडिंग करने के लिये झूठे गवाहों को खड़ा कर सहानुभूति लहर पैदा करना.
कुछ दो दशक पहले यानि दस अक्टूबर, 1990 को एक कुवैती लड़की नायिराह अमरीकी कांग्रेस समिति के सामने गवाही देने खड़ी हुई थी. उसने कई नरसंहारों का प्रत्यक्षदर्शी गवाह होने का दावा किया था. उसने बताया था की उसने इराकी सैनिकों को, कुवैती बच्चों को हस्पताल के इनक्यूबेटर से खींच कर जमीन पर पटकते और मारते देखा है. ये ऐसा सनसनीखेज खुलासा था कि उस समय के लगभग हर समाचार पत्र, हर रडियो-टीवी कार्यक्रम में ये गवाही पूरे अमेरिका में दिखाई गई. बाद में ईराक पर, अमेरिकी हमले की कहानी सब जानते हैं.
परन्तु थोड़े समय बाद जब CBC-TV ने अपने प्रोग्राम To Sell a War में इस गवाही की जांच की तो पता चला कि नायिराह की गवाही झूठी थी. वो तो युद्ध के समय कुवैत में थी ही नहीं. नायिराह दरअसल यूनाइटेड स्टेट्स में कुवैत के राजदूत की बेटी थी. कुवैती सरकार ने Hill & Knowlton नाम के पब्लिक रिलेशन संस्थान को युद्ध में अमेरिकी हस्तक्षेप के पक्ष में जनमत बनाने का ठेका दिया था उसी के तहत ये झूठी गवाही दिलवाई गई थी .एमिनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस गवाही को जम कर बेचा था, बाद में एमेनेस्टी इंटरनेशनल के तत्कालीन प्रमुख जॉन हेअले ने, पोल खुलने पर पलटते हुए कहा कि ये अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों की मुहीम को कमजोर करने की साजिश है. हालंकि ये बयान आने तक इराकी मानवाधिकारों को अमरीकी पेट्रियट मिसाइलों ने चपटा कर दिया था.
खैर ,इन छोटी बातों को भूलते हुए मैं मुद्दे पर आता हूँ कि मुझे आजादी और अपने मानवाधिकारों की रक्षा में एमिनेस्टी इंटरनेशनल पर पूरा भरोसा है और उम्मीद है कि जैसे ये लोग चंद कश्मीरी मुसलमानों, प्रगतिशील वाम्पन्थियों और शोषित अम्बेदकरवादियों आदि को उनके मानवाधिकारों और प्रजातान्त्रिक मूल्यों को दिलवाने में मदद कर रहे हैं मुझे भी उसी तरह मदद करेंगें.
धन्यवाद.
अन्य खबरें
असफल शांति, बढ़ता युद्ध
12 Apr 2026 28
साइना नेहवालः जिद, युग, विरासत
16 Feb 2026 267
SHANTI: भविष्य का आधार
16 Feb 2026 280
आकाशीय संप्रभुताः SJ-100 बनेगा भारत का सारथी?
16 Feb 2026 246
आत्मनिर्भर भारत का 'रेयर अर्थ' संकल्प
16 Feb 2026 252
भारत-मलेशियाः नई कूटनीतिक धुरी
16 Feb 2026 198
संसद में टकराव, जवाबदेही पर सवाल
16 Feb 2026 185
पहचान का वनवास
16 Feb 2026 175
मराठा दुर्ग में 'आधुनिक पेशवा' का शंखनाद
16 Feb 2026 186
महाराष्ट्र का नया व्याकरणः ठाकरे विरासत का विसर्जन
16 Feb 2026 141
परिसीमन: ततैया का छत्ता
16 Feb 2026 203
डिजिटल रण और भारत का विवेक
16 Feb 2026 115
भारत-अमेरिका व्यापार समझौताः कूटनीतिक 'रीसेट'
16 Feb 2026 195
संक्रांति का शंखनाद, भारत-ईयू एफटीए
16 Feb 2026 203
केंद्रीय बजटः भविष्य का बजट, वर्तमान की चिंता
16 Feb 2026 174