ओपी राजभर पहुंचे अमित शाह की शरण में, योगी सरकार पार्ट-2 में शामिल होने की चर्चा का बाजार गर्म
ओपी राजभर पहुंचे अमित शाह की शरण में,योगी सरकार पार्ट-2 में शामिल होने की चर्चा का बाजार गर्म <Br/> <Br/> <Br/> <Br/>
sanjay kumar📍 लखनऊ, उत्तर प्रदेश

लखनऊ।देश का आबादी के हिसाब से बड़ा प्रदेश उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है।कल शुक्रवार पूरा भारत जहां रंगों का त्योहार बड़ी धूमधाम से मना रहा था तो वहीं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओपी राजभर भाजपा के शाह केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की शरण में पहुंच कर लगभग एक घंटे मुलाकात की।इस दौरान केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान, भारतीय जनता पार्टी के संगठन मंत्री सुनील बंसल भी थे। 2022 का विधानसभा चुनाव राजभर ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लड़ा था।अब ऐसे में भाजपा के शाह की शरण में जाकर राजभर का मुलाकात करना दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारे में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अगर सब कुछ सही सलामत रहा तो ओपी राजभर योगी सरकार पार्ट-2 में माथा टेकते हुए शामिल हो सकते हैं।योगी सरकार के शपथ ग्रहण से पहले राजभर ने मुलाकात की है।तीन दिनों पहले भी राजभर ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की शरण में पहुंच कर मुलाकात की थी। 4 दिनों में ओपी राजभर दो बार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की शरण में पहुंच कर मुलाकात कर चुके हैं।
सूत्रों से खबर है कि भाजपा के शाह अमित शाह के सामने राजभर ने अपनी मांग के साथ अपना पक्ष भी रखा हे।अब फैसला भाजपा के शाह और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को करना है।माना जा रहा है कि भाजपा और राजभर दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है,क्योंकि पूर्वांचल में लगभग 26 लोकसभा सीटें ऐसी हैं,जहां राजभर समाज का खासा प्रभाव है। 14 लोकसभा सीटों पर राजभर समाज निर्णायक भूमिका निभाता है।अब ऐसे में भाजपा के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बहुत अहम हैं।
राजभर ने 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ा था,लेकिन राजभर का मन बीच में बदल गया और भाजपा से बगावत का बिगुल बजाते हुए अलग हो गए थे। राजभर ने 2022 का विधानसभा का चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ा था और 6 सीटों पर जीत दर्ज की है।
आपको बता दें कि राजभर समाज पूर्वांचल के कई जिलों में राजनीतिक समीकरण को बनाने और बिगाड़ने में भरपूर ताकत रखता है।ओपी राजभर का पूर्वांचल की राजनीति में दबदबा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जहां एक तरफ भाजपा पश्चिम यूपी से लेकर अवध तक मजबूत रही तो वहीं पूर्वांचल के चार जिलों में भाजपा अपना खाता तक नहीं खोल पाई।गाजीपुर, अम्बेडकरनगर, मऊ, बलिया, जौनपुर, आजमगढ़ में भाजपा को सबसे अधिक नुकसान हुआ।
भाजपा अभी से लोकसभा चुनाव को लेकर जुट गई है। भाजपा भी चाहती है कि ओपी राजभर भी उनके साथ आ जाएं।यूपी में राजभर समाज की आबादी लगभग 3 फीसदी है,लेकिन पूर्वांचल के जिलों में राजभर मतदाताओं की संख्या 12 से 22 फीसदी है। गाजीपुर, चंदौली, मऊ, बलिया, देवरिया, आजमगढ़, लालगंज, अंबेडकरनगर, मछलीशहर, जौनपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और भदोही में राजभर समाज की अच्छी खासी आबादी है।राजभर समाज का सूबे की लगभग चार दर्जन विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखता है और इसका असर 2022 के विधानसभा चुनाव में दिखा है।
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 2014 में मुख्तार अंसारी की कौमी एकता दल और दो-तीन अन्य छोटे दलों के साथ समझौता किया था और सुभासपा गठबंधन के प्रत्याशियों को 19 लोकसभा सीटों पर 25 हजार से 1.5 लाख के बीच वोट मिला था। सुभासपा ने 2009 के आम चुनाव में अकेले अपने दम पर अच्छे वोट हासिल किया था। सुभासपा को 2009 के लोकसभा चुनाव में चंदौली में 1.03 लाख वोट मिला,बलिया में 75 हजार वोट मिला, सलेमपुर में 65 हजार वोट मिला, घोसी में 75 हजार वोट मिला,वाराणसी में 40 हजार वोट मिला और बस्ती में लगभग 45 हजार वोट मिला था।
लगभग 15 वर्ष तक संघर्ष के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में ओपी राजभर को भाजपा जैसी बड़ी पार्टी से समझौता करने का मौका मिला था।भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पिछले चुनावों में राजभर को मिलने वाले वोटों की ताकत देखकर राजभर को साथ लेने की कूटनीतिक फैसला लेने पर मजूबर हुआ तो गलत नही होगा।
जुलाई 2016 में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के शाह अमित शाह ने मऊ के रेलवे मैदान में राजभर के साथ रैली कर साथ लेने का ऐलान करते हुए पूर्वांचल में बड़ा दाव खेला था और इसका असर भी हुआ। सुभासपा के चार विधायक जीते थे।इसके बाद भी राजभर अपनी पार्टी और कैडर को शांत नहीं बैठने दिया। राजभर राज्य मंत्रिमंडल में वाजिब हिस्सेदारी न मिलने से नाराज न केवल भाजपा को आड़े हाथों लेते रहे,बल्कि सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते रहे और एक साल के बाद भाजपा से अलग हो गए थे।
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