लखनऊ।उत्तर प्रदेश 2022 विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जहां शानदार सफलता मिली है तो वहीं कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार अपनी रणनीति के हिसाब से काम कर रहीं थीं,लेकिन प्रियंका की चुनावी रणनीति काम नहीं आई। विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद रणनीतिकारों की माने तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कोई बेस वोट बैंक न होने के कारण प्रियंका की रणनीति बैक फायर कर गई और जिसका परिणाम कांग्रेस को भुगतना पड़ा। उत्तर प्रदेश में जब तक कांग्रेस अपना बेस वोट नहीं तैयार करेगी तब तक उसका खड़ा होना काफी मुश्किल है।

उत्तर प्रदेश में चुनाव देश का सबसे बड़ा चुनाव होता है। 23 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में चुनाव लड़ना है तो आपके पास बेस वोट बैंक होना काफी जरूरी है। बिना बेस वोट बैंक के चुनाव लड़ना और जीतना एक तरह से असंभव है।यही हालत इस समय प्रदेश में कांग्रेस की है। एक समय था जब कांग्रेस के कोर वोटर हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ ही कांग्रेस कमजोर होती चली गई और उनका कोर वोटर दूसरी पार्टियों में शिफ्ट हो गया।

प्रियंका पश्चिम उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक कड़ी मेहनत करने में जुटी हुई हैं,लेकिन प्रियंका की सारी मेहनत पर पानी फिर जा रहा है,क्योंकि कांग्रेस के पास अपना कोर वोटर नहीं है। प्रियंका हर जिले में कांग्रेस को खड़ा करने में तो कामयाब हो रहीं हैं, लेकिन कांग्रेस अपने बेस वोटर पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रही है।जिसके कारण कांग्रेस को चुनाव दर चुनाव निराशा हाथ लग रही है।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में जहां एक तरफ कांग्रेस के पास बेस वोट बैंक का अभाव है,तो वहीं दूसरी तरफ भाजपा,सपा, बसपा के पास उनका अपना कोर वोटर है और जो हर हालात में पार्टी का साथ देता है। 2014 के लोक सभा चुनाव में बसपा को भले ही एक भी सीट नहीं मिली,लेकिन उस बुरे दौर में भी बसपा का कोर वोटर बसपा को छोड़कर नहीं गया।बसपा के पास जहां दलित के तौर पर एक बेस वोट बैंक है और बसपा इसके सहारे चुनाव में ताल ठोंकती है।उसी तरह सपा के साथ यादव वोट बैंक है।ये ऐसा बेस वोट है जिसमे सेंधमारी करना किसी के लिए भी आसान काम नहीं है। इसी तरह भाजपा ने गैर यादव ओबीसी, ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार, पटेल और निषाद के अलावा छोटी छोटी जातियों का वोट बैंक तैयार कर लिया है और विरोधियों से इस मामले में काफी आगे दिखाई देती है।यही भाजपा की सफलता की यूएसपी भी है।

उत्तर प्रदेश में एक समय था जब राम मंदिर आंदोलन या यूं कहें कि 90 के दशक में कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था। योगी सरकार ने 37 साल बाद जिस रिकॉर्ड को तोड़ा है वो कांग्रेस के ही नाम था। ये रिकॉर्ड उत्तर प्रदेश में एक ही पार्टी की बैक टू बैक सरकार बनाने का था। तब कांग्रेस के पास बेस वोट बैंक हुआ करता था और जिसका तोड़ निकालना विरोधियों के लिए आसान नहीं था। 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन से पहले ब्राह्मण, ठाकुर, मुस्लिम और दलित ये कांग्रेस का बेस वोट बैंक हुआ करते थे। मंदिर आंदोलन और मंडल कमंडल की राजनीति ने कांग्रेस का काफी नुकसान किया और ये सारे वोट बैंक खिसकते चले गए। इसके अलावा गठबंधन की राजनीति ने भी कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस का वोट बैंक एक बार खिसका तो अब तक जुड़ नही पाया है, जिसका खामियाजा कांग्रेस आज तक भुगत रही है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में यूं तो इस बार कांग्रेस के पास करने के लिए बहुत कुछ था,लेकिन कांग्रेस को वो परिणाम हासिल नहीं हुआ जैसी उसे आशा थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका को पश्चिम का प्रभार सौंपा गया था। प्रियंका ने इस दौरान सड़क पर उतरकर काम तो किया,लेकिन सारी कहानी बेस वोट बैंक पर ही आकर अटक गई।चुनाव के नतीजे आए और कांग्रेस सिर्फ रायबरेली सीट बचाने में सफल रही। इसके बाद प्रियंका को समय रहते ही उत्तर प्रदेश का प्रभार सौप दिया गया। प्रभार मिलने के बाद प्रियंका ने संगठन में कई तरह के बदलाव किए। प्रदेश अध्यक्ष तक बदला गया। यहां तक की चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने का बड़ा ऐलान किया। इसके आलावा भी कई लोक लुभावने वादे किए गए,लेकिन कोई भी वादा कांग्रेस की किस्मत चमकाने में सफल साबित नहीं हुआ। इसका कारण बेस वोट बैंक का न होना ही था। राजनीतिक पंडितों की माने तो सबसे पहले कांग्रेस को अपने बेस वोट बैंक पर फोकस करना होगा,क्योंकि बिना इसके यूपी में कांग्रेस की वापसी की कल्पना करना मुश्किल है।