नई दिल्ली: भारत सरकार खेती के साथ-साथ हरित ऊर्जा (Green Energy) उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाने जा रही है। इसके तहत देश में नई एग्रीवोल्टिक्स नीति (Agrivoltaics Policy) तैयार की जा रही है। इस नई व्यवस्था के लागू होने से देश के अन्नदाता किसान अपनी सामान्य कृषि भूमि पर पारंपरिक फसलें उगाने के साथ-साथ ऊंचे ढांचे पर लगाए गए सोलर पैनल के जरिए बिजली का उत्पादन भी कर सकेंगे। सरकार का मुख्य उद्देश्य किसानों की आय में इजाफा करना और सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए अलग से उपजाऊ भूमि की आवश्यकता को कम करना है। सरकार ने शुरुआती चरण में अगले कुछ वर्षों के भीतर 5 गीगावाट क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
क्या है एग्रीवोल्टिक्स और इससे किसानों को कैसे होगा फायदा?
एग्रीवोल्टिक्स एक ऐसी अभिनव प्रणाली है, जिसमें एक ही जमीन पर कृषि और सौर ऊर्जा उत्पादन (Solar Power Generation) दोनों कार्य एक साथ किए जाते हैं। इसके अंतर्गत खेतों में फसलों के ऊपर पर्याप्त ऊंचाई पर विशेष स्ट्रक्चर बनाकर सोलर पैनल स्थापित किए जाते हैं, जिससे नीचे आसानी से खेती की जा सके।
नई दिल्ली में आयोजित एग्रीवोल्टिक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2026 में केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बुधवार को बताया कि भारत की कुल 16 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से लगभग 30 प्रतिशत जमीन पर एग्रीवोल्टिक्स परियोजनाएं सफलतापूर्वक स्थापित की जा सकती हैं। इससे देश में सौर ऊर्जा उत्पादन को अभूतपूर्व गति मिलने की उम्मीद है।
मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत में लगभग 85 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। ऐसे किसान अपनी आजीविका के लिए खेती बंद करके अपनी जमीन सौर परियोजनाओं को नहीं सौंप सकते। ऐसे में एग्रीवोल्टिक्स उनके लिए वरदान साबित होगा, क्योंकि वे बिना खेती छोड़े बिजली उत्पादन के जरिए अतिरिक्त कमाई कर सकेंगे।
किन राज्यों में है सबसे ज्यादा संभावनाएं?
देश के कई राज्यों में एग्रीवोल्टिक्स की अपार संभावनाएं हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, छह प्रमुख राज्यों—महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश—में देश की कुल अनुमानित एग्रीवोल्टिक्स क्षमता का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है।
सामान्य तौर पर जमीन पर 1 मेगावाट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित करने के लिए करीब 4 एकड़ जमीन की आवश्यकता होती है, लेकिन एग्रीवोल्टिक्स तकनीक के माध्यम से एक ही जमीन के टुकड़े पर खेती और बिजली उत्पादन दोनों को एक साथ संभव बनाया जा सकता है।
लागत सबसे बड़ी चुनौती: क्या है समाधान?
इस योजना के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा इसकी शुरुआती लागत (Initial Cost) है। खेतों में फसलों के ऊपर ऊंचे और मजबूत ढांचे पर सोलर पैनल लगाने के कारण इसकी स्थापना लागत पारंपरिक सोलर परियोजनाओं की तुलना में 25 से 30 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के अनुसार:
- ऊंचे ढांचे पर लगे सोलर पैनल से बिजली उत्पादन की लागत लगभग 3.20 रुपये प्रति यूनिट आती है।
- वहीं, जमीन पर लगाए जाने वाले सामान्य सोलर पैनल से बिजली बनाने की लागत करीब 2.60 रुपये प्रति यूनिट है।
सरकार और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य इसी लागत के अंतर को पाटना है, ताकि यह तकनीक किसानों और ऊर्जा विकास कंपनियों दोनों के लिए आर्थिक रूप से पूरी तरह फायदेमंद साबित हो सके।
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अगले कुछ वर्षों में 5 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने जानकारी दी है कि एग्रीवोल्टिक्स को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए नीति का ड्राफ्ट लगभग तैयार है, जिसे जनता और विभिन्न राज्यों के सुझावों के लिए सार्वजनिक किया जाएगा। सभी पक्षों से मिलने वाले सुझावों के आधार पर इसमें आवश्यक संशोधन किए जाएंगे।
सरकार शुरुआती तौर पर अगले कुछ वर्षों में 5 गीगावाट क्षमता विकसित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके अतिरिक्त, प्रस्तावित पीएम-कुसुम 2.0 योजना में भी फसलों के साथ सोलर पैनल लगाने को प्रोत्साहित करने के लिए 10 गीगावाट क्षमता का एक अलग प्रावधान शामिल किए जाने की प्रबल संभावना है।
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