जमशेदपुर।देश के चर्चित चारा घोटाले के जिस मामले में मंगलवार को सीबीआई के जज एसके शशि द्वारा फैसला सुनाया जाना है।उस मामले के कोर्ट तक पहुंचने की कहानी काफी फिल्मी है।जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय इस पूरे केस के सर्वप्रथम व्हिसल ब्लोवर थे।विवेकानंद झा द्वारा सरयू राय के जीवन पर लिखी गई किताब दी पीपुल्स लीडर में इस पूरे केस के कोर्ट तक पहुंचने के नाटकीय घटनाक्रम का विस्तार से उल्लेख किया गया है।

किताब दी पीपुल्स लीडर के नौवें अध्याय में इस पूरे प्रकरण की जानकारी देते हुए विवेकानंद झा लिखते हैं कि चारा घोटाले के पूरे प्रकरण को कोर्ट तक पहुंचने से रोकने के लिए उस समय कई तिकड़म भिड़ाए गए। यहां तक कि चारा घोटाले का खुलासा करने को लेकर सरयू राय के द्वारा जारी प्रेस विज्ञाप्तियों तक को अखबार के दफ्तरों तक पहुंचने से पहले पशुपालन विभाग के अफसरों ने गायब करवा दिया। इतना ही नहीं, कई जतन करने के बाद जब पटना हाईकोर्ट में मामले में पीआईएल दाखिल की गई तो उस केस को कमजोर करने के लिए पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन रांची बेंच में भी किसी शर्मा ने पीआईएल दाखिल कर दी।दिलचस्प ये है कि पटना हाईकोर्ट में सरयू और उनकी टीम ने जो पीआईएल की थी, उसकी सुनवाई 17 फरवरी 1996 को तय हुई, जबिक रांची बेंच की सुनवाई 11 फरवरी 1996 को।

सरयू राय समझ गए कि रांची बेंच में पीआईएल दाखिल करने वाले ने सिर्फ इसलिए याचिका दायर की है, ताकि वह बिना किसी दस्तावेज के कोर्ट में जाकर पीआईएल को खारिज करवा दें। ऐसे होते ही 17 फरवरी को पटना हाईकोर्ट में जो सुनवाई होनी है, जिसमें सरयू राय पूरे दस्तावेज जमा करने वाले थे,वह खारिज हो जाए। इसपर सरयू ने तुरंत फैसला लिया कि वे भी रांची बेंच में पीआईएल करेंगे, ताकि वहां भी साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें। हालांकि अंतत: हुआ यह कि पटना हाईकोर्ट और रांची बेंच में आए मामलों को कोर्ट ने तलब कर दिया, जिससे मामला आगे बढ़ पाया।

दी पीपल्स लीडर किताब में विवेकानंद झा लिखते हैं कि चारा घोटाले सबसे पहले तब उजागर हुआ था।जब सरयू राय को ये सूचना मिली कि 1995 में बिहार विधानसभा में जो कैग की रिपोर्ट शीत सत्र में रखी गई, जिसमें लालू प्रसाद यादव सरकार द्वारा पशुपालन विभाग में बड़ी-बड़ी रकम की निकासी के एवज में अकाउंट वाउचर जमा नहीं किए गए। वह भी एक साल नहीं, बल्कि लगातार तीन वित्त वर्षों के। सदन में कैग की यह रिपोर्ट पड़ी रही, लेकिन सरकार ने इसपर चर्चा नहीं की।

सरयू राय तब बिहार भाजपा के महासचिव हुआ करते थे। उन्होंने इससे संबंधित दस्तावेज लिए और वे सीधे रविशंकर प्रसाद के पास इसपर पीआईएल दाखिल करने के लिए कानूनी सलाह लेने पहुंचे। उस समय के बड़े वकील रहे रविशंकर प्रसाद के पिता ठाकुर प्रसाद को भी फाइल दिखाई गई, लेकिन उन्होंने कानूनी पक्ष का हवाला दे बताया कि पीआईएल दाखिल नहीं हो सकती। हाईकोर्ट इसे स्वीकार नहीं करेगा। इसपर सरयू नहीं माने और उन्होंने तत्कालीन फाइनेंस कमिश्नर वीसी दुबे को पत्र लिख इसकी शिकायत कर दी। 10 जनवरी को वीसी दुबे ने सभी जिला उपायुक्तों को पत्र लिखकर आरोपों की जांच करने को कहा। इसके बाद यह खबर बाहर आई और एक अंग्रेजी अखबार ने इसकी खबर प्रकाशित की। इस खबर को भी लालू यादव ने हल्के में लिया और दिल्ली चले गए। लेकिन दूसरे दिन यह खबर हिंदी समाचारपत्रों में बड़ी-बड़ी छपी, जिसके बाद मामला हाईप्रोफाइल हो गया।