नई दिल्ली:
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली और निर्वाचन आयोग (ECI) में कथित तौर पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने या उनके काम करने पर फिलहाल कोई भी अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
कोर्ट का रुख: "सर्वसम्मति नहीं हुई तो रद्द होंगे फैसले"
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट संकेत दिया कि आयोग का पक्ष सामने आने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि जांच और रिकॉर्ड में यह साबित होता है कि आवश्यक सर्वसम्मति के बिना फैसले लिए गए थे, तो अदालत उन्हें वापस लेने या रद्द करने पर विचार कर सकती है।
पीठ ने टिप्पणी की: "नोटिस के बाद यदि यह दिखाया जाता है कि कोई फैसला बिना सर्वसम्मति के लिया गया था, तो हम उन फैसलों को वापस ले लेंगे।"
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याचिकाकर्ताओं के मुख्य आरोप और मांगें
यह याचिका राकेश कुमार सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई है। याचिका में 2023 के चुनाव आयोग कानून की धारा 18 का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए गए हैं:
- एकतरफा फैसला लेने का आरोप: सीईसी ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने निर्वाचन आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति और सामूहिक व्यवस्था का पालन किए बिना कई फैसले व्यक्तिगत रूप से लिए।
- सॉफ्टवेयर और फॉर्म-6 में बदलाव: मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में पूर्वजों की जानकारी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े लिंक जैसी शर्तें बिना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के सॉफ्टवेयर में जोड़ी गईं।
- गोवा व पश्चिम बंगाल के मामले: गोवा में 97 पात्र मतदाताओं को बहाल करने के निर्देश के बावजूद सॉफ्टवेयर में इसकी सुविधा न होने और पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख से अधिक लंबित अपीलों का मुद्दा उठाया गया।
- अधिकारियों पर आपराधिक कार्यवाही की मांग: याचिकाओं में मांग की गई है कि अंतिम फैसला आने तक सीईसी के काम पर रोक लगाई जाए और कर्तव्य उल्लंघन को लेकर आपराधिक कार्यवाही शुरू की जाए।
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चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया
मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया था कि पिछले 10 महीनों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई थी।
इसके जवाब में चुनाव आयोग का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व संवैधानिक संस्था में विचारों और टिप्पणियों में भिन्नता होना एक सामान्य प्रक्रिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि उसके द्वारा जारी किए गए सभी आदेश और फैसले कानूनी रूप से पूरी तरह वैध हैं।
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Purnima Kumari



