गाजियाबाद।देश में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो कभी खेल में नामी हुआ करते थे,लेकिन अब गुमनामी का जीवन जीने के लिए मजबूर हैं।ऐसे ही गाजियाबाद के दिव्यांग खिलाड़ी रहे राजा बाबू हैं।एक समय ऐसा था जब वो व्हीलचेयर से ही महेंद्र सिंह धोनी की तरह हेलीकॉप्टर शॉट लगाते थे।राजा बाबू के पास गेंदबाज के हर सावल के जवाब रहता था।गेंदबाज राजा बाबू के नाम से खौफ खाते थे। 2017 में राष्ट्रीय स्तर पर खेले गए हौसलों की उड़ान मैच में 20 बॉल में 67 रन की तूफानी पारी खेलकर राजा बाबू ने दिल्ली की टीम को हराया था।राजा बाबू ने क‌ई स्टेट अवार्ड जीते हैं।एक स्थानीय व्यापारी ने राजा बाबू की आक्रामक बल्लेबाजी से खुश होकर उन्हें यह ई-रिक्शा भेंट किया। तब राजा बाबू ने सोचा भी नहीं होगा कि यह ई-रिक्शा एक दिन काम आएगा। किस्मत ने जिंदगी के पिच पर बाउंसर फेंका तो राजा बाबू जिंदगी से जूझने पर मजबूर हो गए।





वर्ष 2020 राजा बाबू के लिए मुसीबत लेकर आया जब उत्तर प्रदेश में विकलांग क्रिकेटरों के लिए एक धर्मार्थ संगठन का भंडाफोड़ किया गया। तब इस विकलांग क्रिकेटर को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।मैदान में गेंदबाजों के छक्के छुड़ा देने वाले बल्लेबाज राजा बाबू मूलरूप से जालौन जिले के रहने वाले हैं।अब गाजियाबाद की सड़कों पर ई-रिक्शा चलाने के लिए मजबूर हैं।राजा बाबू का कहना है कि उन्हें मेडल, इज्जत शोहरत खूब मिला,लेकिन इससे घर नहीं चलता।घर चलाने के लिए पैसों की जरुरत होती है। जिस कारण से वो रिक्शा चलाने पर मजबूर हैं।





12 साल की उम्र में पकड़ लिया था क्रिकेट का बल्ला





राजा बाबू बताते है कि 12 साल की उम्र में वो क्रिकेट का बल्ला हाथों में ले लिए थे।वर्ष 2000 में उन्होंने कानपुर के आरामीना ग्राउंड पर ट्रेनिंग शुरू की थी। उन्होंने बताया कि जिसके बाद देखते ही देखते वे विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगे। 23 साल की उम्र में उन्होंने जिला स्तर के टूर्नामेंट में नाम रोशन करना शुरू कर दिया था।साल 2015 में आयोजित उत्तराखंड दिव्यांग क्रिकेट टूर्नामेंट में राजा बाबू को बेस्ट प्लेयर का अवार्ड भी मिला था।जिसके अगले साल राजा बाबू ने यूपी टीम की कप्तानी संभाली थी।





क्यों चलाना पड़ रहा है रिक्शा





राजा बाबू कहते हैं कि प्रोफेशनल क्रिकेट और दिव्यांग क्रिकेट में काफी अंतर है।प्रोफेशनल क्रिकेट की तरह दिव्यांग क्रिकेट में आपको इतना पैसा नहीं मिलता है।क्रिकेट खेलने के दौरान जो मेडल मिले और जो इज्जत मिली उनसे घर नहीं चल सकता।उन्होंने कहा कि वो 2022 में मध्यप्रदेश के लिए व्हीलचेयर क्रिकेट खेलना शुरू किए थे,लेकिन महामारी के कारण कुछ ही मैच हो पाए और बात नहीं बन पाई।लॉकडाउन के वक्त मेरी जेब में कुल 3000 रुपये बचे हुए थे।उनसे भला कैसे गुजारा होता। घर का किराया चुकाने के पैसे नहीं थे। इसीलिए घर भी बदलना पड़ गया।





एक हादसे ने बदल दी जिंदगी





राजा बाबू जन्मजात दिव्यांग नहीं है।उनके जीवन में एक ऐसा हादसा हुआ जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। 1997 में जब राजा बाबू की उम्र केवल 7 साल की थी।तब एक दिन राजा बाबू स्कूल से घर की तरफ लौट रहे थे।तभी वो ट्रेन की चपेट में आ गए।जिससे उनको अपना बांया पैर गंवाना पड़ा,लेकिन अपनी दिव्यांगता को उन्होंने खुद पर कभी हावी नहीं होने दिया।उन्होंने अपनी कमजोरी को ही ताकत बनाया और क्रिकेट में प्रसिद्धि पाई।





बेटे को टीम इंडिया की जर्सी पहनाने का सपना





राजा बाबू का 4 लोगों का परिवार है।जिसमें उनकी पत्नी निधि,एक 7 साल के बेटा कृष्णा,एक 4 साल की बेटी शानवी हैं।राजा बाबू का बेटा कृष्णा भी क्रिकेट खेलता है।राजा बाबू का कहना है कि मैं अपनी जर्सी पर तो टीम इंडिया का लोगो नहीं लगवा पाया,लेकिन मैं अपने बेटे को टीम इंडिया के लिए खेलता हुए देखना चाहता हूं।इसके लिए मैं घर पर ही उसकी प्रैक्टिस करवाता हूं।उन्होंने कहा कि मैं अपने बेटे को अच्छे कोचिंग सेंटर में भेजना चाहता हूं,लेकिन अभी मेरे पास इतने पैसे नहीं है कि मैं उसे किसी अच्छे कोचिंग सेंटर में भेज सकूं, इसलिए घर में प्रैक्टिस करवाता हूं।