नई दिल्ली:
देश में तेजी से बढ़ रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) और साइबर ठगी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने बुजुर्गों और सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) लोगों की जिंदगीभर की कमाई लूटने वाले अपराधियों को 'डिजिटल डकैती' करार दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि ऐसे क्रूर अपराधियों से बहुत ही सख्ती से निपटा जाना चाहिए और कानून में गुंजाइश होने पर उन्हें मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले ही सजा देने या जमानत पर पूरी तरह रोक लगाने जैसे कदमों पर विचार होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और मुख्य टिप्पणियां
28 अक्टूबर 2026 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ (जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना भी शामिल थे) ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान ये तीखी टिप्पणियां कीं:
- ट्रायल से पहले सजा और बेल पर रोक: सीजेआई ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कानून में कोई गुंजाइश या प्रावधान है, तो ऐसे अपराधियों को ट्रायल पूरा होने से पहले सजा दी जानी चाहिए और मौका मिलने पर इन्हें किसी भी अदालत से जमानत मिलने पर रोक लगाने के कदम उठाए जाने चाहिए।
- म्यूल अकाउंट्स (Mule Accounts) पर प्रहार: अदालत ने उन मामलों पर भी नाराजगी जताई जहां ठगी की रकम को फर्जी या दूसरे लोगों के बैंक खातों (म्यूल अकाउंट्स) में ट्रांसफर किया जाता है। एक मामले में केरल के 81 वर्षीय बुजुर्ग से 1.90 करोड़ रुपये ठगे जाने का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों और जांच एजेंसियों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
- मामलों को एक जगह जोड़ने की याचिका खारिज: दो ऐसे आरोपियों की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया गया जिनके खिलाफ 12 राज्यों में 35 साइबर क्राइम के मामले दर्ज थे और वे सभी मामलों को एक जगह समेकित (Consolidate) कराना चाहते थे।
देश में डिजिटल अरेस्ट के आंकड़े: चिंताजनक स्थिति
सरकारी और रिपोर्ट किए गए आंकड़े बताते हैं कि किस तरह यह साइबर अपराध महामारी की तरह फैल रहा है:
- वर्ष 2026 (जनवरी से अगस्त): देशभर में डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी 21,900 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें कुल 647 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी की गई।
- वर्ष 2025: इस साल कुल 58,239 शिकायतें दर्ज की गईं और लगभग 1,211 करोड़ रुपये की ठगी हुई।
- वर्ष 2024: इस साल सबसे ज्यादा 1,23,672 शिकायतें और करीब 1,935 करोड़ रुपये की ठगी दर्ज की गई थी।
बैंकिंग सिस्टम और KYC में कमियों पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने केवल ठगों पर ही नहीं, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था की खामियों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं:
- केवाईसी (KYC) में ढिलाई: बैंक खाते खोलते समय पहचान की जांच कितनी प्रभावी है?
- संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर रोक: अचानक या बड़े पैमाने पर होने वाले लेन-देन को बैंक तुरंत क्यों नहीं रोकते?
- अलर्ट सिस्टम की कमी: असामान्य गतिविधियों पर पुलिस या संबंधित अधिकारियों को तुरंत सूचित क्यों नहीं किया जाता?
- मुआवजे की जवाबदेही: यदि बैंकों की लापरवाही या कमजोर प्रणाली के कारण किसी के साथ ठगी होती है, तो पीड़ित की रकम वापस दिलाने की जिम्मेदारी किसकी होगी?
अकोर्ट ने आरबीआई (RBI) के प्रस्तावित केवाईसी संशोधनों की जांच करने और बैंक की लापरवाही साबित होने पर पीड़ितों को मुआवजा देने के प्रावधानों पर भी जोर दिया है।
डिजिटल अरेस्ट क्या है और इससे कैसे बचें?
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक ऐसा शातिर तरीका है जिसमें ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, जज या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं। वे वीडियो कॉल पर पीड़ितों को डराते हैं, उन पर फर्जी मामलों या मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने का झूठा आरोप लगाते हैं और गिरफ्तारी का भय दिखाकर घंटों तक स्क्रीन के सामने बंधक (डिजिटल अरेस्ट) बनाए रखते हैं।
बचाव के लिए जरूरी सावधानियां:
- कॉल पर डरें नहीं: कोई भी असली जांच एजेंसी या पुलिस वीडियो कॉल पर कभी भी गिरफ्तारी या पैसे ट्रांसफर करने की मांग नहीं करती।
- व्यक्तिगत जानकारी साझा न करें: अपना बैंक विवरण, आधार नंबर, पासवर्ड या ओटीपी किसी के साथ साझा न करें।
- तत्काल शिकायत करें: यदि आपके साथ या किसी परिचित के साथ ऐसा फ्रॉड होता है, तो बिना देर किए तुरंत साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (
cybercrime.gov.in) पर शिकायत दर्ज कराएं।
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