रांची।झारखंड में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है।नेताओं की बयानबाजी तेज हो गई है।भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष बाबू लाल मरांडी,पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन हेमंत सोरेन सरकार पर हमलावर हैं।वहीं दूसरी तरफ सीएम हेमंत सोरेन अलग रणनीति अपनाते हुए मरांडी, मुंडा और चंपई की जगह असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को निशाने पर ले रहे हैं। बता दें कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत झारखंड में भाजपा की तरफ से चुनाव के सह प्रभारी हैं।
मरांडी-चंपई से ज्यादा हिमंत पर निशाना
झारखंड में बाबू लाल मरांडी,अर्जुन मुंडा और चंपई सोरेन भाजपा के बड़े नेता हैं।अमर कुमार बाउरी भी नेता प्रतिपक्ष हैं, लेकिन हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी की रडार पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हैं।पिछले महीने जब हिमंत झारखंड दौरे पर लगातार आने लगे तो हेमंत ने उन्हें बाहरी बताते हुए भाजपा की घेराबंदी शुरू की।हेमंत लगातार अपनी रैली में हिमंत के लिए बाहरी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।
हेमंत की सरकार ने हिमंत के सुरक्षा में खर्च होने वाले पैसे का भी जिक्र किया था।सरकार का कहना था कि हिमंत संवेदनशील राज्य असम के मुख्यमंत्री हैं और उनके बार-बार झारखंड आने से प्रोटोकॉल लागू करना पड़ता है, जिसमें पैसे खर्च होते हैं।हेमंत सोरेन हिमंत को सियासी तौर पर भी घेर रहे हैं। 2 दिन पहले हेमंत ने असम के मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा था।इसमें हेमंत ने कहा था कि चाय बागान में काम करने वाले टी-ट्राइब को आदिवासियों का दर्जा दिया जाए। असम में इन समुदाय को ओबीसी का दर्जा प्राप्त है।
हेमंत के रडार पर हिमंत क्यों, 3 प्वॉइंट्स
1. हिमंत मुखर उन्हें बैकफुट पर धकेलने की कोशिश
भाजपा ने लोकसभा चुनाव के बाद शिवराज सिंह चौहान को झारखंड चुनाव का प्रभारी और हिमंत बिस्वा सरमा को सह प्रभारी नियुक्त किया था।हिमंत इसके बाद से ही झारखंड में एक्टिव हैं।हिमंत हर डिविजन के लिए अलग-अलग प्लान तैयार कर रहे हैं।संथाल में हिमंत ने डेमोग्राफी को बड़ा मुद्दा बनाया है।इसी तरह कोल्हान में जेएमएम के भीतर ही सेंध लगा दिया।हिमंत लगातार नाराज नेताओं को भी साध रहे हैं।ऐसे में हेमंत पर सीधे हिमंत की घेराबंदी कर उन्हें बैकफुट पर धकेलाना चाहते हैं।
2. स्थानीय बनाम बाहरी मुद्दे को हवा देने की कोशिश
झारखंड में शुरुआत से ही स्थानीय बनाम बाहरी एक बड़ा मुद्दा रहा है। झारखंड में स्थानीय नीति की भी मांग लंबे समय से हो रही है।हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी हिमंत के जरिए भाजपा सांसद को बाहरी बताने में जुटी है।हेमंत इसलिए अपनी हर रैली में हिमंत को बाहरी बता रहे हैं। हेमंत हिमंत के जरिए झारखंड को लोगों को गोलबंद करना चाहते हैं। 2019 में इसी गोलबंदी के सहारे हेमंत ने भाजपा की मजबूत सरकार को उखाड़ दिया था।वहीं इसके बहाने हेमंत आदिवासी को भी साध रहे हैं।हेमंत ने हाल ही में जो पत्र लिखा है, उसमें उन्होंने संथाल, ओरांव और मुंडा समेत आदिवासियों के 4 समुदाय को असम में आरक्षण देने की मांग की है।हेमंत इस बहाने झारखंड के 25 प्रतिशत आदिवासियों को अपने पक्ष में करना चाह रहे हैं।
3. बीजेपी के स्थानीय नेताओं को कमजोर बताने की
रणनीति- सीएसडीएस के मुताबिक 2019 के विधानसभा चुनाव में झारखंड के 21 प्रतिशत लोग ने हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे।हेमंत मुख्यमंत्री बने भी। कहा जा रहा है कि इस साल की शुरुआत में जिस तरह से हेमंत जेल गए, उसने उनकी लोकप्रियता और बढ़ा दी है।
झामुमो अब पूरे चुनाव को हेमंत वर्सेज कौन में बदलना चाहती है। भाजपा में वर्तमान में मुख्यमंत्री चेहरा को लेकर खींचातनी मची हुई है।इस पद पर बाबू लाल मरांडी और चंपई सोरेन की मजबूत दावेदारी है।
इस साल के अंत में 81 सीटों के लिए चुनाव
झारखंड में इस साल के अंत में विधानसभा की 81 सीटों पर चुनाव होना है।हाल ही में चुनाव आयोग ने तैयारियों की समीक्षा की है। झारखंड में मुख्य मुकाबला झामुमो और भाजपा गठबंधन के बीच है।झारखंड में सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 42 सीटों पर जीतना जरूरी है। 24 साल पहले गठित झारखंड में अब तक झामुमो के 3 और भाजपा के 3 मुख्यमंत्री बने हैं।





