लखनऊ
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। राज्य की सत्ता की कुंजी मानी जाने वाली 403 विधानसभा सीटों में से 86 आरक्षित सीटें (84 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति) इस बार निर्णायक भूमिका में नजर आ रही हैं। लगभग 20 प्रतिशत (एक-पांचवां हिस्सा) सीटों का यह बड़ा आंकड़ा ही वजह है कि समाजवादी पार्टी (SP) से लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) तक, सभी प्रमुख दल दलित वोट बैंक में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
अखिलेश यादव का बड़ा दांव: PDA के जरिए दलितों को साधने की कोशिश
2024 के लोकसभा नतीजों के बाद उत्साहित समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने दलित समुदाय के बीच अपनी सक्रियता काफी बढ़ा दी है।
- दलित नेताओं की सक्रियता: अखिलेश लगातार दलित नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ रणनीतिक बैठकें कर रहे हैं और उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में जमीनी पकड़ मजबूत करने का निर्देश दे चुके हैं।
- 105 दलित-आदिवासी चेहरों पर दांव: सपा की रणनीति केवल आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है। पार्टी योजना बना रही है कि कम से कम 100 SC और 5 ST उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा जाए, यानी सामान्य (General) सीटों पर भी दलित चेहरों को मौका देकर सामाजिक संदेश देने की तैयारी है।
- PDA समीकरण का विस्तार: सपा का मुख्य फोकस दलित वोटों को अपने व्यापक PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सामाजिक ताने-बाने से जोड़ना है।
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2024 के नतीजे: बराबरी के मुकाबले ने बदला सियासी गणित
2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 17 आरक्षित संसदीय सीटों के नतीजों ने आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों के लिए नए समीकरण के संकेत दिए हैं:
- BJP को 8 सीटें मिलीं।
- सपा को 7 सीटें, कांग्रेस को 1 और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) को 1 सीट पर जीत हासिल हुई।
विपक्षी दलों के इस प्रदर्शन ने साबित किया कि आरक्षित सीटों पर मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा, जिसके दम पर सपा 2027 में बड़े फेरबदल की उम्मीद लगा रही है।
आरक्षित सीटों का इतिहास: BJP का मजबूत आधार vs सपा का उभार
हालांकि, यदि विधानसभा चुनाव के इतिहास को देखें तो भाजपा का इन सीटों पर दबदबा रहा है:
- 2017 विधानसभा चुनाव: भाजपा ने प्रचंड प्रदर्शन करते हुए 86 आरक्षित सीटों में से करीब 70 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
- 2022 विधानसभा चुनाव: भाजपा और उसके सहयोगियों का दबदबा बरकरार रहा और उन्होंने 65 सीटों पर कब्जा जमाया। हालांकि, सपा ने भी बढ़त बनाते हुए 20 आरक्षित सीटें हासिल कीं (और सहयोगियों को 7 सीटें मिलीं)।
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BJP की काट और बसपा की भूमिका
- भाजपा का काउंटर प्लान: 2024 के लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीटों पर हुए मामूली नुकसान के बाद भाजपा ने संगठन स्तर पर पुनर्गठन शुरू कर दिया है। पार्टी का जोर दलित समाज की अलग-अलग उप-जातियों तक सीधे कल्याणकारी योजनाओं और संगठनात्मक भागीदारी के माध्यम से पहुंचने का है।
- BSP का प्रभाव: यद्यपि बहुजन समाज पार्टी (BSP) 2024 के चुनाव में कोई सीट नहीं जीत सकी, लेकिन राज्य के काडर आधारित दलित मतदाताओं के बीच उसका प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। बसपा का प्रदर्शन यह तय करेगा कि दलित वोट बैंक का कितना हिस्सा त्रिकोणीय या द्विध्रुवीय मुकाबले में बंटता है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए जादूई आंकड़ा 202 सीटों का है। ऐसे में 86 आरक्षित सीटें किसी भी दल का खेल बनाने या बिगाड़ने का माद्दा रखती हैं। 2027 का संग्राम केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि इस बात पर भी टिका होगा कि उत्तर प्रदेश का दलित मतदाता किस नेता के दावों और सामाजिक समीकरण पर अपना भरोसा जताता है।





