हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार शक्ति की उपासना से समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।देव और दानवों दोनों ने शक्ति की उपासना करके ही समस्त सिद्धियां और शक्तियां प्राप्त की थी।शक्ति अजर, अमर और अविनाशी है।सर्वप्रथम हम सबों को यह जानना चाहिए कि शक्ति क्या है, हम सब शक्ति की उपासना क्यों करते हैं,क्या शक्ति ही सब कुछ है।इस तरह के कई प्रश्न मन में उठते रहते है। हमारे मनीषियों ने इसकी व्याख्या बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से हमारे धर्म शास्त्रों में प्रस्तुत किया है।शक्ति अर्थात ऊर्जा।विभिन्न धर्म ग्रंथो में शक्ति को विभिन्न नामों से जाना जाता है,लेकिन सभी का मतलब एक ही है। एक परम शक्ति। शक्ति के बिना शिव भी शव के समान हो जाते हैं। अर्थात शक्ति ही परम सत्ता की अधिष्ठात्री हैं।
हमारे मनीषियों ने आगे व्याख्या किया है कि मनुष्य के अंदर निहित शक्ति ही उसकी प्राण चेतन होती है।जब यह प्राण चेतना शरीर से निकल जाती है तब मनुष्य निर्जीव बन जाता है। इसी प्राण चेतना को समझने की जरूरत है।इसी प्राण चेतन को शक्ति कहते हैं। इस प्राण चेतना शक्ति की उपासना ही सच्चे अर्थों में शक्ति की उपासना है।भौतिक संसार में जितनी भी चीजें चलायमान हैं ,सब में कहीं ना कहीं ऊर्जा निहित है। यह ऊर्जा भी शक्ति की ही रूप है।इस ऊर्जा को जानने के लिए विश्व भर के वैज्ञानिक शोध पर शोध करते चले जा रहे हैं। संसार में कितने किट और पतंग हैं, जो मौसम परिवर्तन के साथ जन्म लेते हैं और अल्पायु में ही मर जाते हैं। कीट पतंगों में भी वही प्राण चेतन निहित होती है जो एक हाथी में होती है।मौसम परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाले जीव की उत्पत्ति पर हमारे वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं,लेकिन अभी तक इस उत्पत्ति के रहस्य पर पर्दा हटा नहीं पाए हैं ।
शक्ति को विविध रूपों से रूपांतरित हैं किंतु शक्ति एक ही है। हमारे मनीषियों ने स्वीकार किया है कि शक्ति के बिना इस सृष्टि की कल्पना तक नहीं की जा सकती है।पृथ्वी एक ग्रह है। वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया पृथ्वी एक ग्रह के समान इस ब्रह्मांड में लटक रहा है। अब सवाल यह उठता है कि इतनी भारी भरकम पृथ्वी इस ब्रह्मांड में बीते अनंत काल से कैसे बिना सहारे के लटक रहा है,पृथ्वी अपनी एक ही गति से सूर्य की परिक्रमा कर रहा है।यह सब शक्ति के ही विविध रूप हैं । अगर शक्ति को पृथ्वी से अलग कर दिया जाए तब पल भर में ही पृथ्वी नष्ट हो जाएगी।इसी तरह ब्रह्मांड में असंख्य ग्रह है जो शक्ति की ही विविध रूप हैं।
शक्ति की उपासना हर युग में होती चली आ रही है। रामचरितमानस में संत तुलसीदास ने भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा की गई शक्ति की आराधना का विस्तार से वर्णन किया है। माता की कृपा प्राप्त कर ही भगवान राम ने रावण जैसे शक्तिशाली दानव का नाश किया था। यहां विचारणीय यह है कि राम के पास निहित शक्ति, शक्ति की कृपा से ही प्राप्त हुई थी।वहीं दूसरी ओर परम ज्ञानी अहंकारी रावण ने शिव की उपासना कर शक्ति अर्जित की थी। शिव भी शक्ति की ही एक रूप हैं। इसलिए शिव को अर्धनारीश्वर भी कहा जाता है।परम ज्ञानी परम तपस्वी रावण को प्राप्त शक्ति और राम की शक्ति में बड़ा अंतर है। इस अंतर को समझने की जरूरत है।राम की शक्ति राम की जीवन काल में जिस रूप में दिखाई पड़ रही थी।राम के इस धारा से जाने के बाद भी उनकी शक्ति उसी रूप में दिखाई पड़ रही है।इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि राम की शक्ति सकारात्मकता से ओतप्रोत थी। राम ने यह शक्ति एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए ली थी। वहीं दूसरी ओर रावण की शक्ति नकारात्मकता की से ओतप्रोत थी।रावण ने शक्ति की उपासना कर शक्ति जो अर्जित की थी, उसका प्रयोग उसने नकारात्मकता की ओर किया था, फलत: शक्ति ने ही उसका सर्वनाश कर दिया।राम और रावण दोनों की शक्तियां, शक्ति होकर भी अलग-अलग रुपों में बंटी हुई थीं।
शारदीय नवरात्र में माता दुर्गा की उपासना भी इसी उद्देश्य से की जाती है कि मां की शक्ति उन्हें प्राप्त हो।भक्तों को मां की भक्ति से धन, बल, वैभव और दीर्घायु होने की शक्ति प्राप्त होती है। घर में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहे।इस निमित्त मां दुर्गा की कृपा उन पर बनी रहे।धन की देवी लक्ष्मी होती है। अर्थात लक्ष्मी की कृपा उनके परिवार बनी रहे। यहां धन शक्ति की ही एक रूप है।धन के सदुपयोग से ही इस शक्ति को साधा जा सकता है। धन के दुरुपयोग से मनुष्य कंगाल तक बन जाता है।इसी तरह बल की शक्ति भी मां की कृपा से ही प्राप्त होती है। मां की कृपा से प्राप्त बल का प्रयोग प्राणियों की रक्षा में होनी चाहिए। दीर्घायु होने का वरदान मां ही देती। लंबी उम्र की सिद्धि भी शक्ति का ही एक रूप है। इस सिद्धि को प्राप्त कर हजारों हजार वर्षो तक हमारे मनीषी तप में रत रहे थे।
दुनिया में जितनी भी सिद्धियां व शक्तियां देखने को मिलती हैं। वह सभी मां की ही कृपा से प्राप्त होती हैं।हमने अपनी बात शुरूआत शक्ति क्या है से की थी। देवी पुराण में वर्णन है कि शक्ति अपनी शक्ति से अपने आकार को परमाणु से भी और लघु बना देती है।जिसे अत्यधिक वैज्ञानिक उपकरणों से भी नहीं देखा जा सकता।वहीं शक्ति अपने को इतना विस्तृत बना देती है।उसके रूप का आकर लंबाई व चौड़ाई पता ही नहीं चलता है।हमारे विश्व भर के वैज्ञानिक ब्रह्मांड की खोज में लगे हुए हैं।जब तक एक ग्रह की गुत्थी कुछ सुलझ पाती है, तब तक उससे भी कई बड़े ग्रह इस ब्रह्मांड में होने के संकेत प्राप्त होते हैं।आकाश गंगा सहित कई ऐसे ग्रह इस ब्रह्मांड में मौजूद हैं, जिसकी दूरी आज तक नापी नहीं गई है। इससे पता चलता है कि शक्ति का आकार कितना विशाल है।शक्ति पूरे ब्रह्मांड को शून्य में परिवर्तित कर सकती है।शून्य से इसका विस्तार इतना विस्तृत हो जाता है कि उसे नापा नहीं जा सकता है। मनुष्य के अंदर विद्यमान प्राण चेतना ही उसकी जीवनी शक्ति होती है।मनुष्य कितना भी बलशाली क्यों ना हो,कितना भी प्रतिभाशाली क्यों ना हो,कितना भी धनवान क्यों ना हो, अगर उसके शरीर से प्राण चेतना निकल जाती है तो सारे बल और धन धारे के धरे रह जाते हैं।इसलिए मूल्यवान कौन है,प्राण चेतना।प्राण चेतना के बिना यह शरीर शव के सामान बन जाता है।इसलिए महत्वपूर्ण प्राण चेतना है।इस प्राण चेतना के कारण ही हम बोल सकते हैं,देख सकते हैं,लिख सकते हैं,समझ सकते हैं। प्राण चेतना के बिना हमारे जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। यह शक्ति हमें शक्ति से ही प्राप्त होती है।यह प्राण चेतना ही वास्तविक शक्ति का ही एक रूप है।यह हर जीवधारी के लिए बहुत ही गौरव की बात है कि उसके शरीर में जीवनी शक्ति के रूप में स्वयं माता विराजमान रहती है।इसलिए हमारे मन को ही मंदिर कहा गया है।हमारे मनीषियों ने कहीं इधर-उधर जाने को नहीं कहा है,बल्कि स्वयं को स्वयं की अंतर्दृष्टि से देखने के लिए कहा गया है।अंतर्मन को देखना ही सच्चे अर्थों में शक्ति की उपासना है। जहां स्वयं माता विराजमान है।जिस पल मैंने स्वयं के अंदर बैठी शक्ति को देख लिया।अर्थात ईश्वर से शक्ति से साक्षात्कार हो गया।एक कवि ने बड़ी अच्छी बात दर्ज है कि मन एक मंदिर है,मन से बड़ा ना कोई।इसलिए बाह्य दिखावे से बचकर स्वयं को देखने की जरूरत है। आप मां की कैसी भक्ति कर रहे हैं,माता सब कुछ जान रही है। वह मुस्कुरा रही है। हमें देख भी रही है।
उपरोक्त उदाहरणों से यह बात सिद्ध हो गई है कि माता की उपासना से ही शक्ति प्राप्त होती है।मां की वंदना से हमारे सभी कल्मस कसाई समाप्त होते हैं।मां की उपासना से काम, क्रोध,मद, लोभ और अहंकार आदि दुष्प्रवृत्ति यों से मुक्ति मिलती है। हमारे मनीषियों ने अपना पूरा जीवन स्वयं को साधने में बिताया।तब उन्हें स्वयं को साधने से कुछ शक्ति प्राप्त हुई।तब उन्होंने विश्व समाज को जीवनी अमृत वितरित किया। मित्रों नवरात्र नौ दिनों की शक्ति का एक मिलन है।इस मिलन का लाभ हम सब तभी ले सकते हैं।जब स्वयं के अंदर छुपे उसे प्राण चेतना शक्ति रूप को समझ पाएंगे। मां की मूर्ति में स्वयं को जिस दिन देख लिया,जीवन सफल हो जाएगा। जीवन की दिशा और दशा ही बदल जाएंगे।(लेखक कथाकार/ स्तंभकार हैं)
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