1. अत्यधिक लंबाई (Slow Pacing)

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी अवधि है। लगभग 2 घंटे 45 मिनट की यह फिल्म आज के दौर के दर्शकों के हिसाब से काफी लंबी महसूस होती है। एडिटिंग में कसावट की कमी के कारण कई दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं, जिससे कहानी की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है।

2. हॉरर का कमजोर पक्ष

इसे एक 'हॉरर-कॉमेडी' के रूप में प्रमोट किया गया था, लेकिन फिल्म पूरी तरह से कॉमेडी की तरफ झुकी हुई है।

डरावने दृश्यों में उस गहराई की कमी है जो दर्शकों को कुर्सी से बांधे रखे।

'जंप-स्केयर्स' (अचानक डराने वाले सीन) बहुत कम और साधारण हैं, जो बच्चों के स्तर के लगते हैं।

3. दिग्गज कलाकारों के छोटे किरदार

फिल्म की स्टार कास्ट काफी मजबूत थी, लेकिन स्क्रीन टाइम के मामले में उनके साथ न्याय नहीं हुआ:

तब्बू: नेशनल अवॉर्ड विनिंग एक्ट्रेस को मात्र एक स्पेशल अपीयरेंस तक सीमित कर दिया गया, जिसने प्रशंसकों को निराश किया।

वामिका गब्बी और मिथिला पालकर: इन टैलेंटेड अभिनेत्रियों के पास करने के लिए कुछ खास नहीं था; उनके किरदार काफी अधूरे और कमजोर लिखे गए हैं।

4. मौलिकता और नयेपन की कमी

फिल्म देखते समय कई जगह ऐसा महसूस होता है कि हम प्रियदर्शन की पिछली फिल्मों (जैसे- मालामाल वीकली या भूल भुलैया) के ही कुछ हिस्सों को दोबारा देख रहे हैं। पुराने दर्शकों के लिए यह 'नोस्टाल्जिया' हो सकता है, लेकिन नई कहानी की तलाश कर रहे लोगों के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं है।

5. उबाऊ सेकंड हाफ

फिल्म का पहला हिस्सा हंसी-मजाक के कारण जल्दी निकल जाता है, लेकिन सेकंड हाफ में जब कहानी फ्लैशबैक और पौराणिक इतिहास में जाती है, तो यह काफी बोझिल हो जाती है। पौराणिक कथाओं का तालमेल दर्शकों को कहानी से जोड़ने के बजाय उन्हें बोर करने लगता है।

निष्कर्ष: 'भूत बंगला' निसंदेह एक शानदार एंटरटेनर है और यदि आप केवल शुद्ध कॉमेडी के शौकीन हैं, तो आप इसे एन्जॉय करेंगे। लेकिन एक 'मास्टरपीस' बनने की दौड़ में यह फिल्म अपनी लंबी अवधि और कमजोर पटकथा के कारण पीछे छूट गई है।

क्या आप इस वीकएंड इसे थिएटर में देखने की योजना बना रहे हैं?