भारतीय सिनेमा के इतिहास में साल 1993 की यादें आज भी ताजा हैं। यह वह दौर था जब फिल्मी पर्दे की कहानी और असल जिंदगी की हकीकत आपस में इस कदर उलझ गई थी कि दर्शकों के लिए 'रील' और 'रियल' का अंतर मिट गया था। इस दौरान बॉक्स ऑफिस पर एक बेहद दिलचस्प वाकया हुआ—दो फिल्मों की भिड़ंत, जिनके नाम थे: 'खलनायक' और 'खलनायिका'

संयोग या प्रयोग: एक ही दिन दो 'विलेन' की एंट्री

6 अगस्त, 1993 को जब सिनेमाघरों के बाहर प्रचार गाड़ियाँ निकलीं, तो शहर में अजीबोगरीब मुकाबला देखने को मिला। एक गाड़ी से आवाज आती—"आ रहा है खलनायक, संजय दत्त की शानदार पिक्चर!" और गाना बजता—'नायक नहीं खलनायक हूँ मैं'। वहीं दूसरी गाड़ी से उद्घोषणा होती—"आपके शहर में आ रही है तहलका मचाने खलनायिका!" और गाना प्ले होता—'तुझे बर्बाद कर डालूँगी मैं खलनायिका बनकर'।

एक तरफ शोमैन सुभाष घई की महागाथा थी, तो दूसरी तरफ 'सौदागर' और 'सौतन' जैसी फिल्में बनाने वाले दिग्गज सावन कुमार का दांव।

संजय दत्त की गिरफ्तारी और फिल्म का 'सुपरहिट' कनेक्शन

1993 के मुंबई धमाकों के बाद जब संजय दत्त को AK-56 रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, तो पूरे देश में हड़कंप मच गया। इत्तेफाक देखिए, फिल्म 'खलनायक' में संजय दत्त का किरदार 'बल्लू बलराम' भी एक महान पिता का बिगड़ैल बेटा था, जो कानून की नजरों में गुनहगार था।

रीयल लाइफ कनेक्शन: संजय दत्त के पिता सुनील दत्त एक सम्मानित सांसद और समाजसेवी थे।

नतीजा: दर्शकों ने इस समानता को भांप लिया और उनकी संवेदनाएं फिल्म से जुड़ गईं। संजय दत्त जेल में थे, लेकिन उनके प्रशंसकों ने 'खलनायक' को ब्लॉकबस्टर बना दिया।

जब कोर्ट पहुँचा 'खलनायक बनाम खलनायिका' विवाद

सुभाष घई को अहसास था कि टायटल की समानता से नुकसान हो सकता है। उन्होंने सावन कुमार को संदेश भिजवाया कि वे फिल्म का नाम बदल लें। गपशप गलियारों की मानें तो शत्रुघ्न सिन्हा की एक पार्टी में भी घई ने सावन कुमार से टायटल बदलने का आग्रह किया, लेकिन सावन कुमार टस से मस नहीं हुए।

कानूनी लड़ाई: मामला कोर्ट तक जा पहुँचा। सावन कुमार पर टायटल और स्टोरीलाइन चोरी का आरोप लगा। हालांकि, सावन कुमार ने कोर्ट में यह साबित कर दिया कि उनकी फिल्म 'खलनायिका' 1992 की हॉलीवुड फिल्म 'The Hand That Rocks the Cradle' पर आधारित है और इसका सुभाष घई की कहानी से कोई लेना-देना नहीं है। अंततः कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

बॉक्स ऑफिस का फैसला: दहाड़ के आगे गुस्सा ठंडा

भले ही दोनों फिल्में एक ही दिन रिलीज हुईं, लेकिन मुकाबला एकतरफा रहा।

खलनायक: अपनी कहानी, गानों (चोली के पीछे क्या है) और संजय दत्त के अभिनय की बदौलत इतिहास रचने में कामयाब रही।

खलनायिका: जितेंद्र, जया प्रदा और अनु अग्रवाल जैसे सितारों के बावजूद यह फिल्म कमजोर साबित हुई। 'आशिकी' फेम अनु अग्रवाल ने इसमें एक वैम्प का किरदार निभाया था, लेकिन दर्शकों को इसमें खास दिलचस्पी नहीं रही।

निष्कर्ष: खलनायक और खलनायिका की यह भिड़ंत आज भी बॉलीवुड के सबसे अनोखे संयोगों में गिनी जाती है। जहाँ एक तरफ संजय दत्त की रीयल लाइफ इमेज ने फिल्म को मील का पत्थर बना दिया, वहीं 'खलनायिका' केवल गॉसिप और विवादों तक ही सिमट कर रह गई।