नई दिल्ली:
सिरदर्द हो, मामूली थकान हो, नींद न आए या शरीर में थोड़ी सी कमजोरी महसूस हो—हमारी पहली प्रतिक्रिया अक्सर किसी दवा, विटामिन सप्लीमेंट या पेनकिलर की तरफ भागने की होती है। कई बार डॉक्टर की सलाह पर और कई बार खुद से ही हम दवाइयां लेना शुरू कर देते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई हमें इन सभी दवाओं की जरूरत है?
प्रख्यात जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लाहरिया अपनी नई किताब 'पिल-फ्री' (Pill-Free) में इसी गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनका मानना है कि आधुनिक चिकित्सा ने इंसान को कई गंभीर बीमारियों से बचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, लेकिन इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं में जरूरत से ज्यादा जांच, गोलियों और चिकित्सा प्रक्रियाओं का चलन भी खतरनाक हद तक बढ़ गया है, जिसे 'ओवरमेडिकेशन' या 'ओवरमेडिकलाइजेशन' कहा जाता है।
क्या है 'पॉलीफार्मेसी' और क्यों बढ़ रहा है इसका खतरा?
डॉ. लाहरिया के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति एक दिन में 5 या उससे अधिक गोलियां लेता है, तो इसे चिकित्सा की भाषा में 'पॉलीफार्मेसी' (Polypharmacy) कहा जाता है। कुछ मामलों में यह सीमा 2 या उससे अधिक गोलियों से भी शुरू हो जाती है।
- बुजुर्गों के लिए गंभीर खतरा: विशेषकर बुजुर्गों में यह समस्या और भी विकराल रूप ले लेती है। अलग-अलग बीमारियों के लिए अलग-अलग स्पेशलिस्ट से इलाज कराने पर मरीज के पास कई डॉक्टरों की पर्चियों का अंबार लग जाता है। इन दवाओं के बीच 'ड्रग इंटरेक्शन' (आपसी प्रतिक्रिया) और गंभीर दुष्प्रभावों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
- एंटीबायोटिक्स का बेपरवाह इस्तेमाल: मरीजों में बेवजह एंटीबायोटिक खाने की संस्कृति बढ़ती जा रही है। इससे 'एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस' (AMR) का
- संकट पैदा हो रहा है, जिससे भविष्य में गंभीर संक्रमणों पर दवाइयां असर करना बंद कर देती हैं।
फुल बॉडी चेकअप और सप्लीमेंट्स का भ्रम
आजकल स्वस्थ रहने की होड़ में नियमित रूप से 'फुल बॉडी चेकअप' करवाने का चलन आम हो गया है। इन जांचों में कई बार रिपोर्ट में ऐसे मामूली आंकड़े सामने आते हैं, जिनका किसी बीमारी से सीधा संबंध नहीं होता। लेकिन जरा सा आंकड़ा सामान्य सीमा से बाहर दिखते ही मानसिक तनाव शुरू हो जाता है, जिसके बाद अनावश्यक जांचों और दवाओं का सिलसिला चल पड़ता है।
ठीक इसी तरह, बिना किसी प्रमाणित कमी के विटामिन डी, बी12, कैल्शियम और अन्य सप्लीमेंट्स का सेवन धड़ल्ले से किया जा रहा है। इस आम धारणा के उलट कि 'सप्लीमेंट्स से कोई नुकसान नहीं होता क्योंकि ये दवाएं नहीं बल्कि सेहत के लिए हैं', डॉ. लाहरिया चेतावनी देते हैं कि बेवजह सप्लीमेंट्स खाना आपके लिवर को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। हमारा लिवर शरीर का मुख्य फिल्ट्रेशन सिस्टम है, और गैर-जरूरी सप्लीमेंट्स लिवर की कोशिकाओं पर भारी दबाव डालकर उनमें सूजन या विषाक्तता पैदा कर सकते हैं।
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मानसिकता बदलने की जरूरत: 'दवा नहीं तो फीस किस बात की?'
डॉ. लाहरिया एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए बताते हैं कि जब उन्होंने एक महिला मरीज की जांच के बाद उसे कोई दवा नहीं लिखी (क्योंकि उसकी जीवनशैली सुधारने से ही आराम मिल सकता था), तो महिला ने कहा कि वह उन्हें फीस नहीं देगी। समाज में एक आम मनोवैज्ञानिक धारणा बन चुकी है कि अगर डॉक्टर ने दवा नहीं लिखी, तो इलाज नहीं हुआ; और अगर मरीज को दवा न मिले, तो वह दूसरे डॉक्टर के पास चला जाता है।
दवाओं का विरोध नहीं, विवेकपूर्ण इस्तेमाल जरूरी
इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि दवाइयां नुकसानदेह हैं या डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी गंभीर स्थितियों में डॉक्टर की सलाह के बिना इन्हें बंद कर दिया जाए। ये जीवनरक्षक हैं। असली सवाल यह है— क्या हर दवा की आज भी उतनी ही जरूरत है, जितनी उसे शुरू करते समय थी?
डॉ. लहरिया की किताब का मुख्य संदेश यही है कि बेहतर स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ ज्यादा दवाइयां और ज्यादा जांचें नहीं है। इसके लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली की मूल भूमिका को समझना होगा। अगली बार जब पर्ची में कोई नई गोली जुड़े, तो अपने डॉक्टर से एक सवाल जरूर पूछें— "क्या मुझे वास्तव में इसकी जरूरत है?"
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