नई दिल्ली:

देश के प्रमुख राज्यों में पड़े सूखे की वजह से चालू वित्त वर्ष में भारतीय कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर गहरा असर पड़ने लगा है। खरीफ सीजन में सोयाबीन, मूंगफली, मक्का और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में गिरावट की आशंका ने घरेलू बाजार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसका सीधा नतीजा यह होगा कि भारत को खाद्य तेलों, सोयाबीन मील, मक्का, चीनी और कपास जैसे कृषि उत्पादों का आयात (Import) बड़े पैमाने पर बढ़ाना पड़ सकता है।

ईटी (ET) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस संकट की मुख्य वजह हाल के वर्षों में रहा 'अलनीनो' का प्रभाव है, जिसने मराठवाड़ा, विदर्भ, तेलंगाना और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्सों में फसलों को सुखा दिया है।

खाद्य तेलों का आयात 1.75 करोड़ टन पहुंचने का अनुमान

तिलहन फसलों की पैदावार प्रभावित होने के कारण देश में एडिबल ऑयल (खाद्य तेल) की उपलब्धता पर भारी दबाव देखा जा रहा है:

  • सनविन ग्रुप के अनुमान: कमोडिटी ब्रोकरेज हाउस 'सनविन ग्रुप' के सीईओ संदीप बाजोरिया के अनुसार, सूखे के प्रभाव के चलते भारत का कुल खाद्य तेल आयात 2025-26 के 16.5 मिलियन टन (1.65 करोड़ टन) से बढ़कर 2026-27 में 17.5 मिलियन टन (1.75 करोड़ टन) तक जा सकता है।
  • मूंगफली उत्पादन में भारी गिरावट: 'सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन' के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल खरीफ मूंगफली के उत्पादन में 20% से अधिक की गिरावट दर्ज की जा सकती है। इसके अलावा, सर्दियों की सरसों फसल को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।

पोल्ट्री और फीड इंडस्ट्री की बड़ी मांग: 30 लाख टन सोयाबीन मील आयात की गुहार

फीड (पशु-पक्षी आहार) की बढ़ती लागत से परेशान पोल्ट्री उद्योग ने सरकार से सोयाबीन मील और मक्के के आयात नियमों को आसान बनाने की गुहार लगाई है:

"पोल्ट्री आहार में 80% हिस्सा अकेले सोयाबीन मील और मक्के का होता है। फसल कटाई का सीजन होने के बावजूद इनकी कीमतें काफी ऊंची हैं। अगर सरकार 30 लाख टन सोयाबीन मील के आयात की अनुमति नहीं देती है, तो चिकन और अंडों की कीमतें बेतहाशा बढ़ेंगी और पोल्ट्री किसानों को भारी नुकसान होगा।" — दिव्या कुमार गुलाटी (पूर्व अध्यक्ष, कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन)

विभिन्न उद्योगों में आयात छूट और राहत की मांगें

कृषि संकट का दायरा केवल खाद्य तेल और पोल्ट्री तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य उद्योगों पर भी इसका सीधा असर देखा जा रहा है:

  • चीनी उद्योग (Sugar Industry): कच्चे चीनी (Raw Sugar) के आयात के लिए समय-सीमा बढ़ाने की मंजूरी पहले ही मिल चुकी है।
  • कपड़ा उद्योग (Textile Sector): कपास (Cotton) के उत्पादन पर असर पड़ने के डर से कपड़ा निर्माताओं ने कॉटन पर से आयात शुल्क (Import Duty) पूरी तरह हटाने की मांग की है।
  • स्टार्च उद्योग (Starch Industry): मक्के की बड़ी खपत एथेनॉल उत्पादन में होने की वजह से स्टार्च उद्योग को आशंका है कि उन्हें चीन से और अधिक स्टार्च आयात करना पड़ सकता है।
  • अफ्रीकी देशों से आयात: पिछले साल अत्यधिक बारिश और इस बार सूखे के चलते भारत का अफ्रीकी देशों (कम विकसित देशों) से सोयाबीन आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।

उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा सीधा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार समय रहते आयात नीतियों में ढील देकर घरेलू उपलब्धता को मजबूत नहीं करती है, तो आने वाले महीनों में रसोई का बजट बिगड़ सकता है। खाद्य तेल, पोल्ट्री उत्पाद (अंडे व चिकन), चीनी और अन्य दैनिक खाद्य पदार्थों के दाम अंतर्राष्ट्रीय कीमतों और सरकारी फैसलों के आधार पर चढ़ सकते हैं।

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